सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्तित हैं पहला सस्करण १६४० .दूसरा सस्करण १६५४० तीसरा सस्करण १६५०१ चौथा सस्करण १६४२

मूल्य राज सस्करण ९) साधारण चर्जिल्द !॥॥) साधारण अजिल्द /॥)

प्रकाशक : नीलाभ प्रकाशन गृह, ४. खुसरो बाय रोड, इलाहाबाद

भुद्रक : इलाहाबाद ब्लाक वक्‍स लि०, जीरो रोड, इलाहाबाद

डा० एम० एन० शर्मा के नाम जो मेरे बडे भाई भी है ओर सित्र भी /

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पूत कपूत होते है, पर पिता कुपिता नहीं होते लेकिन क्यो इस बात पर पिता कभी विचार नही करते

स्वार्थ हमारे उन 'गुणो' को उजागर कर देता है, जिनके अस्तित्व से हम, अपने निःस्वार्थ क्षणों मे, सदैव इनकार करते हैं

“दि! को किस ने जीता है !

लेखक की आर से

“छुठा बेठा' मेरे उन दिनो की याद है जब दिमाग खासा परेशान था, मुझे स्मरण हे, मैंने इसका पहला दृश्य लिख कर अपने मित्र राजेन्द्रसिह वेदी को सुनाया (जो स्वय उर्दू के बडे सिद्ध कथाकार है ) तो उन्होने आश्चर्य प्रकट किया कि में कैसे ऐसी परेशान-दिमागी में हास्य का सूजन कर सकता हूँ। लेकिन जैसा कि मैंने हास्य-व्यस्य की अपनी ४२ कहानियो के संग्रह छीटे' मे लिखा है--पहले भावुकता ऐसे अवसरों पर बडी करुणाजनक चीजे लिखा लेती थी, पर वाद को उन्हीं बातो पर हँसी आने लगी। यह भी हो सकता है कि ज्यों ज्यो मस्तिष्क पौढ़ होता गया चीजों की वास्तविकता समझ में आरती गई और जो बाते पहले क्रोध अथवा ज्ञोभ उपजाती थी, वही हास्य उत्पन्न करने लगी

'छठा वेटा'ँ को लिखे लगभग ढस वर्ष होने को आये हैं। आज यद्यपि इसकी प्रतिक्ृवतिं ( ?6४767४ ) मुझे पसन्द नहीं और आज यदि में ' स्वप्न-नाटक लिखूँ तो शायट कोई दूसरा ही आकार अपनाऊँ, पर जहाँ तक शेप बातों का सम्बन्ध है, मुझे छठा बेटा आरम्म से अन्त तक पसन्द है

इसका मूल-भूत-विचार (जैसा कि मेने अपने लेख "में नाटक केसे लिखता हूँ? #& में लिखा हे) मेरे मन में प्रीतव नगर ( अमृतसर ) से अटारी तक, दस मील का लम्बा मार्ग एक इक्के पर ते करते हुए, पैदा हुआ

के अश्क जी के प्रसिद्ध नाटक सग्नह आदि-मार्ग' की भूमिका |

डे

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किसी जरूरी काम से में लाहौर जा रहा था। प्रीत नगर से मील डेढ मील चल कर लोपोके से इक्का मिलता था। इक्का भरा होते कोई बात नहीं, एक सवारी की जगह तत्काल मिल जाती थी, खाली हो तो कई बार घण्टों रुकना पड़ता था। यू० पी० वाले पजाबी इकके वी कल्पना नहीं कर सकते। यहाँ का नवाबी-इक्का ऐसे लगता है जैसे बुर्का घोडे के बल पर उडा जा रहा हो और पजाबी इक्का, जैसे छोटे मोटे मकान को पहिये लग गये हो। बु्कें क्यो कि एक ही आदमी ( औरत ) कौ गुजाइश होती है, इसलिए इघर के इक्के में एक ही आदमी आराम से बैठ सकता है, यो बैठने को तो तीन चार भी लट्के चले जाते हैं, पजाबी इक्के में साधारणत- पॉच छै आदमी बैठते है, लेकिन पुलिस का डर हो अथवा देहात का रास्ता हो तो इक्के वाले आठ आठ दस दस सवारियाँ भर लेते हैं

इक्का मुझे लोपोके मे मिल गया, परन्तु खाली था। उसके भरने की राह देखने का समय मेरे पास था, इसलिए मैने इक्के वाले से कहा कि वह और सवारियाँ देखे, रास्ते मे यदि मिल जायें तो ले ते नही पूरे इक्के के पैसे में दे देँगा

आश्वस्त होकर इक्केवाले ने लगाम का सिरा हवा में घुमाते हुए व्व्कारी भरी। लेकिन अमी घोड़ा हिला भी था कि गाँव से दो मुसलमान बूढ़ियाँ हाय तोबा मचाती ओर इक्केवाले को आवाजे देती भागी आयी। पास आने पर उन्होंने बताया कि उनके लिए इसी घी गाँव से चलना अति-अनिवाय्य है, कि गॉव का दाना पानी उनके, लिए, हराम हो गया है, कि इक्के वाला उन्हे ले जायगा तो उसका सवाब ( पुण्य ) होगा ..,

इक्के वाले ने मेरी ओर देखा। मेने कहा, “बैठा लो। पीछे बैठ जायेगी, इक्का भी उलार ४8 होगा ।”

8४ आगे को | ;

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वह बात क्‍या थीं जिसके कारण उन बूढ़ियो के लिए लोपोके का दाना पामी दृसम हो गया था, मुके यह पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। इक्के की पिछली सीणो पर आमने सामने बैठते ही उन्होंने कोसनों और गालियो का जो सिलसिला आरम्म किया, उस से म॒ुके पता चल गया कि एक बुढिया अपने बड़े लड़के के यहाँ किसी उत्सव पर लोपोके गई थी और अपने साथ अपनी खाला-जाद बहन को भी लेती गई थी। अपनी बड़ी बहू के दुर्व्यवहार से तग आकर वह उत्सव को बीच मे ही छोड़, लड़ लड़ा कर चली आई थी और अपनी बहन को भी साथ लेती आई थी। दस मील की यात्रा का एक तिहाई भाग उसने अपने बड़े लड़के और बड़ी वहू को गालियाँ देने में गुजारा सास होने के नाते, अपने बेटे और बहू से उसकी वही शिकायत थी, जो पुरातन काल से ककंशा और ईर्षालु सासो को होती आई है

फिर जब उसके मन का उबाल कुछ शॉत हुआ तो उसने अपनी उस

।, खाला-जाद बहन को अपनी दुख-गाथा सुनानी आरम्भ की ( पहले

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कितनी बार खुनाई होगी, इसका व्योरा मेरे पास नहीं है ) और मुझे पता चला कि किस प्रकार पति के मर जाने पर उसने स्वय महनत मजूरी

, करके अपने तीनो बच्चो को पाला . , किस प्रकार बड़ा बेटा उस , कमीनी' बहू के आते ही अलग हो गया . .. किस प्रकार उसने अपनी

