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प्रारंभिक-पस्तावना

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प्रिय पाठक गण / थद "जीवंधर नाटक” ज्ञो कि आपके कर फमजों को सुशोतित कर रहा है, मेंने अपनी तुच्छ बुद्धि अनुसार थ्रीमद्धदीभालद् विरचित जतसूडदामणि मद्दाकाव्यके धाधारको छेकर वनाया है। च्ततानमें कअधिकत्तर लोगोंकी दचि नाटक पर्व उपन्याखादिके पढ़नेमें विशेष देखी ज्ञादी है, अतएप्र बजाय उन साटकोंके कि जिनमें श्राभिक्र भाव बहुत कम होते है से धरामिफ नाटक को जनता जवश्य अपनावेगी |

नाटकों का लिखना अर्थाचीन प्‌ दो कर पक प्राचीन रृति' की ही नकल है समय के फेर से ओर संएकृत भाषाफा प्रचार फम होने से व्तेमान प्रचक्तित दिंदीभापामें द्वी इनका प्रचार लाभदायक दो रहा है मेंने सूत भंधको छोड़ा नहीं दे उसोफे झाशय को क्षेर बनाया है जिससे श्रथ का सारा भाव भा गया दे किन्तु कहें एक साज्जनों की राय से अन्तके ल'बका विपय जे वेराग्य पव' मोत्त गमन का, दे छोड़ दिया गया है। इस पुस्तक निर्मापण में मेरी इंडछा के अतिरिक्त कई एक भद्दा- शर्यों की प्रेरणा भी वरायर रही जिससे कि में इसे प्यापके सामने उपस्थित कर सका हैं। यदि जनताने इस मेरी कृतिको पसंद किया तो में झ्पने अम् फो सफल समकूगा एवं श्रांगे शोर भी धामिक पुस्तकें प्रकाशित फरझूगा जो कि लिखी हुई

'शक्खी हैं। जिनके पढ़ने से धार्मिक लासके साथ मनोरंमन्न भी होगा अ'तिम निवेदन है कि मेरे प्रमाद एवं अश्ञानतासे संभव है कि पनेक चुटियां रह गई हों मगर आप अपने उदार घित्तसे उनपर ज्ञप्ाकर कया खूचित फरेंगे ताऊि थे अशद्धियां थागामी संस्करण में निकाल दीं ज्ञांय शुभ भूयात्‌

समाज्ञ का दास ७. न. फुजविहारीलाल जेन शास्त्री प्रधानाध्यापक दि० जैन पाठशाला-दज्ञ।रीवाग

मा ज् समपण ६8.

५) जिनके पूज्य चरणोंके प्रसादस मेंने दो ९) अक्तरोंका ज्ञान प्राप्त किया, जो सुके पायण-स्त्ररुप समझते थे, जिनकी ९?

असीम कृपा मरे ऊपर रही, जिनकी है वजहसे यह मेरा शरीर लालित | ; पालित हुआ जिनके उपकारोंने ॥। ही मुझे इस लायक बनाया, |

उन स्वगस्थ परमपृज्य | पिता (श्रीजसरामजी)के 24 ॥( पविल करकमलोंमें में (९ यह अपनी लघकूति (१ जीवंधर-नाटक” | सादर समपंण | करता 5९२ |

आपका प्रियपुत्र---कुजविहारोलूछ जन |

५७८०७-६७-६श७-5:६२--५:०६२५-२९७१२५५१६

नाटकके पात्र

सत्यव्धर्‌ «२९००५५००*९* राजपुरीके राजा

जीवन्धर «*+**५*-**सल्यन्धरके पुत्र राजकुमार

कोप्रॉगार *«*-*«** सत्यन्धरका विभ्वासी मन्त्रो, ओर अन्‍्तर्म उन्ददीक मारने वाला शज्चु

गोविंद्राज --*---धरणखीनिक्षकके राजा यानी जोवेघस्के मामा

गधोत्कट-*००**००*** राजपुरीक्षा नगरसेठ यानी जीवंधरका घर्मपिता

मन्दगोप्‌ -*-९-०००** राजपुरोक्ता एक्र मुख्य एवं घनाछ्य ग्वाजा

नन्दाह्य -**०५+०**- गंधात्कटका पुत्र यावी जीदंधरका भाई

प्मस्थ - **«*०**** ज्ञीबंधरक्ा मित्र

भवदत्त «*«०*« एक मूल विद्याधर श्रीदत्त -<-००५५-०*रा अपुरोका सेठ व्द्षिक, मन्‍्दी, द्वारपाल, लाछु, रसोश्या, उत्राके, पथिक्त राज़पुत्र, सनापति, ड्यं ढीवान सेठ आदि। नाटककी पातन्नायें 'विजया[-««+०००५०«६ सत्यन्धरकी स््री बादी ज्ञीवंधरकी मा गंधर्यठचा--« * “जीवंधरकी पटरानी | सुणमाला, छुसमंजरी

कनकमालजा, विमत्ना ध्यादि जीवन्धरकोी: सामान्य स्लियां

ग्दनदेगा...**- “पक दुश्चरित्रा विद्याधरी नदी, परियां, देवी, सेदानी, सखी और ख्री वमेर+।

श्रीजीवेधर-नाटक

रंगभूमि ( सूत्रधारका प्रवेश )

सत्रधार--भद्दा | आाज्ञ फेसा खुदावना, मन प्रशक्ष करने- बाला समय है | दिलमें श्रानंदकी लहरे स्वाभाविक वह री हैं, मनमें खुशोका जअमाव पूरा अम चुका है, समय अनुकूल है अत; दिल चाहता है कि कोई ऐसा खेल खेलू जो सवको आनंद दायक हो अच्छा अभी जाता हूं श्रोर नटीसे सत्ताद्द कर यह ग्रानदकार्य शुरू फराता | ( सुजधारका चला जाना )

( सूत्रधार ओर नदीका प्रवेश )

मृत्रधार-प्रिये ! देशो भाज कैसा सुददावना समय मनोद्दारी भौर खुशदिल प्रतीत द्ोता है। मेरी इच्छा है कि आज्ञ इस ग्रापस्तुक सभाके समत्त कोई दपमयी जित्र खींचा जाय, जिससे सभीका दिल्त प्रसक्ष दो शोर साथी अपना मनोस्थ भी सफल है।

| जीवंघर-नाटक

सर अली क-डलआ-ल- 3०

, “नटी--प्रियतम ' आपका यद् प्रस्ताव समयानकृल है में इसमें तन मनसे सहमत ह' श्राप आए। फीजिये शिमसे कार्य शीघ्र शुरू कर दिया जाय | सूत्रधार--है मुस्धे ! प्रथम तो तू यद बता कि कॉनला दृश्य मनोक्ष-सरस और धार्मिक है, जिसके खेलनेले ध्पना मनारथ सफछ दो सकेगा | नदी--प्रियवर ! जीवंधर-नाटक खेलिये, (जो सरल आए आनमन्दका खजाना है, तथा साथमे गिक्तात्रद भी है, खेता&र सबफिे चित्तोंको प्रसन्न की जिये ! सृत्रधार-ठीक् है प्रिये | तुमने चहुत ठोक कहा, यद समय भी ठीक 'ज्ञीवधर नाटक ही खेलनेका है चलो घौर समी हो आह दो कि तुम समी पात्र झरना पार्ट बडी प्॒स्‍्नैदी श्रोए दिलचस्पीसे करो प्रथम मडद्गल गान करनेकेलिये पाग्योरी जैज्ञा जाय वाद जिसका जो कार्य होगा कराया ज्ञायमा ( दोनोंका चला ज्ञाना ) ( परियोक्ा प्रवेश--मडुल गान )

