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सूर साहित्य ; नद मूल्यांकन

डा० चच्द्रसान रावत, एम्‌> ए०, पी- छच डी » डी० लिट० रोडर : हिन्दी विभाग

श्री वेंकटेश्वर विश्व विद्यालय, तिरुपति. (आ०» प्र०)

अकाशक :

जो व्थाह्दिक्यथ स्ऑथचियत्तवल्सथआल्क्लच्लय ,

सथुरा

भकाशक जवाहर पुस्तकालय, सदर, वाजार, मथध् रा, लेखक छा ढा० चन्द्रभान रावत, द्वितीय संस्करण सर पंचशती १६७७ सर्वाधिकार छ् प्रकाशकाधीन मूल्य पचास रुपये विद्यार्थी संस्करण छा तीस रुपये

मुद्रक हर पचारी प्रिंटिंग प्रेस, मथुरा,-२८१००२

कुछ कहना है, इसलिए---

में कुछ उतना भावुक नहीं हूँ जाने क्‍यों 'सूर' पर सोचते समय कुछ भावुकता भा जाती है बोदछ्धिकता के परों के नीचे से ठोस धरती खिसकने लगती है और एक तरलता का अनुभव होता है

'सूर पर सोचना मेरे लिए सरल और सुहावना रहता है। जाने क्या-क्या सोचने लगता हूँ : ब्रज, राधा, कृष्ण, गोपियाँ, श्रीदामा, यशोदा, जाने कब, इनमें से कौन आकर विरमा लेता है ! 'सूर पर सोचने के क्षण मेरे लिए सृजन के क्षण होते हैं या समीक्षा के--कहना कठिन है जब इस विपय पर बोलना पड़ता है, तो इतनी तरलता तो नहीं रह पाती, फिर भी शली पूरी तरह में गद्य के अनुशासन में भी नहीं रहती लिखते समय बात बदल जाती है परम्परा-शोवबन, यथ्याकलन, प्रामाण्य, आदि जाने कितनी शोबपरक्र औपचारिकताएं आकर घेर लेती हैं। आश्चयं यह देखकर होता है कि मानव-मन का यह पारदर्शक कवि कितनी लम्बी परम्परा रखता है। भाव और मूल्यों की कितनी जटिल ऊहापोह सूर-साहित्य में व्याप्त है ? इस प्रकार वुद्धि को भी एक वहाना मिल जाता है। वौद्धिक प्रक्रियाओं को सूर' पर समर्पित हो जाने का अवसर मिल जाता है। सूर की भावधारा का बौद्धिक मूल्यांकन भी अपने आप में एक उपलब्धि वन जाता है

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पुस्तक का नाम सोचते समय नया मूल्यांकन शीषक भी ध्यान में आया था नया के स्थान पर ' नव जाने का एक कारण है नया शब्द चाहे वाद बना पाया हो, पर एक पारिभाकिता इसके साथ अवश्य संलग्न हो गई हैं इसमें परम्परा को नकारने का भी एक भाव है| सूर का मूल्यांकन अधिक से अधिक परम्परा का नवीन बोध कहा जा सकता है नव लेखन शब्द भी ध्यान में आया : मैं डर गया : कहीं नव भी पारिभाषिक हो गया हो ! फिर भी साहस करके “नव-मूल्यांकन' को मैंने स्वीकार कर लिया इस पुस्तक में नव-नूल्यांकन की ही प्रक्रिया मिलेगी

ऐसा अनुभव होता है कि सूर-साहित्य नव-मूल्यांकच की संभावना से युक्त है मानव-मन के इतने सहज और सरल स्पन्दन मध्यकालीन साहित्य में

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यह ह्वितीय संस्करण !