आशाएँ, मम्ले पर केन्द्रित को, किन्तु उस बडे को देख कर वह भी विवाह के पश्चात अलग हो गया. ... तब बुढ़िया कई मील तक मेँमले लडके और उसकी बहू को गालियाँ देती रही। अन्त में उसने अपने छोटे लड़के का जिक्र आरम्म किया कि वह कितना सुशील, समझदार ओर आज्ञाकारी है। खुदा के बाद यदि वह किसी पर यकीन रखता है तो वह उसकी वही माँ है। अपने छोटे लड़के के गुणों का बखान करते करते वृद्धा की वाणी की ककशता एक विचित्र आद्र-तरल-स्निग्धता में परिणित हो गई। अपनी मैलो ओढनी से अपनी नाक साफ करते हुए

घर

अन्त मे उसने सजल वाणी में कहा कि बस वह तो खुदा से दिन रात ही दुआ करती है कि उसके बच्चे का घर बस जाय तो उसके मन को भी सुख-शान्ति मिले |

उसकी इस आकॉक्षा को सुन कर में मन ही भन हँसा | उसका वह सुख-शॉति का अरमान ऐसा था जिसका पूरा होना उस .परिस्थिति भे नितान्त असम्मव था | निश्चय ही वह तीसरे बेटे का विवाह करेगी, मैंने सोचा, उसी अरमान और चाव से जिसके साथ उसने पहले दो पुत्रो का विवाह रचाया था, परन्तु उसका वह तीसरा पुत्र अपने भाइयों के पद-चिह्ो पर चलेगा, इसकी कोई सम्भावना थी, क्योकि उस बुढिया के रहते किसी बहू का उसके घर रहना उतना ही असम्भव था जितना किसी बहू को उपस्थिति में उसका रहना |--उसकी वह आकॉच्षा मुझे मानव की उस छली आकाच्ा का अतीक लगी जो कमी पूरी नहीं होती

उस यात्रा के बाढ इक्के का वह सफर, वह बुढ़िया, उसकी बातें, उसकी वह कमी पूरी होने वाली आकॉक्षा, मेरे मन-मल्तिक में घमती रही। मेरा विचार उस पर कहानी लिखने का था, परन्तु फिर अपने आस-पास कुछ ऐसे पात्र मिल गये, जिनकी आकॉच्ला भी उस बृद्धा की अमिलापा की भाँति कमी पूरी होने वाली थी। तब मैंने उस मूल-भूत विचार में ये नये पात्र फिट कर दिये और 'छठा वेटा,' तैयार-हो गया |

गत वर्ष छठा वेटा! इलाह्मबाद यूनिवर्सिटी तथा बीकानेर में खेला गया है। मुझे प्रसन्नता है कि दोनो जगह बड़ा सफल हुआ | इलाहाबाद मे तो दर्शक (जिनमे स्वय लेखक भी था) हँसी के मारे लोट पोट हो गये। वृत्य और गान के अमाव में भी व्यावसायिक रग मच पर यह कितना सफल हो सकता है, इसका भी पता चला

४. खुसरो बाग रोड ३, ३, ४२ उपेन्द्र नाथ अश्क

ज्न्त्जा | च४

.... विवेचन

* पाँच अको का लम्बा ऐतिहासिक नावक जय पराजय लिखने के ' चाद अश्क जी ने लिखा था कि उस तरह का कदाचित्‌ वह उनका पहला » और अन्तिम नाटक हो। कारण स्पष्ट करते हुए उन्होने लिखा था कि * आज मशीनी युग के व्यस्त जीवन से, हमारे पास उतने लम्बे नाटक 5 खेलने का अवकाश है, उन्हें देखने का और नाटक मुख्यतः देखने की ? ही चीज है ओर जय पराजय' के बाद अश्कजी ने स्वर्ग की भलक! लिखा जो ऐतिहासिक ऊहापोह था, बल्कि एक सीधा-साधा सामाजिक व्यग्य-नाव्क था। अभिनय की दृष्टि से भी उसका ड्यूरेशन चार या पाँच , बडे हो कर केवल डेढ़ दो बल था। लेकिन जहाँ तक नाटक की अभिनेयता का सम्बन्ध है, अपने प्रस्तुत जाठक छुठा वेठा' मे अश्क जी “जय पराजय और 'स्वर्ग की कलक' से 8 एक पग आगे बढ़े ह। जय पराजय' तो खैर पुरानी शैली का नाठक है--पॉच अक, यत्येक अक में पॉच-पॉच दृश्य, और सकलन-त्रय रहित 8 ( समय, स्थान तथा अभिनय की इकाइयाॉँ उस से सम्भव हैं, अमीष्ट )

किन्तु स्वर्ग की केलक मे भी जो आधुनिक शेली का खासा मनोरजक और / सतुलित नाटक है, नाटकीय रचना की उपयुक्त तीनो इकाइयाँ पूर्ण-रूप से / सम्पादित नहीं हो पायी

प्रस्तुत नाठक छिुठा बेशों इस दृष्टि से पूर्श-रूपेण सफल है।

एक ही बरामठे' में पूरा नाटक खेला जा सकता है। उसकी अवधि भी उतनी ही है। उतनी ही अवधि ओर केवल उस बरामदे भर स्थान में ही बंसन्तलाल, उनके मित्र दीनदयाल, दूर के भाई चाननराम और पडित जी के छह्ठो वेटो का सम्पूर्ण चित्र उनके पूरे विवरण ( 0०/87]8 ) के साथ अत्यत सफलतापूर्वक उपस्थित कर ठिया गया है

बन अल.

फ्तर

हिंदी में इस ढंग के और नाटक हो, यह बात नहीं। का्-छा कर वे रगमच पर खेले जाने योग्य भी बनाये जा सकते हैं, परन्तु के सम्बन्ध में सब से बड़ी शिकायत यह है कि पढ़ कर उनसे आन नहा उठाया जा सकता। [प्रथ्वीनाथ शर्मा के दुविध्राः अपराधी! आई सेठ गोबिन्दगास के दलित कुसुम, कत्त व्य, कुलीनता' आए प० लक्ष्मीनारायण मिश्र के आधी रात', 'सन्द्र की होली इसी प्रक के नावक है | गोविन्द वल्लम पत के नाटक ६वरमाल » राजमुकुट अगूर की बेटी! अपवाद है। ] इसके विपरोत 'छठा बेटा! पूर्णतया आऑर* नेय तो है ही, साथ ही इस में यह गुण भी विद्यमान है कि यह जैने जी के शब्दों में 'सुपाव्या भी है--अर्थात्‌ इसे आप एक रोचक कहा की तरह स्सपू्वक, बिना ऊबे पढ़ सकते हैं और उतना ही आनः प्रात कर सकते हैं, जितना शायट आप इसे देख कर प्राप्त करते। अर यह लेखक की बहुत बडी सफलता है कि उसका नाव्क उपयुक्त दोः बॉके-तिरछे गुण पूरी मात्रा मे अपने अन्दर रखता है