श्री ऋषभ गुरुपरा, युग आदि अवतरा

सतारि भव्य जीव कर्म काटि खुद तस टेक

आदिनाथ तुब नाम इसीसे दिया आदि उपदेश रसाल। धर्म कर्मकी करी व्यवस्था भबिजन तारन तरन विशाल लखि परंपरा श्री ऋषभम गुरुवरा १॥

गर्भ जन्म तप ड्रान भौर निर्वाण बंच दुव भवि झुखदाय

अब

प्रयमाक |

0 आशा

'तीन ल्लोकके जीव गई सुख महिपा तुत वरणो किपि नोब.] सर्ग सुखकरा श्री ऋषभ गुरुवरा २॥ नाप लेत सब विघ्त पत्नावि सुख-प्ंपतति वाह अधिकाय देखि सुमूरति सुभग सल्नोनो तेरी किसका पत्र ने रिफ्ताय हर्ण मन भरा श्रो ऋषभ गुरुवरा आज त्तरे पद कपल क्रपासे 'जोवंधर नाटक सुख साज खेले समामध्य हमर सव्‌ पिलि राखि 'कज'की हे म्भु सान चरण शिरघधरा श्री ऋषम गुरुवरा ४।

( गाते गाते परियोका चला जञाना )

[ यवनिका पतन ]

>>+यॉ 2 पीटलक+>भक,

अक पहिला-सीन पहिला राजमहल राजा सत्यंतर और रानी विजयाका बेठा दिखा; देना

ससन्धर--प्रिये संसारपे प्रेप एक अदुझुत पदार्थ द्वे 'क्षिप्की मद्िमा श्यान नहीं टी जा सकती | में भी इस प्रेमका 'मरीज हैं ओर तेरे सखतेदमे वकयूए हैं। दुनियां मठुष्यमन्म 'इसीलिये है कि धद मतसाने विपयरवोगोंका प्राशपादन छरके अपने जीवनका मज्ञा दांखिल कर यद्द राज्यपाटादि सब्र भार "है; इल्चतोंका बाजार दे

१] जीवधर-नाटक

/ « 'राज्यके ही मारसे चिन्ता कभी बिटतो नही

है पराधीनी वडी दिलसे शुवा मिटतो नही विषय भोगोंमें पंजा प्यारो सुनो आता नहीं। स्थान इकमें एक संग ही खड़ग दो माता नहीं विजया--प्राणप्यारे ! द्रायका कहना ठीक है पुण्योद्य- से प्राश विषयभोगोंक्री न्यायपूर्वक भोगना दी चाहिये, मगर: प्रपता घ्वत्व अपने द्ाथसे खोना ठीक नहीं है विपयभोगोंका मजा लेना मुनासिव है पिया मगर निज अधिकारका खोना मुनासिव नहिं पिया।॥ ; आपकी में सेविका सेवा मुझे करना सही राज्यकी चिन्ता भुलाना नाथ ! ये अच्छा नहों ससन्धर--प्रिये ! मेने राज्यका भार अपने विश्वास काएं- गारकी दिया है धह इस राज्यका बड़ी योग्यतातं॑ चलावेगा' और में तेर इस मुखरूपी कमलका भ्रमर वन निरन्तर रखा- स्वादन फरूंगा। में तेरे वियोगकर्रो पक त्ञषणके लिये मी सहन। नहीं कर सफता | विजयां--आ्रणेश्वर | में आपकी सेचा। करूंगी और दर तरदसे आपके मनचांछित कार्योक्षा सफल फरने की चेष्टा करूंगी, क्यों कि-- है नारि पही है धर्म यही उसका पति जिससे सुख पावे वह नारि नही यह धर्म नही जिससे उसका पति दुख पावे सत्यन्धर- ( द्ाथ पकड कर घहे प्रेमसे ) अयि मेरे चित्त को

मं

प्रथमांक 8

'+/-करी>२ती+नकय> बजट कैमीनजरीन-जी, सी मी >-ीभिल्‍मन

#. ०0५ *वरीननरीन बिग जरीिल्‍ीीमोजमीनिरी जरी. ल्‍ौगी के

9 की जलन 0 जप मान />विफलानि..न्‍फ अर नम मगर

चुरानेवाली चित्तनोर | भ्रद्दा ! मुझे धन्य है जो तुक सरीखी स्त्रीफो प्राप्त हुआ €'। चलो प्यारी | आनन्द लूटे ओर इस जिन्दगी का मजा हासिल करें। ( कट्ठकर राजा रानीका द्वाथ

पक भीतर लिया जाता है ) - [ यवनिक्षा पतन ] अंक पहिला-सीन दूसरा

राज-दरवार | काष्टांगारका मंत्रियोंके साथ बेठा दिखाई देना

काप्ठांगार--अयि मंत्रियों ! मैंने आज राजिमें एक वहा चआीभत्स और आएचये करनेवाला स्वप्न देखा है, धद दुखदाईं ब्यौर भयदायक है | में यही स्व॒ष्त पग्राज कई दिनोंले देख रहा 'ह', मगर प्राज उस देवताकी अत्यन्त प्रेरणासे मुझे! कहना पड़ता है, प्रव जैसा आप छोगों डी समझ्तमें ष्ाव्रे चेता करें। “दब देव मुझसे शआआाज कई दिनोंसे कद्द रदा है कि तू राजाकों मार डाल, नहीं तो में सारी प्रज्ञामें एक भारी उत्पात खड़ा कर 'दुंगा [” में जानता था कि यह मद्दान विन्न थोंदी टल् जञायगा मगर ध्याजके उलके वलात्कार पर्व गन तमन आदिको देख- कर में दृताण होगया हैं। आब इस, विषयाँ कया करना चादिये

बहा में प्राप लोगोंसि जानना चादता हू मंत्रो-धर्मदत्त--[दुखित होकर) दाय [ दिनका भी चक्र क्‍या फोता है, जो क्यासे फ्या कर देता है ? राजा प्राणोंतिे मी घारा

द्व जावेंधर नाटक

माना गया है; आज उसकेलिये यह प्रपेच ! गजदोद सब पार्पोर्मे बड़ा पाप है राजठोही पंच पातकोंका भाजन है राज़ाका" छैचसे सी अधिक श्माराधन करना बताया है, उसके लिये आज यह अनिष्ठ ! राज्ञाकी छोगोंको अज्विके समान सेंवा करना चाहिये, मगर हाय रे स्वार्थ तेरे साप्राज्यमें जो दो वदी योटा है है बढ़ी शक्ति, वढा वल, धर्म भ्रो सत्सड्रमें | ज॑सा रेंग रेंगियाके करमें बेसा रंगे रेंगमें॥

काप्ठटांगार-- वात ठीक है मगर देवकी भयानफ चेष्टा और ऋरतादि देखकर यही निश्चय करना पडता है कि सारी प्रज्ञा की रक्तादे लिये एकका विधात होना कुछ अचुचित नहीं है [' गजनीतिले यद ध्न्याय नहीं प्रतीत होता, वहिक् राजाके कष्तव्यमें यद्द वात श्राकर पड़ती है

जो वल है शांतिमें, नहिं दयामें, नहि धर्ममें। पगर वह बल देवके हैं क्र निन्दित कर्ममे

मंत्रीमथन--( उठकर ) यही ठोक है। ऋद्दां दजारोंदी रक्ता होती हो चहां पर पक्षका मारना ध्यन्याय नहीं हो सकता राजाको चही काये करता चाहिये जिससे इसकी सारी प्रत्ञामें शानन्द रहें | फ्योकि राजा ही प्रजाका माता पिता है। यदि घहद्दी उसके दुख दूर करेगा त्तो अन्य कोन कर सकता है।