सर पंचशती का महापर्व और 'सूर साहित्य: नव मृल्यांकन' का यह द्वितीय संस्करण ! दोनों के बीच एक संवन्ध स्थापित हो, यह मेरी भी कामना है ओर प्रकाशक की भी अच्छा होता यदि कोई नवीन चितन और तत्पेरित कोई नवीन व्यक्तित्व इस संबंध का आधार बनता | इस द्वितीय संस्करण की पीठिका में पाठकों की सूर के नव-मूल्यांकन के प्रति अभिरुचि और विद्वान पाठकों के द्वारा प्रस्तुत पुस्तक का स्वागत है। यही तत्त्व सूर पंच शती और प्रस्तुत पुस्तक के संवन्ध का आधार है। यह वस्तुत: एक सघन सन्‍्तोप की वात है।

इस द्वितीय स्करण में जहाँ-नहाँ सशोधन तो किया गया है किन्तु परिवर्तत-परिवरद्धन विशेष नहीं किया गया यह भी उचित प्रतीत हुआ कि इस पुस्तक में सन्निविष्ट सामग्री को ज्यों का त्यों ही रहने दिया जाये। जो नवीन उद्भावनाएं ओर प्रतिक्रियाएं सूर- साहित्य के प्रति उगी हैं उनको किसी भावी क्षण में प्रति फलित होने के लिए छोड़ दिया गया है। यदि प्रस्तुत लेखक और प्रकाशक का परस्पर कुछ कम व्यावसायिक्र सहयोग रहा, तो वह भावी क्षण जल्दी ही वर्तमान बन सकता है

प्रस्तुत पुस्तक का प्रथम संस्करण १६६७ में प्रकाशित हुआ था | लगभग ९१० वर्ष हो गये इसके द्वितीय संस्करण की आव- इश्कता का अनुभव ४-५ वर्ष पहले ही होने लगा था। परिस्थितियाँ इस कार्य में आड़े आती रहीं और द्वितीय संस्करण का सकलप इस वर्ष ही क्रियान्वित हो सका सभवत्त: सूर पंचशत्ती के सदर्भ में ही यह सब होना था।

जब इस ससस्‍्क्ररण में विशेष परिवतेन-परिवद्धन नहीं ही किया गया है तव इसके सम्बन्ध में विशेष कुछ कहना भी नहीं है केवल उन सुधी पाठकों और ग्राहकों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना शेप रह जाता है, जिनके कारण प्रथम संस्करण को नव कलेवर के साथ प्रस्तुत करता सम्भव और अनिवार्य हुआ | लेखक पाठक और

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प्रकाशक की भ्यी में पाठक्र का आयाम कितना प्रेरक और महत्वपूर्ण होता है, यह इससे सिद्ध होता है !

मुझे विश्वास है कि प्रथम सस्‍्क्रण की ही भाँति इस द्वितीय स॒स्‍्करण को भी सहदय पाठकों के द्वारा ग्रहण किया जायेगा। में यह भी विश्वास दिलाता हूँ कि लेखक कुछ नवीन देने को साथचा में

निरत रहेगा (9७)

हस्त नक्षत्र, १६७७ | ““चरन्‍्द्रभान रावत

प्रकाशकीय-.

'मूर-साहित्य : नव-मुल्यांकन प्रकाशित करते हुए हमें उल्लास तो हो ही रहा है, कर्तव्य के निर्वाह का भी सुख मिल रहा हैं। ब्रज के प्रकाशकों

का ब्रज की साहित्यिक विभूतियों के प्रति एक कतंव्य भी है भाश्या है सूर के मूल्यांकन के साहित्यिक अनुष्ठान में इस प्रधास को स्थान मिलेगा

डा० चन्द्रमान रावत ने अपने सतत बव्यवसाव के इस फल को हमें प्रकाशित करने का अवसर दिया, इसके लिए उनके हम बामभारी हैँ। प्रस्तुत