इस सम्बन्ध में थोड़ा और आगे बढते हुए मैं यह स्पष्ट देना चाहता हूँ कि एक सफल अमिनेय नाटक ( या अधिक प्रचलि शब्दों मे 'रगमंच पर जमने वाले नाटक! ) के लिए यह आवश्यक नह है कि वह पढने मे भी उतना ही रोचक ओर सुन्दर हो! इस प्रकार नाटक की पाडुलिपि ऐसी भी हो सकती है कि आप यदि उसे पढने बैः तो शायद एक प्रृष्ठ के आगे ही पढ पाये। अपनी बात की पुष्टि लिए. मैं श्री बलराज साहनी द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक “जा: की कुसी का उल्लेख करूगा ! जिन्होंने यह नाटक देखा है, वे इस बार से तो ,इनकार कर सकेंगे कि राजनीति को छोडे! तो, अमिनय तथ कला की, दृष्टि से यह एक अत्यत सफल नायक है और आदि से अन्त तक दर्शकों को -अपनी ओर आकर्षित रखता है। ,किन्ठु इस नाटक के पाइलिपि में वह आकर्षण! नहीं। ठहाका तो दूर रह, ओठो पर मुस्कराहट

प्र

तक नहीं आती | बहुत सी बातें, जो श्री बलराज ने अपने' अभिनय द्वारा पैदा की हैं, उनका पाडुलिपि मे कोई अभास तक नहीं है। “जादू की कुर्सी! अभिनय की दृष्टि से कितना भी सफल ओर मनोरंजक क्यो हो, सुपाख्य नहीं--सिविक लिवर्टी और सिविल लिबटी को सिवि--कर लिवर! और 'सिवि--ल लिवर्टी कह कर श्री बलराज ने बार-बार लोगों को हँसाया, पर मसौंदे में (सिवि--क्र लिबर्टी! और 'सिवि--ल लिवर्टी! किसी प्रकार का हास्य उत्पन्न नही करते। यही हाल अधिकाश सम्बादों का है जिन सम्बादों को अपने अद्वितीय ढंग से अदा करके श्री बलराज ने जनता को हँसा कर लोट पोट कर दिया, वे अपने मे विर्स और सपाठ है|

लेकिन छुठा बेटा! ऐसा नाठक नहीं। वह रक्ष-मञ्ञ की दृष्टि से भी सफल है और अपने लिखित रूप मे भी आपका पूरा-पूरा मनोरजन करने में समर्थ है। वह बहुत कुछ शा, माँहम, वाइल्ड, बैरी आदि के नाय्को जैता है, जो दुधारी तलवार है--पढे जाने पर भी तेज, पैने अचूक ओर खेले जाने पर भी। श्री बलराज साहनी के नाटक की तरह इसका लिखित संस्करण कमजोर नहीं है

इस साफलय की प्राप्ति के लिए अश्क जी ने अपने तरकश के सभी अचूक तीर छोड़े हे--प्रारम्मिक पकड़, हास्य-व्यग्य, चरित्र-चित्रण, संवाद, कहानी, नाटकीयता और आकस्मिक समाप्ति और यही कारण है कि कुल मिला कर यह नाटक, नाटकीय-कला-कौशल की एक अपूर्व कृति हो गया है। *

नायक प्रारम्भ होते ही शिथिल और ऊबा देने वाली चाल से नहीं चलता, बल्कि बहुत शीघ्र गति. पकड़ लेता है। नाटक की इस प्रारम्मिक पकड़ में, अश्क जी स्वर्ग की कलक! की अपेक्षा छुठा बेटा! मे अधिक सफल हुए है। दर्शकों (या पाठकों ) के ध्यार्न को अपनी ओर आकर्षित कर नाटक, ज्षिप्र-गति से आगे बढता जाता है। कही रुकता, उलमतता या ठहस्ता-सा प्रतीत नहीं होता। नाटक के. आरम्म होते ही हम नाटकीय

ष्ः प्‌

कार्य-व्यापार और पात्रों के साथ आगे बढते चले जाते हैं

रहा हास्य-व्यग्य तो यह क्षेत्र अश्क जी का अपना क्षेत्र है। उनके एकाकी नाटक जोक, आपसी समझौता”, “चमत्कार', तौलिये',' 'अजो दीदी, उच्च कोटि का हास्य प्रस्तुत करते हैं, अधिकार का रक्तक', बहने, विवाह के दिन, 'भेंवर' में व्यग्य का जब॑ंदस्त पुट है

लेकिन इन नाटकों ओर “छठा बेठा' में, हास्य-व्यग्य की दृष्टि से बहुत बड़ा अतर हैं। एक साथ इतना अधिक हास्य अश्क जी ने अपने किसी नाठक में प्रस्तुत नहीं किया। नाठक के आरम्म से ही धीरे-धीरे हास्य की अवतारणा शुरू हो गयी है। आरम्म मे रह्च-मश्न निर्देश क॑ सूचनाएँ हल्के से व्यग्य का पुट लिये हुए हैं। डाक्टर हसराज जब कहते है, 'म डाक्टर हूँ, मेरी पोजीशन है” तो उसके पहले ब्रेकेट में लिखा है ( जैसे वे डाक्टर विधानचन्द्र राय से क्‍या कुछ कम हैं), जब गुरु अपने वाप की आलोचना करता है, “वे मूछे रखते हैं जिन पर नींद टिके सके और हमारे ऐसा भी मालूम नहीं होता कि देव ने उन्हें कर्मी पैदा मी किया था... ? तो चाचा चाननराम हँसते हैं। ब्रेकेट में लिखा है (तुम ग्भी बच्चे हो, त॒म्हरी यह चचलता क्षम्य है, के से भाव से) ठेव की हँसी की उपमा शरद के पीले-से सूरज की हँसी से दे ऋर उस गरीब क्लर्क की जिन्दगी और उसकी थकन को व्यक्त कर दिया है। कऔलाशपवि के सम्बन्ध में लिखा है, 'किलाश के पति में और इन में इतना ही अन्तर है कि यह तीसरी आँख से नहीं देखते फ़िर जब पडित बसन्तलाल के नाम तीन लाख की लायरी जाती है तब डॉक्टर हसराज के विनम्र खुशासदी माव का खाका इन सुन्दर शब्दों मे खींचा है--सामने कुर्सी पर डॉक्टर हँसराज बेठे हैं ओर आकृति उनकी उस कुत्ते की सी बनी हुई है जो मालिक को खाना खाते देख कर दुम हिलाता हुआ, विनम्र, खुशामदी, लालसा भरी दृष्टि से तकता हुआ, घुटने टेक कर बैठ जाता है कि तनिक मालिक का ध्यान हो तो दुस हिलाये उसमें और

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इनमे अन्तर मात्र इतना ही हे कि इनके दुम नही जिस ये हिला सके |?