काप्लांगार--तथास्तु ! ऐसा दी होना ठीक है, नहीं तो मुझ,

प्रथमांक . हट हा हाछ> का ++++७०७७३००६४७७०कव०००७%८४२५००५२२०२६०००/०५०००२०६०२६०००/-०७ढ०-०+-कन*न//६ १५४१ ७४ ३३ ५०-यतव/०#न्यक सारी प्रजञ्ञाक्षा पाप खतावेगा। (यह कर प्याशा छुत सभी सभा कंपित होती है काष्टांगार मत्री क्षादि चलते दाते हैं) यबनिका एतन |

अक पहिला-सीन तीसरा राज-प्रहल

राजा रत्यैधर ओर उनकी रानी विजयाका बैठा दिखाई देना

पिजया--लामिन ! अशोक दृत्तका यक्ायक्ष नए होना और इसी हगह पर फिर एक नवीन अशोक वृक्ष अए्ट माल्नाश्ों सहित उत्पन्न होना, यह स्वप्त ध्याज्ञ मैंने राजिके पिछिले पहरमें देखा है, सो इस स्वप्नका कया फल है ? कृपया बताहये ओर मेरी चिन्ताकी मिद्धाश्ये

सत्यंधर--( कुछ चिन्तित हो ) प्रिये | जो तूने उगता हुआ अभप्ट मालाओऋर सद्दित श्रशोक्ष वृक्ष देखा है उसका फल यह है कि तेरे अत्यन्त प्रवापी पुत्र दोगा और उसके आठ ख्त्रियां होंगी

विजया --( उदा होकर ) औौर प्रथम नप्ट हुये अशोक छृत्षका पा फर

सत्यंधर--( उदास दोऋर ) उसका फक्त कुछ नहीं दे।

विजया--(अति रंजके साथ) क्‍या उल्लफा फल कुछ नहीं है | आपके चद्दरे पर यह उदासी क्यों है ?

सत्यंधर--(चित्त सम्हाल कर) नहीं प्रिये | उदासी कैसी ; तुर्के फैस मात्दुम हुआ कि में उदास हे।

/

जीवनर-नाटक

...0#ह.त..0.॥तह.0.......0त.......0.0त.........> लक जल आ्िल्‍ डि लि जज जैज 55०

_विजया--क््या कभी चित्तका विकार भी छिर सब्त है? भीतरी बातको चेहरा कट कह देता है। कया ध्राप छिपाते हो * नहीं नाथ ! छिपाकर मेरे गमको चढ़ाओ

सत्यंधर--घनोहरे ! तुझे वडो पद्चिचान है ४चछा चला उस दगीचेमें चले देखो सामने कैसा मयूर छत्य कर रहा है आओर०००००० £

विजया - ( बात काट कर ) है प्राणाधार ! क्या मुझे आप यातोंमें ही टालते हो शीघ्र ही पद्दिले स्वप्नका फत्न पहो। देखो ! मेरा हृदय वेसा धडक रहा हैं ( रानी राजाका हाथ पकड़ ध्यपने हृदय पर रखती है।

सत्यंधर--( प्रांखोंमें आंखू मरक्षर ) प्राणप्यारी डसका फल कया पूछती है ) उसके पूछनेमें कुछ सार नहीं है घदद भी कुछ अनिष्ट वतल्ाता है-*'( यह खुनते हो रानी मूच्छित दो अमीन पर गिर पडती है )

सत्यन्धर--( खगत ) अद्दा मेंने इस प्राणप्यारीकी लीख मानी हसीसे इसका कटुफ फल सामने आरहा है | ( शीतो पचार कर ) हे प्रिये ! उठो! क्या तू मुझे स्वप्ममात्रके देखने से ही मरा हुआ सम्फनी है ? फ्या द्तत्तकी रक्ञाफे लिये उसे जल देकर अभ्निसे जल्लाना योग्य है ? कया बुद्धियानोंकरा संकझटके समयमें शोक करना उचित है? क्या प्पनी रक्ताके निमित अश्िमें पड़ना बुद्धमानी है ? क्‍या आपत्तिक्नालशं घर्मको भूत जाना चाहिये ? क्या धर्ममें चित लगानेसे विश्व

प्रथमाँक

करत. कर. 3 फमज-+ कमी ओअकाओ डा ला. नल नमक

नष्ट नहीं होते ? प्यारों ४ठो शोर बोलो ! में तरी पेसी अवस्था कब तक देख सकता हूं? ( राजा रातीका दाथ पकड़ छठाता है और थह मो अपने पतिके हस्तशबश दोते ही छठ वेहती है )

विजया--दे ज्ीपनसब्बस्थ ! मुझ अवलाकी त्तरफ देखो ओर बचाओ | में दुःखरूपी समुद्र्में वद्दी ज्ञारही हैं| क्या आप सामथ्येवान होकर भी मेरी रक्षा करेंगे ? हाय ! ( फिर चेहोश हो। गिर पडती है )

सत्यन्धर--( घ्वगत ) केसा नाजुक समय आगया | हायरे कर्म ! जो तू फरे चद सब थोडा है। (फिर सचेत करके) प्रिय- तमे | मेरी हृदयेश्वरी |! तू फ्या बातें कर रही है ? क्‍या तुमे मालूम नहीं है कि पुययोदयसे सारी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं? क्या तूने मुझसे प्रेम करता विछकुल छोड दिया फ्या अब तेरे हृदय: मेरे लिये स्थान नहीं है ? फ्या तू मुझे छुर्दा समझनी है » नहीं प्यारी ! उठा | और मेरे खुखमें वाधा मत दो | मुझे अधिक दुःख मन टो इतनी अधीर क्यों होठी हो ? उठो ! उठो [!

बिजया-- पेरोमें पडरूर ) है प्राशताथ | में भशानो हैं आपके दुख्धमे दुखिया और खुखमे खुखिया हूं। क्षमा करो प्रभो ! मेरी अबोधता पर तज्ञमा कर।

सत्पन्धर--[ रानीको बढठा छातीसे लगाकर ) सगलोचने ! देखो वह सामने कैसा सनोश उपवन है, उसमें केसी सर- सब्जी दिलको लुमानेवाली छारदी है। अद्दा ! पृत्त पर बेठो हुई

५० जीवंघर न/टक

, 3.८ -ीपलगपजरम नी: जननी “५५ नम

कोयल कैसा खुद्ाधना मधुर और क्रामल शब्द चोल रही दे मन्द्‌ मन्द हवा अपना अपूर्च हो छुटा दिखा रही है

देखा पर ऐसा समय अरु वाग देखा

देखा पर ऐसा कारणकलाप देखा॥

है रग रूप सब सामान समान प्यारी।

तेरे बदन पर चमन ये गुलजार प्यारो

विजया--अद्दा | प्राणप्यारे | आपका कद्दना ठोक है। यह

समय एक अदुभ्भुत अनूठा है, ऐसे चक्त पर शोक करना क्ूठा है जब मेरा प्यारा लाथ हे तब ये हृदय भी सनाथ है

सुख और पाण भी तुम हो मेरे शीलके शू गार तुय हो

मेरे आधार भी तुम हो और मेरे सर्गस्र भी तुम हो

जो तुम हमारे हो तो दुनिया भी हमारी है

नहि तो मेरे लिये कुछ नही, रात अंधियारी है

सत्यन्धर--यराद ! बाद !! केसा सुन्दर रश्य है। कैसी

अलौकिक छूटा है ! इसीमे जोचनका मजा है ! वाकी सब कज्ञा है। चलो, प्यारी ! उस उपवनमें चले प्ौर इस सामयिक्ष आनन्दको लूटें। ( राज्ञा रानीका हाथ पकड़ उपचनमें क्षेजाता है श्रौर एक स्वच्छ चट्टान पर बैठ फद्दता है) प्रिये ! तेसे छुन्द्र छूचि एक्र निराली ही है जिसको किसीकी सो उपमता नहीं लगती तेरी आरावाजके सामने देख उस कोषलफा शब्द भी कैसा फीका मालूम पड़ता है और तू इधर तो देख, यह दंसिनी तेरी चालकों देख अपनी चालकों कैसी बदलती हुई