प्रयास पर हमें गव है : डा० रावत बधाई के पात्र हूँ

डा० रावत ब्रज के सांस्कृतिक संदर्मों से सुपरिचित हैं। सूर-साहित्य के नव-मूल्याँकन से इन संदर्नमों की निजी बनुभूति का संस्पर्श है यही इस मूल्यांकन का वंशिप्ट्य है। जितनी निष्ठा और सुरुचि का परिचय उनके लेखन से मिलता है, संभमवतः उतनी सुरुचि हम मुद्रण आदि में नहीं ला सके हैं। यह हमारी निजी सीमा है। फिर भी भरसक प्रयत्न हमने इसके मुद्रण ओर इसकी सज्जा को उचित स्तर प्रदान करने का किया हैं

इन दब्दों के साथ पुस्तक सूर स्मृति में समपित हैं। विज्ञ पाठकों प्राप्त प्रोत्साहन ही प्रकाशक की भावी प्रेरणा है

--कु जबिहारीलाल पचोरी

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ज्यक्ति आन्दोलन समस्त नभाक्त साहित्य पृ लिए ए्क्त मावभूमि प्रस्तुत की जीवन के मूल्या का सक्ननण ज्त्यन्त द्वत गति

झा निम्म-घारा में पहले कर्मकांडीय मूल्यों को मान्यता थी उपनिषदों

00|

कृमकांड के स्थान पर ज्ञानकांड की क्वापता को और इस प्रकार प्रथम मल्यगंत सक्रमण हुआ। गाता उपनिषपद्‌ के जावन-समृल्यपों को एक भावात्मक मोड दिया | आगम-धारा इतनी ही प्रवल थी

झाड़ दिया | आममन्धार भी इतनों ही था उसके विविध स्तर

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454 नावात्मक रूप धारण करने लगे वाद्ध आर जन धमा भी वेद को स्वीकार

नहीं किया एक ओर तो करण और अहिंसा के डूल्या ने स्थान पाया, दूसरा ओर देवालय, चर्या आदि में क्रियात्मक साधना का विधान हंआ यह साधना

47!

योग मूलक सावना से भिन्‍न थी इस प्रकार सारे देश में ज्ञानमीय तथा अच्य वेद विरोधी संप्रदायों क्र एक जाल सा बिछ गया। जंन-मादस दैंदिक या वेदान्तों के मूल्यों से कट सा गया जंकर ने प्रस्थानत्रयी (--उपनिपद्‌, ब्रह्म सूत्र एवं गीता) की ज्ञानात्मक व्याख्या करके, बौद्धिक घरातल पर विगत मल्या का पुनस्थापना की यों गकराचाये जी के व्यच्तिन्द क्त्त्वरमेंमी कहीं-व- कहीं मादात्मक मूल्यों की स्वीकृति थी, पर आगमीय कुंहासे को चौरने के लिए उन्हें ज्ञाववादी जीवन मूल्यों की किरणें आवश्यक प्रतीत हुई | इसी रूप में उनका व्यक्तित्व समग्र तेजल्विता से मंडित होकर प्रकट हुआ 'गीता' की मावात्मक क्रान्ति को भी उन्होंने ज्ञानग्त्मक बना द्विया। इस बाघात से चेद विरोधी स्वर कुछ ननन्‍द हुआ--चाह समाप्त हुआ हो एक तीद् प्रवाह मे पड़ी हुई जनता कुछ रुका - चाह ज्ञान वादी धत्यं क॑ साथ तादात्म्य

प्रस्थाद इस: ैकएननकमनकाम “मु धाधारित सनम पतन पका. वन डा क्- छा. स्थानश्नषया पर बाधारत जांवन-मूल्य नवीन उंस्कारों से

१० सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन

प्रोदभासित हो उठे--चाहे अभी उनका जनानुकूल भावात्मक संस्कार होना शेष हों आगमीय या बौद्ध भावात्मक क्रियाओं और चर्याओं की स्थिति अछूती रही भक्ति के आचार्यो और संप्रदायों ने प्रस्थानत्रयी को भावमूलक व्याख्या करके एक ओर शंकर द्वारा प्रचारित अद्वतवादी मूल्यों को विशिष्ट या 'शुद्ध किया दूसरी ओर आममाश्रित, तंत्राश्चित या बौद्ध भावात्मक मूल्यों के स्थान पर निगमाश्रयी भावात्मक संस्कारों की स्थापना को। प्रस्थानश्रयी के अतिरिक्त इस प्रकिया में बैखानस, पांचरात्र संहिताओं, विविध पुराणों और विशेष रूप से भागवत और लोकभाषागत भावाकुल साहित्य को प्रामाण्य प्रदान किया गया इस प्रकार एक महान्र्‌ सांस्कृतिक आन्दोलन हो उठा जाने-अनजाने तंत्रागमों, सहज साधना, रहस्यात्मक श्यगार ने भी इस भावात्मक क्रान्ति को कुछ तत्त्व प्रदान किये : एक तीजत्र उत्ते जना दी धीरे-धीरे भावात्मक मूल्य इतने तीव्र हो गये कि दाशंनिक पीठिका शिथिल पड़ने लगी। भावों की सारणियों से संबंधित नवीन शास्त्र विकसित होने लगा | प्रस्थानश्रयी की छाया से एकदिन यह भावज्ञास्त्र मुक्त हो गया। इस शास्त्र की भूमिका में तंत्रात्मक रस, काव्यश्ास्त्र, कामशास्त्र तथा लोक- साहित्य की प्रेरणाए' स्वीकृत की जाती है। इन सबने मिलकर एक-एक भाव-पद्धति और एक ऐसा माध्यम प्रस्तुत किया कि आन्दोलन जनव्यापी हो गया लोकसाहित्य में नवोदित भावात्मक मृल्य गूजने लगे जनजीवन को ज॑से एक खोया हुआ उत्साह वापस मिल गया हो। विभिन्‍न अवतारों की लीलाएँ उसे अपनी निजी प्रतीत होने लगी। लौकिक और शिष्ट कलाए नवीन अभिप्राय पाकर घन्य हो उठी जीवन की विगृश्रमित धारा को नवीन दिशा मिली इसी समय देवालयों का संगठन हुआ सेवा-चर्या इन देवलायों में मूतिमान हो उठीं ऐसा प्रतीत होने लगा कि पांचों ललित-कलाओं का सह- योग देवालय के संगठनों को प्राप्त हो गया। जीवन और धमं, कला ओर अध्यात्म, बुद्धिवादी और भाववादी मुल्य ज॑से नवीन संबंधों में बंध गये : समन्वय और सामंजस्य की शक्तियां जैसे इतिहास में दीघ॑ंकाल के पश्चात्‌ संघर्ष ओर इन्द्व की शक्तियों पर विजय प्राप्त कर सकी हों इतिहास के पृष्ठों पर इस उल्लास-समारोह की झंकृतियाँ अकित है सबसे वड़ी बात यह कि यह सब कुछ भारतव्यापी हुआ भारत के तर में प्रवाहित सभी ज्ञात-अज्ञात भाव घाराओं ने इस आन्दोलन को

पृष्ठाधार १६

योगदान दिया इस आन्दोलन की सुजनात्मक शक्तियों ने अनेकों को प्रातिम साधना की प्रेरणा दी | सर्वत्र विपुल साहित्य रचा गया। भनन्‍्ततः यह हुआ कि वेद-विधि, शास्त्र मर्यादा आदि के मूल्यों की एक बार फिर उपेक्षा हुई और शुद्ध प्रेम का मूल्य जीवन में सर्वे मान्य हुआभा यही भावात्मक संक्रमणता सभी भक्त कवियों को प्राप्त हुई मक्ति साहित्य में विधि! और राग में क्रिया-प्रतिक्रिया बनी रही इन सूत्रों को कुछ और विस्तार से देख लेना उपयुक्त होगा १-वेदिक मूल्यों का ह्वास

मध्यकाल में एक विशेष मनोवृत्ति मिलती है। एक वर्ग अपने से विरोध रखने वाले मतों को 'अवंदिक' कहकर तिरस्कृत करता था। अवंदिक कहे जाने वाले मत बेदिक मत का खंडन करते थे इन दोनों मत-धाराओं की परम्परा नवीन नहीं एक दीघं समय से चली रही थी निगम और आगम' विचार धारायें क्रिया-प्रतिक्तिया के रूप में इतिहास का एक सत्य बन चुकी थीं