ये और- रचमंच-निर्देश की अन्य सूचनाओ में ऐसे अनेक स्थल अना- यास ही हमारे ओठो पर मुस्कराहट की रेखाएँ दौड़ा देते है | ये मुस्कराहट की रेखाएँ सवादो तक पहुंचते-पहुचते हँसी का रूप धारण कर लेती हैं | ओर अभिनय-स्थलो पर पहुचकर तो दशक ठहाके के मारे कुर्सियो से उछल पड़ते है। नाक में ऐसे संवाद तथा अमिनय स्थलों की कमी नहीं |--- आरभभ में जब पाँचो बेटे अपने पिता को अपने पास रखने में असमर्थता 'प्रकट करते हैं और उनके बड़े बेटे डा० हसराज खीजते हैं कि पिता जी 'को 'आय लाने के लिए दस का नोट क्‍यों दिया गया, कि उनके पिता ' पडित बसन्तलाल नगभे में थुत्त, आटे के बदले लागरी का टिकट खरीद “लाते है और डॉक्टर साहब अपनी पत्नी पर भल्लाते हे कि उसने उन्हें दस का नोट क्यो दिया--लेकिन जब उसी टिकट के कारण लाटरी जाती (है, कमला सादगी से कहती है--वे रुपये तो हमारे थे, लागरी का रुपया तो हमे मिलना चाहिए। और डाक्टर साहब बविवशता से उत्तर देते ' है--.पर डरबी वाले तो यह वात नहीं जानते ! फिर राय साहब चम्पाराम | बाला किस्सा, दीनदयाल का पडित जी के जोर देने पर शराब का | गिलास खाली करके रुमाल से मुंह साफ करके कहना, “म्हे तो पता है, मैं ' रवि और मगल के दिन नही पीता' और इस पर पडित बसन्‍्त लाल का अपने लडको को सुनाकर कहना, “और यह कम्बख्त कहते है कि तुम शराबी हो, देखो कितना सयम है. दीनदयाल में ! यह रवि और मगल के दिन नहीं पीता, यह इस युग का राजा जनक है। ये और अन्य कई ऐसे मसंग हमे हँसने पर विवश कर ठेते हैं। साथ ही हमें लेखक की उस बारीक नजर का भी कायल होना पड़ता है जो इस मशीनी-युग के तलख और सघर्षमय व्यस्त जीवन के अन्दर भी ऐसे हास्यपूर्ण प्रसग हढ़ लातो है .. ..और इन सब ग्रसगो के ऊपर ठेव, कैलाश आदि को घुटे सिर खड़ी चोटी लिये रंगमच पर प्रवेश करते देख हम खिलखिलाये बिना नहीं रह सकते |

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और जब सिर घुठाये जाधिया पहने, तेल की मालिश से शरीर चमका नाजुक कवि हरेन्र और 'मावी आई० सी० एस० गुरु रंगम पर आते हैं तो फिर हँसी का तूफान बरपा हो जाता है। उसके बाद उर घजा में उन लोगो को, दौड़ कर चिलसे मरते हुए, पंडित जी से पं८ लड़ाते हुए, कुक कर शराब के गिलास पकड़ाते हुए, पंडित जी की में बडे हास्यास्पद तौर पर हाँ मिलाते हुए, और ( अपने सिद्धान्तों' विरुद्ध ) चचा चाननराम के पॉव छूते हुए देख कर तो कुर्सी पर बै रहना मुश्किल हो जाता है

चरित्र-चित्रण की दृष्टि से, जैसा कि मैंने पहले कहा, अश्क जी, पड़ित बसन्तलाल, ठा० हसराज ओर माँ के चरित्र अत्यन्त सुलः रूप से पेश किये हैं। यह बात नहीं कि शेष चार भाइयों, चचा चाननरा ओर कमला के घरित्रो की लेखक ने नितान्त उपेक्षा की है--उन्हें+ अपने ब्रश के चन्ढ हल्के स्पशों से स्पष्ट कर अश्क जी ने अन्त तः* निभाया है, किन्तु पहले चार पात्नो के साथ उन्होने अधिक श्रम किया ओर अधिक बारीकी से काम लिया है। अपने उपन्यास “गिरतीः दीवारें मेभी अश्कजी ने शराबी पिता का चरित्र उपस्थित किया है, किन्तु वः चरित्राकन इतना सुन्दर और झुघड़ नहीं हो पाया जितना छुठा बेढा के शराबी पिता का गिरती दीवारें का शराबी पिता क्रूर है, लेकिन 'छठ बेटा? का शराबी पिता शराबियों के समस्त गुण-दोषों से युक्त है। वह कू भी होगा (हालाँकि प्रस्तुत नाटक भें उसकी ऋरता का कोई उदाहरण नह मिलता ) लेकिन शराबी की उदारता, सहृदयता, भावुकता, रुपया उड़ाने क॑ क्षमता और मस्ती पूरे तोर पर चरित्र में विद्यमान है। पंडित वसन्त लाल का चरित्र ऐसा खरा, सुन्दर और सहानुभूतिपूर्ण उतरा है कि अश्क जी को दाद देने को जी चाहता है

समय-साधक मित्र के रूप में (जो साधारणतः शराबियों के साथ लगे रहते है) दीनदयाल का चरित्र अत्वन्त यथार्थ है। उनके अनुमात

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(-००पाठा7073 ) बहुत सच्चे हैं। मानव-हृदय का तथा उनके मनो- बरशन का इतना यूढ़ अनुभव यदि अश्क जी को होता तो कदाचित्‌ | चित्रों म॒ इतना वास्तविक रंग भर सकते। ऐसे चरित्र-चित्रण केवल इल्पना ही के बल पर नहीं किये जा सकते।

रही माँ, तो शायद नाटककार की समवेदना सब से अधिक उसी गे मिली है। केवल यही एक पात्र है जो नाटक के हास्य में गाम्भीय की खा खींचता चला जाता है। अंत के दृश्य में तो माँ की व्यथा अनायास छय को छू लेती है | '

सवाद लिखने में /अश्क जी को कमाल हासिल है, यह वात में फेर ढोहराना चाहूँगा। छुठा वेटा' के सवाद वेजोड़ हैं। उनके कारण त्नोका चरित्र-चित्रण अधिक निखर गया है। साथ ही हास्य-रस के ब्रतिपादन में भी उन्होंने पूरी सहायाता की है | सवाद अत्यन्त स्वाभाविक, ऐेचक, चुटीले और गतिशील है। सवादों की चुस्ती और उनके अन्दर नेहित वाक-वैदग्ध्य ही के कारण नाटक में अपूर्व गति है और वह कही उकता-सा दर्शंको को ठेवाने वाला नही सिद्ध होता है

लेकिन सबाद चरित्र-चित्रण और अभिनय स्थल जिस ढॉँचे को पुष्ट करते हैं, उसकी बनावट में भी लेखक ने चतुराई से काम लिया है। कथानक क्री दृष्टि से देखा जाय तो यह पूरा का पूरा नाटक इल्यूयन ( ॥]]09709 ) है। यथार्थ-जीवन में बहुत ही कम ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति को तीन लोख की लाटरी मिल जाय, तब उसके पुत्र गिरगिट की तरह थोड़ी देर के लिए, रद्ध बदल दे ; फिर पिता से रुपया भटक कर पूर्वंवतत हो जायें | लेकिन ऐसा हो सकता है; नाटक में वरणित घटनाएँ सम्भव हो सकतीं हैं, यह बात निर्विवाद है और मानव की सहज-स्वार्थभावना को लक्षित करती हैं उसमें अतिरजना हो सकती है, ( जो हास्य के लिए जरूरी है ) पर वह आधार भूत सचाई को नहीं कुठलाती। अश्क जी कथानक की इस कमजोरी को जानते ये। इसी कारण उन्होंने अ्रत्यन्त चतुराई से कथा के अमुख-अश को स्वम्त