प्रथमांक १९

(बजट

दीख रही दे क्या प्रिये | तू उधर नहीं देखती, देख तेरे सामने ये कमलपुष्प तेरे खिले हुये मुखकम्लको देख कैसा मुख गया है मानों, इसे छघाजााने ही दवा लिया है | प्रद्दा! तेश यदद छुन्दर रूप इस खिल्ले जोघनका भूष है जो प्रपनी छटासेः आखोंम चकायोध पेदा कर रहा है। (राजा रानीको देख देख दर्पित द्वोता है )

विजया-- शर्माकर ) हे मनमोद्दन ! क्‍यों मुझे व्यर्थ छेडले दो ओर योँही सूठी तुगवन्दी जोडते हो। अच्छा षताध्ये यह' यन्त्र कैसा है ज्ञिलका आपने तथार कराया है | कया यह मसवारीके भो क्राममें लाया जा सकता है ?

सत्यन्धर--प्रिये ! ये मथूरयन्त्र-आकाशी विमान तेरें दिल्ल वबहलाने ओर अनेक रषण्य क्रीडास्थलोंकी चहार क्लेनेके वाएते बनवाया है। इस पर बैठ देश देशान्तरोंकी शेर कर सह्ते है। कया तुम्हारी इसपर बेठनेकी इच्छा दे? यदि दे तो बेठो अभी! श्सका गुण मालूम होज्ञायगा

विजया--हां, बेठनेकी तो दृच्छा दे मगर भय लगता है प्रोर आकाश वडनेफी सुन हृदय धडकता दे क्षेकिन तवि- यत चाहती है कि इसपर वठ आकाशकी शोभा देखे

सत्यन्धर -- प्रिये ! यह सवारी भयोत्यादक नहें है। डरो मत, यद इच्डाऊ मुताविक् चलाया और ठदराया ज्ञा सकता दै | आर जहां चाहा उतारा भी जा सकता दे। ( राज्ञा रानोको जेकर उस मथूरयन्त्रमें बैठ जाता है ओर आकाशमें ढसे ज्ञेजातः हु फिर पीछे उतार लाता है।

श्र जीवेधर नाटक

व्यडमम-मन->००९०क,

बल अत

(नोट-यहा परहडेफे टीतर स्टेजपर कन्निर विभान रू सद्दारे खींच लिया जाय. और कुछ ऊपर जाकर ठद्दरा दिया ज्ञाय बाद फिर आहिस्ते उतार लिया जाय परदा भी कुछ नीचे उतार दिया ज्ञाय ताकि जनताकों ऊब९ ठद्वरा इआ विमान दोख सके )

विजया--द्े स्वामिन, | आज़ प्रापने इस चिम्रानपर चढ़ाऋर मेरे चिचको अति आनदित किया है। ध्द्य ! केसी मनोहर द्लिचस्प सवारो है। यदि * “( आहट पाकर व'द हो ज्ञाती है, सामने घबड़ाया हुग्ा हाश्पाल दिखाई देता है )

द्वारपाल-- हाथ जोड़कर ) महाराजाधिराज ! दरवाजेपर चड़ा कोल्लाहक द्वोरद्दा है। काष्टागार सारी सैन्य छेकर आपको भरने आया है। दरवाजेपर बड़ा झगड़ा दोरद्या है

सत्य धर--(करोधित द्ोफर) अद्दा ! काष्टांगार | फोष्ठांगार !! मुझे मारन आया दे | इतनो दुएत्‌(। यह घीढता |! इसका ऐसा होंसला !! अच्छा; में अभी जाता ह' और उसको कियेका फल चखाता हू्‌' | ( राजा ज्योंही ज्ञाता दे इधर रानी त्योंद्दी वेदोश दो जमीन,पर सिर पडती है रानोझो गिरी हुई चेद्दोश देख- स्रगत ) अहा | क्‍या स्वप्त्रका दृश्य सच्चा ही होगा ? भविनष्य बलवान है ( प्रगट ) हे प्रिये ) तू उठ शौर देख कि मैं उस 'पाजीको अभी परास्त करके ध्याता ह'। देख मे उस कृतध्तको कखी सजा देना ह' | तू शोक छोड़कर संसारद्ो और देख कि ये जीवन, घन ओर सम्पदा सभी अस्थिर है। जलके चयू ते

प्रथर्माक १३

2७ 25 4 3०० ६००4 सह १९७ #तज०>९ #

अिललवल्‍ल

समान त्तणभंगुर है। कोन किसका मित्र और कौन क्िसक/ शत्रु है, शन्न मिन्न मानना केवल विडम्वना मात्र है। प्यारी! उठो! और रंज तज़ो, में अभी आता हूं, थैये धारण करो

विजया--( सोती हुईं) हाथ ! प्राणप्यारे [! घुक्त अ्भागिनी- को छोड़ ध्राप किधर जाते हो ? फ्या पध्रापकों ध्रय मेरा विज्षकुल खयाल नहीं है ! हे प्रभो | मुझे ग्रकेली मत छोड़ो | द्वाय रे मेरे अशुभकर्मके उदय ! तू मेरे ऊपर सवार दे, जभो तो प्यारेका' छूटा करार है | हाय | द्वाथ! फ्या मेरे कर्ममें यही बदा था कि. में वतिवियोगको इस ध्यवस्थामें देखू' ? हाथ प्यारे ! मेरे प्राणोंके अधार ! मेरे नयनोंके ' तारे प्रभू || क्या मेरी तरफ आपकीः निगाह नहीं है ? ( रोती दे )

संत्यंधघर--(अधीर द्वो-स्थगत) देखो ! समयकी कैसी दुरंगी' चाल है जो कर देती कप्ताल है। पन्ुष्प कया सोचता है भौर क्या दो जाता है ? प्रद्दा ! कुछ दी देरमें फेसी अवस्या द्ोगई, दवाय ! इस गुलावसे चदरेक्री रंगव बदल गई। अफशोश ! रे काम | तुझे घिकार है, श्राज तेरो दी चजदसे हुआ जद्दान ख्वार है। में भी तेरे लपेटेंस आगया और आज इस नाजुक धपस्था' पर पहुंच गया। (प्रगठ) प्रिये | उठो भोर देखो में तुझे कितना समझा रदा हूं। देख | में उस दुषका अभी विध्यंघ करके. थाता है ' मान जा प्यारी मेरी इस वातकी तू मानजा बे ठजा अरु देखले उस दुष्टको द्‌ नो सजा .

१४ जीवंधर-नाट

विजया--( धश्ीर द्वा राती हुई ) दाय ! फरफम ! निरदेयी डुष्ट पापो ! मारले, दुल्ध दे, नेर भी समय उपयुक्त है सू सबकी ौ२र देगग दुसुस्त है। द्वाथ | फया श्राणप्यारे गये। (६ पागलबत्‌ चेष्ठा कर गादी दे ) गाठा

प्राणप्यारे | प्राणप्यारे !! प्राणप्यारे !!! प्राय ये

जारहे प्राण पमरे-आपके ( प्राण ये टेक

हाम ! दुख आकर पढा मिटना मिटाना कठिन है।

होनहार मिट नहों होकर रह अनिवार ये ॥प्राग॒णा

साफ वतला है रहा मेरे गर्भका भार ये

प्राणप्यारेके पिछाड़ी पुत्र होगा हयय ! ये माण० ॥शा (फिर बेद्दीश दो गिर पड़ती )

'सत्यंधर--( शतिदुखित दो ) अद्दय ! क्या दुःखऊर्ा समय है? फोन जानता है; कि भ्रापचि एकदम इस प्रकार टूट पढ़ती हैं, जो नाकमे दम कर देती ६ै। पुझे दुशमनका भय नहीं है, यदि भय दे तो इस प्राणप्यारोका ही हैं इसे भय समफझ्ताना च्यर्थ 'डोगा। मुझे शव कोई उपाय कुटुम्थरक्ताका करना चाहिये!