स्वयं उपनिषद्‌ वेदान्त' बन गये ब्रह्मथि मेधा के प्रति राजधि मेधा की एक हलकी सी विकास-मूलक प्रतिक्रिया उपनिषदों में परिलक्षित है। वेदोक्त स्थुल एवं शुष्क कर्मकांड के स्थान पर ब्रह्मांड व्यापक, सूक्ष्म, चिन्तन परक यज्ञ की स्थापना की गई। मूल शक्ति के अन्वेषण की प्राकृतिक शक्तियों के माध्यम वाली पद्धति का निराकरण करके एक शुद्ध ज्ञानात्मक पद्धति का आविष्कार किया गया। एक ऐसा महान्‌ दर्शनः जन्म लेने लगा, जिस पर आज भी भारत गवे कर सकता है। पर, इनमें वेद का स्पष्ट और तीब्र विरोध भी नहीं था और उसका खंडन ही किया गया एक प्रकार से वेद का पूरक साहित्य प्रकाञ् में आया : वेदिक पद्धति जैसे आत्मोन्मुख होकर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर चिन्तन-साधना से परमात्य तत्त्व का संघान और निरूपण करने लगी हो कर्मकांड मूलक ब्रह्म ज्ञान या ब्रह्म विद्या. शुद्ध ज्ञान का परिवेश प्राप्त करने लगी इस प्रकार ब्रह्म-ज्ञान का विकसित रूप प्रकट हुआ इस प्रकार वेदान्त दर्शन किसी किसी रूप में श्रति को आधार रूप में ग्रहण किए रहे

उपनिषद्‌-साहित्य के नवनीत को ग्रहण करते हुए “गीता” का अवतार हुआ इसमें वेद को त्रगुण्यमय घोषित कर दिया गया : अजु से “निसत्रैगुण्य' होने के लिए कहा गया इस प्रकार वेद की हृष्टि से गीता का सामंजस्य नहीं था वास्तव में ज्ञानात्मक उपनिषद्‌ का भावात्मक अवतार ही गीता है। गीता का प्रमुख प्रतिपाद्य 'मक्ति' है। ज्ञामय भक्ति या निष्काय-मक्ति के

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१२ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन

सूत्र ही आगे विकसित हुए इसी की प्रेरणा से आगे के भावमूलक भविति संप्रदायों में वेद! का खंडन चाहे नहीं मिलता हो, पर उसे अनावश्यक अवश्य बतलाया गया है |

जिस प्रस्थानत्रयी को शुद्ध ज्ञानात्मक घरातल पर शंकराचार्य जी ने उतार दिया था, उसी की शुद्ध भावात्मक व्याख्या भक्ति के आचार्यो ने की इसी व्याख्या ने भक्ति को सर्वोच्च मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया और वेद” के मूल्य और यज्ञ-यागादि से युक्त साधना को उपेक्षित कर दिया। यज्ञ का स्थान पूजा ने ले लिया पूजा-कर्म '“पत्र-पुष्पं फल तोय॑” से सम्पन्त हो सकता था।

वेदिक साहित्य में ही कुछ वेद-विरोधी जातियों और गणों की सूचना मिलती है। जिस आंगिरस परम्परा से कृष्ण का संबंध जोड़ा गया है वह भी वेदिक नहीं थी। अथवंबेद में एक ऐसी शासन व्यवस्था की -चर्चा है, जिसके निवासी बेद और ब्राह्मण का विरोध करते थे: दोनों का उच्छेद ही उन्हें अभीष्सित था इस प्रकार के 'वितह॒व्य' के १००० निवासियों का उल्लेख है ।" आगे के इतिहास काल में यह स्थिति अंधिक स्पष्ट हो जाती है इन गणों में शासन व्यवस्था ही भिन्‍न नहीं थी, इनके निवासी वेदिक संस्कृति ओर आचार के भी कट्टर विरोधी थे महाभारत के समय भी ऐसा विरोध मिलता है। कृष्ण दोनों में मैत्री भी चाहते थे आभीर एवं यादवों में भी ऐसे आचार थे, जिनका समर्थन वैदिक परम्परा नहीं करती थी। इस प्रकार कृष्ण में ये संस्कार आये एक ओर तो उनका संबंध आंगिरस परम्परा से हुआ दूसरी ओर आभीर और यादव गणों से है