श्र

का रूप दे डाला ओर नाथ्क को इस कमजोरी से मुक्त कर दिया। आः नाटक की कथा असम्भव नहीं लगती, क्योकि वह स्वप्न में घटती है। स्वप्त प्रायः इस अकार के भी होते हैं, वल्कि इस से भी अजीबो-गरीब तः होते हैं। पड़ित बसन्तलाल का इस प्रकार का स्वप्न 'देखना तनिक # अस्वाभाविक नहीं प्रतीत होता हु

विश्लेषणात्मक-दष्टि से ठेखने पर यह चीज भी स्पष्ट हो जाती है # पड्डधित बसन्तलाल का स्व॑प्त में अपने छुठे बेटे की वापसी देखन उनके अवचेतन मन की इच्छाओं का अमूत्त रूप है। जीवन मे जिः वस्तुओं अथवा प्रिय-व्यक्तियों को पाने की इच्छा ग्रायः हमारे अवचेतः मन में दबी छिपी रहती है, हमारे स्वप्नो मे वे ही- वस्तुएं अथवा व्यय प्रायः अपने घुंधले रूप में हमारे सम्मुख उपस्थित होते हैं हमे ऐसा भास होने लगता है, जैसे हम. ने उन्हें सचमुच ही छिपा लिय है। अपने छठे वेटे दयालचन्द द्वारा सुखन्य्राप्ति की अतृत्त इच्छा पडिः जी के अवचेतन मन में छिपी हुई थी! वही इच्छा अमूत्त रूप में स्वमद्दार साकार होकर थोडी ढेर के लिए पडित जी को वह, सुख पहुंचा देत॑ है जिसकी आकाजक्षा पडित जी को अपने यथार्थ जीवन मे थी। ओर पडित को ( स्वम्म मे ही सही ) वह सुख मिल जाता है, जो उन्हें जीवन में कम मिल सकता था, क्योकि दयालचन्द, यदि लापता भी होता बराबर उनके सामने ही बना रहता, तो वह भी अत में अपने अब भाइयों की तरह अपने पिता की ओर से मेह मोड लेता और पुत्री की इस उपैज्ञा के उत्तरदायी पडित बसन्तलाल स्वय ही हैं। वे कुछ ऐसे वेढब् आदमी है, और उनकी आदते इतनी विचित्र तथा दूसरा को परेशान « अपमानित करने वाली है कि कोई भी सभ्य ओर इज्जतदार सचेतन पुर उन्हें अपने साथ नहीं रख सकता, चाहे दिल में वह उन्हे कितना भी प्यार क्यों करता हो ! छुठा बेटा दयालचन्द भी उनकी अनिमत्रित ओर विचित्र ढग की सम्ब आदतो” से बहुत शी्र उकता जाता- और अपने भाइयों

20.३

की तरह स्पष्ट कह देता कि में 'पिता जी के साथ एक मिनठ तो क्या एक सेकेए्ड भी नहीं रह सकता !? लेकिन क्योकि दयालचन्द सामने नहीं है, इस कारण पडित बसन्तलाल अपने अवचेतन मन में इस विचार को उसेये हुए हे कि यदिं उनका छुठा वेटा होता तो वह अवश्य उनकी सेवा करता जब कि यथार्थ में यह बात नहीं है सूक्ष्म हेत्वाभास (5709 ई8]52९) ही (इस नाटक का आधारसूत-तत्व है। छठा वेठा मानव की उस आकाक्षा का हप्रतीक हे जो कमी पूरी नहीं होती

अश्क जी बहुत सतक कलाकार ह। उनकी रचना में लापरवाही या प/टालने का भाव! कही भी नहीं दीख पड़ता। अपने आलोचकों को उँगली बंठठाने का अवसर वे कही भी नहीं देना चाहते। प्रस्तुत नाटक में भी इन्हें यह ध्यान वराबर है कि कथानक का मुख्य भाग पडित जी के स्वप्न किके रूप में रड्वमज़ पर उपस्थित किया जा रहा है और वे इस बात को पक्षी जानते हैं कि स्वम्त कभी स्पष्ट और ऋमपूर्ण नहीं होता, बल्कि हमेशा प्रयंधघाला ( प5ठ५७ ) और अस्पष्टससा होता है| कही पर बहुत चटक और व्कही अत्यन्त आउट आफ फाकस! रह्मख् टेकनीक का भी उन्हें वझपने आलोचकों से अधिक जान हैं और यही कारण है कि उन्होने #न्राटक्क का अन्तिम दृश्य छायाओ के रूप में अस्ठुत किया है। क्योकि ता # स्वप्न वराबर जारी है और अब समाप्ति पर है, इस कारण वह घुँघला “और अस्पष्ट सा पड़ने लग जाता है व्यक्ति नहीं, बल्कि छावा-मूतियों अरब स्वप्त में घूमने-फिरने लगती और केवल उनके स्वर से ही अनुमान किया जा सकता है कि यह अम्ुक-अमुक व्यक्ति है। अश्क जी के इस ऐ/अपूर्व नाटकीय-कौशल ( 5858 ००की ) पर उन्हें बधाई देने की इच्छा वेश होती है हिन्दी नाटकों मे यह अपने ढग का एक नवीन प्रयोग है।

॥४ नाटक इस छाया-मय कथा, उसे पुष्ट करने वाले हास्य व्यग्य- रविंयू्ण सम्बादों तथा अभिनय-स्थलो के वल पर बड़ी तेजी से चलता हुआ आहिमारी उत्सुकता को चर्म-विन्दु पर ले जाकर अत्यन्त अप्रत्याशित रूप छे

श्श्‌

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समास हो जाता हैे। एक वार हसे आधात सा -लगता है। फिर एक लम्बी सॉस कुछ सुख की, कुछ दुख की--हमारे अन्तर की गहराई से निकत लाती है ओर हम तरह तरह से सोचते हुए घर चले आते हैं | पडित बस लाल अथवा उनके पुत्रो की समस्या एक एक रूप मे हमें अपनी समस्या लगती है और यही मेरे विचार मे लेखक की सबसे बड़ी सफलता है यो छुठा वेटा' का एक सुनिश्चित रूप है। ब्लायिज्न पर फेली स्याहै की बूद की तरह उसका खाका नहीं है। उसका चित्र बन सकता है उसमे आरम्म, गति, सघप, क्लाइमेक्स--नाटकीय कार्य-व्यापार की सा अबस्थाएँ पायी जाती है छुठा बेठझ! के बाद अश्क जी ने और भी अधिक प्रौढ और सशस् नाटक आदिन्मार्ग, 'डजो दीदी, भेंवर', केद', 'उडान! आदि लिखे हैं, किर जहाँ तक हास्य और गाम्मीरय के सम्मिश्रण का प्रश्न है, उनकी प्रतिभा छूट बेटा) को नहीं छू सकी है। १६ पाक रोड इलाहाबाद दिसम्बर २३---४६