जाता पक गया है आम अव गिरने ने कछ ही देर है। जो रहू' वेफिक्र तो होगा वढा भ्न्धेर है टेक स्वप्नकी सारो दशा आंखोंसे लोनो देख है। होनहार मिट नहीं पदणाय वज्जर रेख है॥ पक० ॥शा। “म्त्यु मुमको है डुलाती घटी पल की देर है।

प्रथम/क !्थ्‌ दृदशा ऐसी भई ये दुर्दिनोंका फेर है पक० २॥ विषयभोगोंकी वजह से आज ये हालत हुई वंशरत्ाका यतन सोच करू क्‍यों देर है पक० ॥शा। यंत्र में बिठला इसे करमें गहू शयशेर है दुष्ट काहांगारकों मारू' करू क्‍यों देर है पक० ॥श॥ ( मद्दाराज्मे निश्चय किया कि इसकी यहां रहनेसे गरस रत्ता हो सकेगी इससे रालाने तुरत इस मुर्छित रानीको यत्रमें विठा इलकी चाबी दे आकाशमें बड़ा दिया और आप सिंदद« समान रणांगणमें प्राकर घार घुद्ध किया। सभीके होश ठिकाने कर दिये मगर अंत छसे स्वाभाविक वेराग्य उत्पन्न हुआ ओर इस प्रकार घिचार करने लगे - शत्र रखकर ) "हे प्रात्मन्‌ | तू मोदको प्राप्त हुआ यद्द क्या अनथे कर रहा दे ? एक तो तूने रशानवश मोहान्ध होकर विषसवमान इन विषयोंका प्यास्वादन क्रिया उसपर आज्ञ फिर तू ये अनर्थ करनेको उद्यत हुश्ा' है ! धिक्कार है इन विषथों को जो प्र!णी इनमें फँघकर-प्यपता सर्वस्प खो वेठता है। अद्दा |. यह घूढ़ प्राणी एच्छिष्ट इन विषयोपर पतंगकी तरद् गिर वेमोत मरताहै। देखो | ये सूढात्मा स्त्री के मद्दान अपवित्र जधनस्थलमें विष्धके फौड़े समान भानंद्‌ मानता है किन्तु विचार नहीं कर्ता कि में कोन हूं ? मुझे फया करना है ओर में क्‍या कर रहा हूं ? भ्रहा | यद्द मोहका कोपद्दी इस जीवको सर्वधा भिन्न पदार्थमें मोदित कर दृता दे। वश्तवमे- पक आत्मा ही प्रपता है श्रोर सब सपना दै।” गाता है--

१६ जीवधर-नाटक

कै. ०... ता २०७ ०22७3“ म-के अन> सनक कान 2 ढक पफिट +-3->के छल अवीकेनमीजिरी अननमनकन बाय. मनी के... >> के समा या अन्न अधिजाएरि जन... फरन कमनयाममथा

गाना सेदाग्य झुपमें

है अथिर संसार कोई सड़में जाता नही

मोहके वश होय पाणी निम दशा ध्याता नही टेक

भूख वन इन विषय भोगोंमें रमें दरता नहीं।

अशुच और भअशुद्ध तनमे रे भय खाता नहीं है भण।

शरग[ नहि कोई जगतमे बात ये जाने नहीं।

कर्म-वैरोसे लड़ाई पूर्ण ये लदता नहीं॥ हैं अर

कॉनका है राज्य-धन तन ये रहस जाने नहीं

जीवकी निर्मल दशाका खाज कर पाता नहीं है प्र०॥

मूर्ख त्‌ नित सेंकडों अपराध कर धावा नही।

छोड मंमट जगतके निन रुप क्यों ध्याता नहीं है भ्र०

( धत्यादि चिन्तवन कर राज़ा सत्यन्थर च्यानपघ्व हो ज्ञाता

है। उसी समय काष्ठांगार श्राऋर उनका प्राण जुदा कर देता है! राज़ाका मुतनशरीर जमौन पर पड़ जाता है )

यचनिका पतन |

“८-4: ०टवट टन ११ ब्रा +>२२२८7फि्

प्रथमांक १७

हे ऑन अन्तीरजम, अकक -स०७.. 3 अर >-.. समकम१.>७७ ऋण अम्य फल २०

$ | # हिला अक पहिला-सीन चोथा। स्मशान विमान पर बेढी हुई विजयाका चिन्तातुर अवस्थामें दीखना |

(एक देवीका धायके रुपमें प्रवेश )

दबी-( रानीकी प्रसति अवस्था श्रति-निकट देख ) दे पूज्ये | बठो भोर मेरे साथ चलो, में तुम्हें एक अच्छे स्थाव पर ले चलती हैं| मुमे तेरे टुःख की मालूम दे कि भाध्मानसे गिरी है और पक गर्भकी पीड़ासे भी पीड़ित हे चल; भय मत फरे और तू मुझे अपनी हितकारिणी समक्त |

विनया-- रोती हुई ) हाय ! मेरी यह दशा! अच्छा बदन | चलती हैँ और अपने कर्मोक्नी परीक्षा करती हूँ। तुम्ई देखनेसे मुझे कुछ थैये वंघता है। ( रानीकों धाय द्वाथ पकड़ कर एक उत्तम बने हुए प्रसति-धरमें छे जाती है. झौर वद्दां वह विश्रिपूर्वक पुत्रअननयोग्य सब क्रियाआंकों करती दे )

देवी-« पुत्रके छत्तणोंको देख कर ) दे खुभगे! यद्द तेरा पुञ्न वड़ा प्रतापी ओर धर्मात्मा होगा देख, ये शुभ रत्तण इस" , के इस बातकों प्रगट करते हैं ( लक्तणोंकों दिखी दे ) लक्षुणोंसे जान पडता है प्रतांपी होयगा धर्मका धारक हितेपी दुःखंनाशक होयगा शत्र भ्रों पर विजय पा साम्राज्य पद पावे सही। कर्म-शत्र, विनाशि पंक्ति पायगा अष्ठम मही

9८ जीवपर-नाटक

द्वेसबुद्धे! अब व्‌ मेरी वात छुन ढसीके सुताविक कर, इसीए तेरा भला है

विजया--दे वहन ! में तेरा भारी अहसान मानती हैँ ओर तुझे सच्चे दिलमे चाहनी है, भक्ता में तेरी द्वितकारी सीख क्यों मानूगो *

कोन है जगमें मेरा जिसके निकट जाऊं वहन

मुझ अभागिनका सहायक कोन हैं कह तू वहन

जो करेंगी त्‌ वहो कहना करूँ तेरा वहन।

है मेरी उपका रिणी तू दिल यही कहता वहन

देवी--दे गुणनिधे ! तू इल समय केसी अवस्थामें है फ्या छुके ये मालूम नहीं हे ? क्या तु ऐसी अधस्थाम धपने इस पुत्र- का पालन-पोषण फर सकेगी ? यदि पुत्रका यथोचित लाजन पालन शोर शिक्षण हुथ्था तो क्ष्या होगा अत: तू इस महा" साग्यशाली पुत्रकों इसी जगद रख दे। इस तेरे पुत्रकों प्रभी कोई योग्य पुरुष ले जायगा थ्रोर चद्द उचित रुपले इसका पालन चोषण करेगा

- विजया--[ प्रति निराश होकर ) दे वदम !' क्‍या कभी माता अपनी प्रिय सन्‍्तानकों ऐसे भर्यक्षर स्थानमें हालके हुये बच्चेको छोडकर जायगी? क्या कोई ऐसा भी #र सकेगा * मुझसे जिस तरह होगा इसका पालन पोपण करूंगी और इस के मुखको देखकर दी इन दु!खभरे दिनोंकों पूरा करूगी।/ बहन ! मेरा लगतमें कोन है ?