सत्येन्द्र हे

छठा बेटा

पात्र पं० बसन्त लाल--रेलवे के रिटायर्ड पदाधिकारी

डाक्टर हंसराज )

हरिनाथ (हरेन्र) |

देवनारायण |,

कैलाशपति » पंडित बसन्त लाल के छे लड़के गुरुनारायण

दयालनन्‍चन्द )

मॉ पंडित बसन्च लाल की पत्नी कमला पंडित जी की बहू, डाक्टर हसराज की पत्नी दीनदयाल पंडित जी का मित्र

चाननराम दूर के रिश्ते में पडित जी का भाई हरचरण नौकर

मुट्ठ

[डाक्टर हंसराज का मकान (जो वास्तव मे डा० हसराज का किराये का मकान है) कुछ इतना बड़ा नहीं | पूरा मकान भी यह नहीं | एक बड़ी इमारत का केवल एक भाग है--तीन कमरे हैं ( यद्यपि शब्द कमरे उन १२४११ फुट की दो, तथा १०२८८ फुट की एक कोठरी के लिए अधिक आदर-सूचक प्रतीत होता है। ) एक स्नानंण्ह है ( जो सीढ़ियो के नीचे बच जाने वाली छोटी-सी जगह मे, तखता रूपी किवाड़ लगा कर बना दिया गया है ओर जहाँ नहाने में दक्ष होने के लिए. कुछ दिन अभ्यास करना अनिवार्य है।) इसी स्नानण्ह के साथ छोटा सा रसोई-घर है---बस यही साढ़े तीन अथवा पोने चार कमरे डा० हसराज के इस मकान से है|

र६

केक

छठा बेटा

ऐसे ही चार भाग इस इमारत मे और हैं। पूजीबादी मनोवृत्ति से विपन्न-कृषको को बचाने के लिए, जब पंजाब सरकार ने साहूकारा-बिल की केची का आविष्कार किया

चाहे अस्थाई रूप ही से हो, किसानो के फठे काट दिये, तो उस मनोबृत्ति ने नये फठे' हूृढ़ निकाले। यद्यपि इन फदों के शिकार अब कृषक होकर निम्न-मध्य-वर्ग के नागरिक थे। इन्ही फंदों को मध्यवर्गीय शिक्षित समुदाय की भाषा में पोशंनज़ (०7078) अर्थात्‌ बड़ी इमारतो के किराये पर चढ़ाये जाने वाले भाग कहा जाता है। और पंजाब की राजधानी में ऐसी इमारतो की कमी थी, जिन से ऐसे दस दस फंदे निर्मित थे

पर्दा डा० हसराज के मकान, अर्थात्‌ पोशन के बरामदे खुलता है। बरामदा भी इस पोर्शन के अनुरुप ही है। रसोई-घर तथा स्नानशह इस के दायी ओर को हैं, सामने १९७११ फुट के दो कमरे है, जिन का एक एक दरवाजा वरामदे में खुलता हैं इन दोनो सामने के कमरो मे से दाये हाथ के कमरे और स्नान-ग्रह के मव्य एक मार्ग है, जो इमारत के दूसरे पोश्शनी के पास से होता हुआ इमारत के बड़े दरवाजे को जाता है। १२०८८ फुट का कमरा बयामदे के बायीं ओर को है, और आजकल वह डा० साहब के सब से छोटे भाई गुरु की अध्ययनशाला का काम दे रहा है रसोई-घर का और इसका दरवाजा आमने सामने है

यह बरामदा घर में एक महत्व का स्थान रखता है ओर पायः इस से खाने, बैठने और सोने के कमरो का काम

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छुठा बेटा

लिया जाता है। वरामदा डाइनिड्ड रूम हे--इस का प्रमाण रसोई-घर से तनिक हट कर विछी हुई दो चटाइयाँ देती है, जिन पर घर के सब लोग ब्रैठ कर अपनी बारी से खाना खाते है, किन्तु जिस पर इस समय ( मैदान खाली देख कर ) गणुशवाहन श्री मूषक जी महाराज मणरों अथवा टमाटरो पर टॉत त्तेज कर रहे हैं। ड्राइग रूम अशथांत बैठने के कमरे के नाते एक बैत का हल्का सा मेज ओर बैत ही की दो कुर्सियाँ बरामदे के मध्य पड़ी हैं। मेज पर एक कलम-दवात भी रखी है। स्लीपिज्ञ रूम--सोने के कमरे--के नाम पर तनिक बायी आर को हट कर, गुरु के कमरे के समीप, एक चारपाई बिछी हुई है |

समय क्या है, इस का अनुमान ही लगाया जा सकता है | बात यह है कि अपने समस्त महत्व के होते इस वरामद्रे को अभी तक एक्र क्लाक भो प्रास नही हुआ और जो छोटा टाइमपीस गुरू की अध्ययनशाला में मेज पर टिक- टिक किया करता है, उस की आवाज यहाँ सुनायी नही देती इसलिए, समय का “पता सरसोई-घर से आने वाली सुगंधि, अथवा मेज कुर्सियो से लेकर चारपाई तक एक बड़ी सी तिकोन बनाने वाली धूप ही से लगाया जा सकता है

लेकिन फरवरी का आरम्म है, इसलिए धूप पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। दिन बडे हो रहे हैं, जहाँ धूप आने पर पहले दस बजते थे, अब वहाँ आठ बजे ही धूप जाती है, इसलिए इस ओर से निराश होकर हमे स्सोई-घर की ओर नाक तनिक फुला कर

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छठा बेटा

सूधने का प्रयास करना द्वोगा। पकती हुई सब्जियों की सुगधि धूप की पाएव॑-मूमि के साथ बता रही है कि अभी नो, पौने नौ से अधिक समय नहीं हुआ

बरासदे में इस समय निस्तब्धता छाई हुई है। वास्तव मे आज गुरु की पहली दो घटियाँ खाली हैं ओर वह अपने कमरे में अध्ययन कर रहा है, नहीं तो इस समय तक वह आकाश-पाताल एक कर दिया करता है ओर बेचारे बरामदे के फर्श को, जो अहिसा के मामले में सोलहों आने महात्मा गाधी का अनुयाई है, कई बार उसके पदमहार, अथवा यो कहिए. कि बूठप्रहर सहन करने पड़ते है। डाक्टर साहब भी, जो इस समय तक-- “मैं कहता हैँ, मैंने एक पेशेट को समय दे रखा है”; “कमी समय पर खाना मुझे मिलेगा या नहीं? अथवा “जल्दी करो नहीं तो बिना खाये में चला जाऊँगा” आदि वाक्यों के गोले रसोई-घर पर बरसाते हुए, बरामदे से घूमा करते हैं, इस समय इमारत के बाहर चचा चाननराम के साथ घूम रहे हैं। चचा चाननराम डाक्टर साहब के सगे चचा तो नही, शरीके में से हैं, लेकिन अपना कोई चचा होने से डाक्टर साहब और उनके सब भाई उन्हें चचा ही सा मानते हैं। इसीलिए उन पर अपना कुछ अधिकार समझते हुए, एक विशेष मिशन को लेकर वे उनके पास आये है और उन्हीं की खातिर डाक्टर साहब ने नौकर को दुकान पर मेज दिया है कि यदि कोई रोगी जाय तो उन्हें तत्काल सचित किया जाय |