प्रथमांक १९

'हाय ! क्या पेरी दशा इस समय दुर्घर हो रहो जो भिखारिनकी दशासे भी बुरी कहला रही क्या कोई निम पाणसम प्रिय पत्रको दे फेककर हासके जन्मे हुए नादान निदेय होयकर ( रोती है ) देवी--हे भद्ठे ! समय अधिक नहीं है ज्ददी मेश कहना 'मान, तेरा इस्तीमें कल्याण है। मेरी वातकों रूठ मत समस्त 'इस पुत्रले तेरा मिक्लाप होगा, तू एफ दिन फिर खुख देखेगी। मगर यद समय जो मैं कद्दती ह्‌' यही कह रदा है। यह पुणया- 'त्मा जहां ज्ञायगा वहीं पर आदर पायगा, तू इसे यहीं पर रख दे और देखले कि मेरा कहना कहां तक सच दे विजया-दाय ! प्ुुक अभागिनीकों कुछ भी नहीं सूकता कि में क्या करू में इस अपने प्रार्शोसे प्यारे पुतफो छोडना भी नही चाहती और आपकी बावरो भी टाछ्षना बर्दी चाहती, 'क्या करू वडी परंशान हू हाय कसा समय का गया **०४* ( राती है ) देवी-( बड़े प्रेमसे ) पुण॒यपूर्त | तू फ्यों रोती है ? सचि- तन्य चलछवाण है। शा कर और मेरे घजनों पर ध्रद्धान फरक इस पुत्तकों यहीं रस ढे देख इसे कोई तेरे देखते देखते 'ही उठा ले जायगा | धह इसका शाजपुत्रके समान लाजन पालन करेगा | फयों वप धर्म खिस्ता कर रही दे विजया--( एक लस्वी सांस भर कर ) अच्छा बदन ! तेरा 'ही कदना करती हैं. और इस पुत्ररत्त को यदी. पर रखती है वाएे भवितष्यके झ्ाधीन है जो दो-+

२० आवधर नाटक

क्‍्यां करूँ प्यारी वहन दिलमें दर्द चेरोक है

मानना मुझको तुम्हारा वचन जो ये नेक है

( रानी विज्याका चेहरा पक्दम फीछा पड़ ज्ञाता है; दाथ काम नहीं देते जैसे तेसे धायके बताये हुए स्थान पर पिन्नीय मुद्रिकासमेत पुत्रको लिए देती दे ओर आप एक जगद्द छिप फर देखती है कि कोई इस त्लेने आता है या नहीं ? उसी समय पक्ष पुरुष साथमें लाये हुये रत पुज्रको एक तरफ रख जीवित

पुत्रकी इधर उचर खोज करता है। उस पुरफ्को पासमें पड़ा हुआ एक सुन्दर पुत्र दीखता है ओर उसे छातीसे लगा क्लेता है। एक तरफते 'जीव' ऐसी आई हुई थ्राशीर्ादात्म ग्रावाज सुन वह पुरुष भी इसका नाम जीव यानो जीवधघर! रफ्खूगा ऐसा दिलमें संकरप कर चत्ना जाता है | यद्द देख इधर रानीको

घड। वुश्ख होता है धह अपनी छाती मसोसकर रह जाती दे घायकी धाक्ष्से कुछ भी नहीं कहती )

'देवी--डे विशालनेत्रे ! देखा ! यह तो मेरा फदना ठोक तिकला,न अब तू भी चिन्ता छोड क्रोर तपोषनकी तरफ चल | वहां कुछ दिन धर्मध्यानमें व्यतीत कर, तेरे कुछ ही दिन: वाद दिन फिरेंगे ओर तू सब छुख इसी पुश्नकेन्प्रतापसे देखेगी।

सोच करना छोड दो दिलमें धरो साहस बहन।

चन्द रोज धरो प्रभूका ध्यान तुम प्यारी बहन

तपोवनरमे जाय तुप समता घरो मेरी वहन

प्रिलेगा तुब पुत्र, होगा राजराजेश्वर वहन विजया--हे छुमगे | मालूम मेरा! दिल क्‍यों धड़कता

प्रथमाक २१

हैं। लत दीखता है ओर सूक्तता है कि में श्थथ फया करू ? भ्िय बहन | मुझे तुम्दारा कद्ना स्वीकार है | तपोचन कितनी दूर है चलो, बद्दन |! मुझे हाथ पकड़ ने चलो देवी--[ हाथ पकड़ घीरे छे ज्ञाती हुईं ) हे सदश॒शणे ! ध्रथ तपोवन यद्दाले थोड़ी दूर है | .वहां पर शांति भरपूर दे। चहाँ पर डुघख है, संताप है, मोह है ओर कोध हैं, किन्तु दर सप्रय आनन्दका श्रोत्त जारी रहता दे। चलो बहन / धीरे धीरे चलो | विजया--( चलते चल्नते ) चलो पहन मुझे एक तुम्दारा ही खसद्दारा है तुम जहां चलोगी शोर जद्दां पर रहोगी में रहनेको तया? है तुमने मेरे बहुतसे दुःखको वटा लिया है। ' देवी--(चलते२) बदन ! कुछ फिक्र करो बीर वही कह- “लाता है जो आई हुई भाषत्तिमें वैये धारणा फर उसे समभावों- से सदन करता है। देख, रथ तपावन बिलकुण ननदी गया वे सभी साध्यी देख केसा समभावसे श्त्म ध्यान कर रही दे ( सामने बैठी हुई साध्चियोंको जो एक्र सफेद साड़ी मात्र ओढ़े आताध्यानमें कुछेक दुर्पर बैठी हैं उन्हें दिखाती है! ज्योंदी उधर रानीकी निगाद तपोचन पर पड़ती है त्योंदी 3धर धाय ( देवी ) 'छिपऋर अध्य्य हो जाती है रानी पीछे घायकोी देखती हैं मगर उसे धहां रेख सुच्छित दो जमीनपर गिर पड़ती है ओर गिरते बी बैहोदा ही जाती है भीरे परदा मिर जाता है ) [यब्रनिका पतन ] डाप। प्रथर्माक समाप्त

दितीयांक <£०॥88४8०६- अक दसरा-सीन पहिला सेठ गंधोत्कंटका महल गंधोत्कटकी सेठानीका अपनी सहेली साथ उदासीन रूप में

हि बैठा दिखाई देना। ( गोदमें पुत्रको लेते हुए गन्धोत्कटका प्रवेश ) गन्धोत्कट--.[ पुत्रको ग्रोदमें लिये शपनी सस्‍्ज्नीसे ) क्यों पागल्न ! तूने जिन्दे लडकेको ही मरा हुआ समझ मुक्त दे दिया:। यदि में भी इसकी छन्‍्त समयमें परीत्ता करता तो बता आज कैसा क्षनर्थ दो जाता ! ले अपने इस जीवित पुत्रको सम्दालः ओर अपना अद्दोभाग्य समक्त सेठानी--( दाथ पसारकर बड़े प्रेमसे ) सच कदते हो फ्याः प्राणनाथ ! ल्ाधयो ओर मेरे प्रिय पुत्रकों दो। ( वद्द पुत्र अपनी गोदमें के लेती है ओर उसका मु द्द चूमतीः है ) गंधोत्कट-( द्वारपालको बुलाकर ) ड्योढीवानसे फह कर शीघ्र दो यद्द घोषणा सारे शहग्में फिरचा दो कि “सेठ गन्धों- स्वट वी तरफसे आज भारी दान वितरण किया जायगा, जिछ- को जिस चीजको जरुरत दो ले ज्ञावे ?