दर

श्र

छुठा बेटा

बरासदे में निस्तब्धता ऐसी है कि चटाई पर किट-किट करते हुए चूहे की आवाज साफ सुनाई देती है। इस निस्तव्धता को हम उच्छुकता भरी निस्तव्धता कह सकते हैं ऐसा मालूम होता है कि बरामदे के स्तम्भ, भेज, कुर्सियाँ, चारपाई, यहाँ तक कि धूप भी कुछ सुनने के लिए उत्सुक है, दर्शकों की उत्सुकता भी, लगता है क्रोध की सीमा को पहुचा चाहती है, इसीलिए शायद डाक्टर हंसराज चचा चामनराम के साथ इस निस्तब्धता और उत्सुकता को मिठाते हुए, स्नानण्ह के पास वाले ढरवाजे से बातें करते-करते दाखिल होते हैं

हंतराज : ये सौगंधें ! ( व्यग से हँसते है ) भूले से कद्दी गई बात का इनसे अधिक मोल होता है चाननराम : मुझ से उन्होंने. प्रण किया था

/० हसराज : ( व्यंग से ) सौगंध भी खाई होगी चाचनराम * ( चुप ! )

( चारपाई पर जाकर बैठ जाते हैं। )

हंसराज : ( दोनो हाथ कमर पर रख कर शब्दों पर जोर देते हुए ) यही तो में कहता हूँ। जब पहले के प्रण और सौम॑ंधें अभी तक पालन की बाट देख रही हैं तो ये कब पूरी होंगी

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छ॒ठा बेटा

5 हिंसते हैं ओर जैसे उन्होंने इस बात से चचा को निरुत्तर कर दिया हो, आराम से कुर्सी पर बैठ जाते है और ठागे मेज पर रख लेते है। ]

चाननराम : ( जो चचा हैं, आखिर यो हारने वाले नही ) पर भाई, समय भी तो अरब बदल गया है

डा० हसराज : ( वेपरवाही से सिर हिलाकर, जैसे इस बात का ड' तो गढा-गढ़ाया हे ) पर स्वाभाव तो समय के सा नहीं बदलता

[जिनकी प्रतिश्ञाओ, सौगंधो और स्वाभाव का ज़िक्र दो रहा है, वे इन डा० हसराज के पिता पडित बसन्तलाल के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं। अ्रभी- अभी वे रिटायर हुए हैं ओर] पाँच छे सहल का ऋण चुका कर प्रावीडेट फड से जो रुपया बच गया था, वह दो चार समाह ही मे उन्होने संडे, जुए. और शराब की भेंट कर दिया है और गुरदासपुर छोड़ कर यहाँ अपने बडे लड़के के पास गये हैं जीवन में दूरदर्शिता किस चीज का नाम है; यह उन्होने कभी नहीं जाना | छे जिसके लड़के हो, उसे भविष्य की चिन्ता हो, इससे विचित्र बात और कोई नहीं ससमते रहे | बडे गव॑ से सीना फुला कर, वे मित्रों के सामने

> सदेव कहते आये हैँ कि यदि हरेक लड़का दिन भर टोकरी ढोकर भी एक रुपया सॉक को कमा लायेगा तो छै रुपये हो जायेंगे, फिर में क्यो चिन्ता करू ! लड़को के ओोकरी ढोने की नोवत नहीं आईं, क्योंकि

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छुठा बेटा

किसी किसी प्रकार अपने पिता की मद्रपता के होतें हुए भी उन्होने शिक्षा प्राप्त कर ली है। डा» हंसराज सब से बडे हैं और डाक्टर है। दूसरे सुपुत्न लेखक है-- एक छोटान्सा प्रेस तथा मासिक पत्र चला रहे है, नार्म हरिनाथ है किन्तु हरेन्द्र कहलाना अधिक पसन्द करते हैं तीसरे देवनारायंण, छावनी के डाकखाने में काम करते हैं। चोथे अबोहर मे टिक्-क्लक्टर लगे हुए हैँ | नाम कैलाशपति है) केलाश के पति ओर इनमें इतना ही अन्तर है कि ये तीसरी आँख से नहीं देखते पॉचवों गुरु है, बी० ए० में पढ़ता है | परिश्रमी है और उसके बड़ा आदमी बनने के स्वप्न सब लिया करते है डा० हसराज, किसी श्रागामी सहायता के विचार से नहीं तो इसी ख्याल से --कि वे अपने रोगियों के सामने इस बात का उल्लेख बड़े गर्व-स्फीत स्वर में कर सकेंगे कि वह जो सबजज या मैजिस्ट्रेट या डिप्टी हे, मेरा हो भाई है, मेने ही उसे पढाया है---अपने इस पोर्शन का १० »( फुट का वह कमरा उसे दिये हुए है और उसके खाने का खच्च भी सद्दन किये जा रहे हैं। छुठा और सबसे छोटा लड़का पिता के व्यवहार से तग आकर जो भागा तो उसने चार वर्ष से कोई खोज खबर नहीं दी। दो चार गालियो के साथ--वह साला मेरा लड़का दही नहीं--इतना कह देने के सिवा, पिता ने उसका कभी जिक्र नहीं किया। भाई भी लगभग उसे भूल चुके हैं, इसलिए कि ज्नदि वह होता तो उसकी पढाई आदि कीं व्यवस्था भी उन्हें ही करनी होती (ओर यदि अब वह

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छठा बेटा

कहीं जाय तो डा० साहब तो इतने प्रसन्न हों कि एक दिन उनके घर खाना पके ) हाँ, माँ कमी-की रो लिया करती है। नाम भी भला-सा धा--दयाल- चन्द या कृपालचन्द, किन्तु इन पॉच वर्षों में घर वालो को वह भी-भूल-सा गया मालूम होता है |-- इसलिए. दयालचन्द को ( क्योकि उसका कुछ पता नही ) छोड कर शज्ेष सब टोकरी नहीं ढो रहे, किन्तु उनके पिता के चिन्ता अवश्य करनी पढ़ रही है और चचा चाननराम उनकी ही सिफारिश करने आये हैं--रिटयायर हो गये हैं, पास पैसा नहीं रहा। अब कहाँ रहें, यह समस्या है! चचा चाननराम का विचार है कि डाक्टर साहब के पास ही उनका रहना श्रेयस्कर है, क्योंकि गुरुदासपुर मे रहेंगे तो उनके मिन्नादि मिलेंगे, यहाँ रहेंगे तो कुछ सुधरे रहेंगे। परन्‍्ठ डाक्टर साहब ने टॉे हिलाते-हिलाते निर्णय कर लिया. है और वह निर्णय चचा चनानराम के सुनाने के लिए टठॉगें नीचे करके वे उठकर ब्रैठ गये हैं।]

ड्ा० इंतराज : देखिए चचाजी, में डाक्टर हूँ। मेरी पोजीशन है। मेरे यहाँ बड़े-बड़े पदाधिकारी आते हैं। पिता जी की गुजर यहाँ होगी। तीन चार दिन उन्हें यहाँ आये हुए हो गये हैं और इस बीच मे मेरी रात की नींद हराम हो गई है और में सोचने लगा हूँ कि यदि ढुछ देर और थे मेरे पास रहे तो मेरी सब प्रेक्टिस

रद

चानवराम :

) इंसराज :;

वाचनराम ; आखिर, . बह. . ..

छ॒ठा बेटा

चौपट हो जायगी भाग्य से झ्ञाज आप गये हैं। देव और गुरु भी वहीं है, हरेन्द्र को मेने बुलवा भेजा है। कैलाश किसी समय भी पहुँच सकता है | कल उसका पत्र आया था कि वह कल प्रातः की गाड़ी से आयगा ( कलाई पर घड़ी देखते हुए ) गाड़ी कब की स्टेशन पर पहुँच चुकी होगी और. .. ..

परंतु .. -! परन्तु नही चचा जी इस बात का निर्णय आज हों ही जाना चाहिए। में अपने उत्तरदायित्व से कन्नी काहूगा, कितु मेरे यहाँ सदेव के लिए उनका रहना नही हो सकता

कु

) हसराज : ( जैसे वे डा० विधानचन्द्र राय से क्‍या कुछ कम हैं)

43 अन्‍्म_न»म 9

में डाक्टर हूँ। मेरी पोजीशन है मेरे यहाँ बड़े बढ़े पदाधिकारी आते है। में वेटिंगरूम में तिनका तक तो रहने नहीं देता ( खड़े हो जाते हैं।) ओर ये कीचड़ भरे जूते लिये जाते है।

[ दोनों हाथ पतलून की जेबो मे डाले कुर्सी से चटाई तक और चटाई से कुर्सी तक एक चक्कर लगाते हैं--फिर रुक कर ]

में नौकर तक को मैले कपड़े पहन कर दुकान में आते की आज्ञा नहीं देत और वे टखनो तक ऊँचीं धोती- वह भी आधी--मैली सी खुले ग़ले की

बन

घ्छ

जि

छुठा बेटा कमीज पहने, नंगे सिर आते हैं और वैसे ही

कौच से आकर घेंस जाते हैं [ फिर कुर्सी से चटाई तक और चढठाई से कुर्सी तक चक्कर लगाने लगते हैं शुरु अपने उसी १० » फुट के कमरे से, द्वाथ में एक खुली पुस्तक लिये तेज तेज दाखिल होता है। दोनों य्कराते टकराते बचते है। दोनों एक दूसरे को थामते हैं और डाक्टर साहब कुर्सी तक अपना चक्कर पूरा करने और गुरु रसोई-घर को छूने चल देता है। ] गुरु : ( रसोईघर के दरवाजे को छूकर ) भाभी... . (दरवाजे को खोल कर सिर अन्दर करते हुए ) में कहता हूँ, मेरे जाने से केवल एक घंटा गया रह है।

[कुछ ज्ञण उसी तरह खड़ा रहता है फिर सिर बाहर निकाल कर और मुडकर --जब कि डाक्टर साहब उसी तर सिर नीचा किये, पतलून में हाथ डाले, कुर्सी से चठाई की ओर जा रहे होते ह--]

>-: लीजिए, पिता जी आटे की बोरी लेने गये हैं, वो चुका आटा | ( बेजारी से सिर हिलाता है। )

पितला हुबला, पॉच फुट साढ़े पॉच इच का शुवक है--रग गेहुआ, वाल लम्बे और चमक्रीले, लेकिन माथा बिलकुल छोगा--खडे कालरों चाली कमीज और पतलून के बावजूढ, शक्ल सूरत से जरा भी तो नहीं

श्प

छुठा बेटा

-लगता कि यह डिप्टी कमिश्नर, मैजिस्ट्रेठ, सबजज छोड़ मुख्तार भी बन सकेगा | किन्तु भाग्य अपनी विभृतियाँ ढेते समय शक्ल सरत कम ही देखता है | बहुत से सुन्दर मातहत युवक इस बात को भली-माँति समझते हैं | और इस समय तो डाक्टर साहब भी भूल गये हैं कि उनका यह भाई कमी डिप्टी होने जा रहा है, क्योकि ठे उसकी बात का उत्तर दिये बिना फिर कुर्सी की ओर चल देते है जहाँ कि चचा ने इस बीच में उनकी आपत्ति का हल सोच लिया है।]

चाननरम : कपड़ो का तो हो सकता है। उन्हें तुम लोग नये कपड़े

डा० हंसराज : कदापि नही हो सकता | सफाई का स्वभाव भी दूसरी

आदतों की भाँति एक समय चाहता है, बनते-बनते

बनता है उनसे ओर हसम में आधी सटठी का ज्यन्तर है

गुरु :'( भावी आई० सी० एस० ) वे सेंड रखते हैं, जिन पर नीम्बू टिक सके ओर हमारे ऐसा भी मालस नहीं दोता किदेव ने उन्हे कभी पैदा भी किया था वे सिर घुटा कर रखते हें--चंटियल मैदान की सॉति ! ओर हम दो-दो महीने इस मामले सें नाई को कष्ट नहीं ढेते, थे कमीज ओर नहबन्द पहने अनारकली से घूम सकते

र्६

छठा बेटा

हैं और हम सोते समय भी, सूट उतारने दिचकिचाते हे [ चाननराम ठुम अभी' बच्चे हो, उुम्हारी यह चचलता क्षम्य है', के से भाव से हँसते हैं. |]

दा० हंसराज : ( छोटे भाई की सहायता को आते हुए ) हँसी की बा नहीं चचा जी! बचपन का स्वभाव एक दिन मे नहीं बदल सकता एक दिन मे वे अपने पुराने संस्कारों को छोड़कर सभ्य समाज के शिष्टाचार नहीं सीख सकते। वे पिताओं तथा पतिओ के इश्वरीय-अधि- कारों ( 079706 रि9/78 ) से विश्वास रखते हैं। उनके विचार में लड़का चाहे डाक्टर छोड़ गबनेर भी क्यो हो जाय, पिता से मिलने पर तत्काल उसे उनके चरणों से झ्कुक जाना चाहिए, फिर चाहे बे बाजार मे अथवा स्टेशन के प्लेटफा् पर ही क्‍यों खड़े हों और कितने भी प्रतिष्ठित मित्र क्यो

उनके साथ हों गुरु: और पिता की गाली छुनकर उसे चुप खड़ा रहन चाहिए, अथवा ऐसे मुस्कराना चाहिए जैसे उस पर फूल बरस रहे हो ! चाननराम : माता-पिता की गालियां तो घी-शकर सी मीठी होती हे। जिसे ये नहीं मिली, वह जीवन से एक मदान विभूति से वंचित रह गया दे

३०

छठा बेढा

( दोनो भाई जोर से कहकहा लगाते है ) चननराम :( अप्रकृतिस्थ हुए. बिना ) प्रणास की बातहै तो भाई माता-पिता के चरणों से कुकना संतान की अपनी प्रतिष्ठा है। मुझे उन्र मित्रों की मानसिक अवस्था पर तरस आता है