द्वितीयांक २३

द्ारपाल--ज्ो आड़ा, अभी सारे शदरमें उक्त खबर करा देता हैं ( कहकर द्व/।रपात्न चक्ना ज्ञात! है ) [ यघनिका पतन ]

आओ * ? मा

अक दूसरा-सीन दूसरा राज-द्रबार | काप्ठां गार सिंहासन पर बैठा है ओर उसके पासमें भमात्यगण बेठे हुए हैं . काष्ठांगार--( खगत ) कौन कद्दता है कि किया हुआ पुरुषार्थ व्यर्थ जाता है? यदि धह घुद्धिंपूवेंक किया जाय तो ग्रधश्य ही सफल दोता है क्या लिंद्द चनका गाज्ञा किसीका ऊिया हुआ बनता है ? नहीं, वह अपनी घतुरतासे द्वी सारे चनके ज्ञीबों पर राज्य करता है। यदि में यह चालवाजी करता तो क्‍या आज्ञ यद दिन देखता ( प्रगट मंत्रियोंसि ) ध्राज़् मेरी गद्दोनशीनीके दिन प्रजाका फैसा चर्ताव रद्दा ? क्या यह ध्राप छोगेनि मालुम किया है या नहीं ! म्रन्ती--म्रधाराज सारी प्रज्ञा अमन चेन कर रही है ओर आपका शुणगान करती है। किसीफे चेद्दरेपर रंज्ञ नहीं दीखता बह्कि सारोंके चदरोपर खुशी फछक रदी है जगरद्द वजयद उत्सव द्ो रद्दा है। सव लोग ख़ुशी मना रहे हैं काप्ठांगार--क्यों नहीं राजत्वका प्रताप ही ऐसा होता

२४ जावधर-नाटक

है,जो सभीको नम्न और आशाकारी बना देना हे। ( पासमें ड्योंद्रोधानकी श्रावाज खुन आश्यर्यसे ) हैं; यह घोषणा किस- की तरफमे की जा रही ?, उस ड्योड्रीवानको घुलाकर सारा हाल मालूम करो | पन्न्री--अभी चुलाता ह' ( मन्तरी हारपालसे ड्यंडोवानको बुलाने ऋहता है और वद्द उसे ठुला लाता है ड्योढ्रोचानसे ) यह घोषणा किपघतकी तरफसे फिस कारगासे की जा रही है डजयोड़ीवान -मदाराज ! यद्द घोषणा गन्घोत्करकी तरफसले की गई है| आज उन्होंने हम खुशीके दिनमें भारी दान देना निश्चय किया है। श्रीमान, आज उनको पुत्ररल भी हुआ है मन्त्री--( काष्टांगाएसे ) देखिये महाराज ! प्यापके प्रथम दिनमें यद खुशखबरी महाराज ! लक्तण तो अच्छे प्रतीत दोते हैं। अब आपके राज्यमें कोई विप्न करनेवाला नहीं है, ग्राप तो ग्रानन्द्स राज्य कीजिये ओर प्रज्ञाको खुश रखिये। ध्यापक्री जीत, द्वोनेचाल्ले हनःशुभ लत्तणोसे प्रत्यत्त दीख रही है काप्ठांगार-( खुशीसे उछुलऋर ) भ्रद्दा ! मुझे धन्य है जो इतने वडे राज्यका स्वामी मिनटॉर्मे बन गया, भाग्य इसे कद्दते है। देखो मैं आज इसीकी चजदसे इस प्रवस्थापर पहुच गया। अच्छा खुनोा, जो गन्धोत्त्ट सेढको आज पुत्र इप्मा है उच्चके लिये सव आवश्यक सामग्री राज्यकी तरफसे भेज्ञी ज्ञाय यानो उसका ल्ञालन-पात्नन र/ज्यकी तरफसे हो, समझे यह काये भार तुम्दारे ऊपर निर्भर है, देखो कुछ गलती होने पाचे। हा!

द्वितीयांक २५

000७७७॥७॥७॥७७७७७एएराा/ शाम इक आम ॒इ कल मनन की कक मीन

आजके दिन जितने लड़कोंका जन्म हुआ है थे सव गन्धोत्कटके पुत्रके मिन्न हों झ्ोर उनका भी प्रवस्ध राज्यसे ही किया जाय | पन्त्री--ज्ञो राधा, सव हसी प्रकार किया ज्ञायगा (कार््ा- आर शोर मन्तरी आदिका चलता जाना ) यवत्तिका पतन |

+०-_शाक- पुन

अंक दूसरा-सीन तीसरा। गन्धोत्कटका महल.। गैधोत्कट सेठका अपने मुनीम आदि सद्दित बेठा दिखाई पडना ( दान क्षेनेचालोंका प्रवेश ) गन्धोत्कट--( याचकोंको देख ) बैठो भाई ! वैठो ( सबको इच्छानुसार दान विनरणें करता है, सब याचक लोग चल्ले जाते हैं। एक साथधुका प्रवेश ) साधु--( करुणापूर्वक ) अरे जिज्मान | कुद्े भूखेको खिलायगा या योंद्दी भगायगा में त्तेरा बडा काम ख़ुनकर तेरे दरवाजे पर आया हूं। मैंने तेरी वड़ी तारीफ छुनी है। मुझे भर पेट भोजन खिलादे घस ! मेरा यह एकही सचाल है। भूख सुमको मारती है दुख सहा जाता नहीं। बहुत कोशिश कर चुका पर व्याधि ये मिटती नहीं गन्धोत्कट--भ्राइये महाराज ! बेठिणे, आपकी अभी इच्छा 'यूण हो ज्ञायगी। ( रसोश्येप्ते ) अरे | इन साधु महाशजकों

२६ जीवबंघर-नाटक

रसोईघरमें लेआाकर भर पेट भोजन कराओं ओर इनके दुःखकों

मिदाओ (साधुकी तरफ) जञाहये महारात ] आप इच्छानुसार भोजन कीजिये ओर अपनी जुघाकों मेटिये

साधु--धन्य है.|सेठ जी | आपको, जो मेरी प्रार्थना मेजूर शी में ज्ञाता है ओर देखता हूँ कि ये मेरा डु!ख यहां भी मिटता है या नहीं ( साधु रसेहयेके साथ भोज्ननाजयमे ज्ञाता है आर

वद्दां बवेंठ सारा रसोशयेका सामान खा जाता है मगर ठृप्त नहीं होता ) रसोइया-- आश्चये कर के, स्वगत ) क्या यद्द आदमी है

या हेचान | भूत है या प्रेत ! कुछ समस्तमें नहीं आता हजारों आदमियोंकी खुराक यह अकेला खा गया, उस पर भी इसका

पेट भरा, शझभी और खानेको मुस्तेद्‌ है ( प्रगट ) फया मद्दा- राज ! खानेको प्रोर लाऊँ ?

साघु--( झफलाकर ) एसा खाना तो हमारा बहुत जगहोंपर हुआ। मगर अवतक पेटभर खाना कहीं पर नहिं हुआ ॥॥ जो मुझ खाना खिलाना चाहते हो पेटभर। तो पूछो परसने जाओ कमर नीची जु कर रसोइय्या--( घयड्ठाकर-घ्वगत ) अब तो भोजन है नही इसको खिलाऊं और क्‍्या। जो खिलाऊं गर नही तो इससे लज्जा और क्‍या कचा पक्का जो मिले उसको खिला भरपेट दू जिस तरह हो उस तरह इसको क्षुधाको मेट

#

द्वितीवांक २७

20000॥0॥#0॥0॥00/0/॥७0॥0॥0॥॥७॥ए॥ए७७॥॥0७॥/७७७७७७७७ा० रा इज शरक आन कन्ददई

' कक.

( प्रगट ) दे महाराज्ञ | लीजिये श्लोर अपनी श्तुघाकों शमत् कीजिये ( रसोइया सब कश्या अनाज आटा दाल आदि सामानः परोसता है, साधु मद्दाराज़ उपे परोसते चटपट खाते जाने हैं, तृप्त नहीं होते। सभी लोग साधु प्रहाराजके इस छृत्यकों देखते हूँ और मनमें बड़ा आश्चय करते दें )

जीवन्धर--( जो पक्र तरफ थालीमें वेठकर प्रास ले साधु, की तरफ घड़ी देरसे देख रहे थे) भाई. इसे भारी भूलने सताया है, माद्यूम नहीं, इसे कथसे खानेको नहीं मिला है कि इतना भोजन करने पर भो ध्यभी तक भूख है ! अच्छा मेरी थालोमे परोसे हुये हस साप्तानका भी हसे दे दो। ( श्सोष्य्याः जीवन्धरकी धालोका भोजन दे देता है मगर उससे भी उसकी भूख नहीं मिटती )

साधु--( अतिदीनतासे ) मद्दाभाग ! में बहुत भूखा-ह तनसे सूखा | मगर इस रोगसे वश नहीं चल्तता। बडए परेशान हूँ

यह ज्ञुधा है रोग जो मुझको सताता हर खड़ी

ज्ञानमे नहि ध्यानमें लगता मन है इक घड़ी

कुछ चलता वश्ञ मेरा दिन वहुतसे हेरान हू

सत्य मारगसे हटा, दुर्ध्यानयें लवल्ीन हूं '

जीवन्धर--( आश्चयेफे साथ सथगत ) इसका पेट है या

कोट ? कुछ समझे नहीं ग्राता ( प्रगट ) प्रष्छा मद्दाराज्ञ | मेरे इस प्रासको खाकर धपनी क्षुघाकों मेटिये। ( जीचन्चर द्वाथके प्रासकी भी दे देता दे )

२८ जीवंघर-नाटक

साधु-( प्रात खातेडी ठु॒प्त द्वोकर ) है पुण्यशालिन्‌ मे तेरा वड़ा उपकार मानता हूँ और नेरे पुययक्री प्रशसा करता हैं। तृमे-मेरे इस मद्दान ठुखदाई रोगको मिटा दिया ! में तेरो क्या प्रशंसा करूं? अद्दा धन्य दे तुस्े मद्ामाग्य ! में तेरे इस शुरुतर डपकारका क्या प्रत्युवकार करूं यही सोच रहा हू मगर में प्रभी तक निश्चय नहीं कर सका हं कि तेरे साथ में क्या फतंव्य +रू' जो तेरे इस मद्दा उपकारके बरावर द्वो तो शर्तांश भी तो हो

जीवंधर--डे गुरुषये | मेंने आपका क्‍या डप्कार किया जो ध्याप पेसा कद्द रहे दे, यह सब आपके ही पुण्यका प्रताप था समस्त लीजिये इस रोगकी अवधि इतनीही थी अब समय अतनेपर खतम दहोगई

सापु-( खुश होकर ) हे वालऋ | कब तूने मुझे सुरु कह- 'कर संवोधन श्वयिा है तब-में भी तुझे सिखाकर रूच्चा गुरु चने ओर तुझे सव विद्वानोंमें अशुआ बनादु। वास्तवमें में शान- दान देनेले ही कुछ ऋणमृक्त दो सकूगा, क्योकि शानके समान जगतमे कोई उत्तम चीज है झोर इसका कुछ घूलप है इस शानसे दी आत्मनिधि मिलती है और कुमागंसे हटनेकी स्वय' बुद्धि होतो है ( गंधेत्कट सेठ ) में तुम्दारे इस परमो- का वाल्कको चि्या पढ़ाना चाहता ह', इसमें प्राफ्को फ्या राय है ?

गंधोत्तद--( खुश दोकर ) मद्ाराज्! धन्य है छुझे और

द्वितीभाक २१,

ही ४२७ ००. *> पड. 20 पक तक चर फनीफममीयनीन मा... स्‍करको सर "जी अमन जकमनकमन >ज० ,गन्‍-> मन जि जप मे

इसे, जो झ्रापका ऐसा छुद्र भाव इुआ, मुझे मजूर है और यद्द वाल्क आपकी सेधामें तयार दे ( ज्ञीवन्धरको बह साधु पढ़ावा दे ओर भद्प समयमें ही वद उसे सर्व विद्याश्रोमिं अगुआ कर देता दै ) साछु--( जाद्घरकोा सब विद्याओंम पारंगत हुआ ज्ञान )

यत्स ! में क्राज तुझे पक कथा खुनाता ह' उसे तू ध्यानपूर्वक सुन ओर बहुतसे भेदोंको समकझ। पक लोकपापक्त नामका विद्याघर काई निर्मित पाकर मुनि दोगया, मगर कर्मोद्यसे उसे भस्मध्याधि नामका रोग होीगया जिससे वह धर्मश्रषट दे ध्धर उधर खानकलििये भटकता फिरा, ढेक्रिन उसका वह राग कहीं पर शमन हुआ अस्तमें उसका बह रोग तुझ मद्ासाग्यकें फर-फ़ै्मलके खानेमात्नस शांत हो गया। फिर उलने तुझ्के उक्ष मद्दान उपकारकी कुछेक पति निमित्त विद्वानोंमें झ्रग्रेतर बना दिया तुम राजा सरत्यंध्रके प्रतापी पुत्र जीव'धर ही, तुम्हारे पिताकी दस दुष्ट काष्टरांगारने' विश्वासलघात फर मार राज्य लिया शोर तुम्दारी माता भी इसी फारणसे भ्राज दारुण दुभ्खोंका अनुभव कर रही हैं | इत्यादि सारी कथा खुनादी जीव॑ंधर--६ क्रोचगें आकर )

दुष्ट काप्ठांगार तू ने क्या पिता मेरा हना।

क्ृतप्नी ! आज तू अन्यायसे राजा वना

दुःख दीना मातको तुभको छोट्ट' अब कभी

तुझे मे यमलोक भेज रे दुराचारी अ्रभी॥ '

जज फस2०

३० ग्रीवंधर-नाटक

>>... >तपननक लिन तलचच लव बच लव चल ््च्च्च 5

घरे पापी, चेईमान, दमाघाज, नालायक ! देख में तेरे किये का कैंसा फल चखाता ह' ( फहऋर ज़ानेको तयार द्योठा है ) साधु-- रोककर ) पुत्र | ध्यभी यह विच्रार दीक नथों हैं। इस समय घर्य घरना दी ठोक है ! पश्रभी समय उपयुक्त नहीं हैं | जीवंधर-( हाथ जऊं'ड़ ) . पृज्यवर ! जाने मुझे दीजे अभी मत रोकिये उस दुराचारी कृतप्नीपर दया नहि कीजिये अमी जाकरके लऊं में खबर उस वदकारकी महापापी ! दुएट उस निलज्ज काष्टांगारकी है गुरूचय ! मु राकिये, मेरी श्रांखोर्में खून वरस रहा है। साघु-द्े मद्यामाग ! मेरी चात माद ओर अभी इस विपय 'पर मत दे ध्याव। जब समय आयगा तव इसका