वेद-विरोधी स्वर की एक और परम्परा है। यह वौद्ध और जैन धर्म के रूप में प्रकट हुई कालांतर में बौद्ध धर्म के विंकसित रूपों के साथ समस्त आगम परम्परा संबद्ध होती गई तत्कालीन बौद्ध संप्रदायों के संबंध में देशी- विदेशी स्रोतों से प्रचुर साहित्य प्रकाश में आया है। वैदिक परम्परा वौद्ध संप्रदायों में अभाववाद या शुन्यवाद की स्थिति मानकर उनका खंडन करती रही बौद्ध संप्रदाय वैदिक-मत के विरोधी बने रहे बौद्ध-बर्म के ऐसे ही

संप्रदायों के अतिवाद को देखकर - ही एक घोर प्रक्रिया हुई। शंकराचार्यजी

९. ये सहज्मराजन्नासन दश शता डत ते ब्राह्मणस्थ गां जम्घा वेतहब्या पराभवन

[ अथवे, ५५१८।१० ]

पृष्ठाधार १३

ने शन्‍्यवाद को 'सर्वप्रमाण विप्रनिपिद्धा कहा उसके उच्छेद का इन' आचार्य॑ प्रवर ने संकल्प लिया | कुमारियल भट्ट बुद्ध जी के आदर्श सिद्धान्तों को भी अग्राह्म वतलाया बौद्ध धर्म का प्रकट रूप तो इन थपेड़ों को सह सका, पर उसके प्रच्छन्‍्न रूप अवशिष्ट हो गए स्थविरवाद, वज्रयान, सहजयान आदि रूपान्तरण प्रस्तुत हो गये इनका पोषण ज्ञाक्त, शव, तंत्र, रसायन भादि के तत्वों से होता रहा | पुराने साहित्य में वौद्धों के माध्यमिक, योगाचार, सीच्रान्तिक और वैभाषिक संप्रदायों का भी उल्लेख मिलता है जैनमत और चार्वाक दर्शन को जोड़कर उन संप्रदायों की संख्या छः करदी गई है, जो वेद का विरोध करते थे | इनको 'नास्तिक' कहा जाता था इनके अतिरिक्त अन्य अनेक छोटे संप्रदाय भी रहे होंगे, जिनमें वेंद-विरोबी स्वर ग्रजता रहा होगा

पौराणिक साक्ष के अनुसार कापाल, लाकुल वाम, भैरव, पाँचरात्र, पाशुपत आदि को अवैदिक घोषित किया गया | शद्धूराचार्यजी ने वाशुपतों और माहेण्वरों को वेद-बाह्य बतलाया ।" प्रवृत्ति शव, द्वाक्त और तांत्रिक मतों को अवंदिक कहने की प्रतीत होती है | यदि यह कहा गया कि विष्णु ने ही कापाल, मरव आदि संप्रदायों से संवन्धित मोह शास्त्रों को उत्पन्त किया, तो विरोधी स्व॒र ने यह बोजना की : शिवजी ने कहा कि मायावाद एक श्रामक दर्गन है इससे अधिक असत्य दर्शन नहीं मिल सकता वेद-विरोधी मतों ने वेद-विरोधी स्वर को और ऊंचा ओर स्पष्ट किया

आगे चलकर तांत्रिक साधना और योगमार्ग ने प्रवल रूप धारण किया तन्त्र के सम्बन्ध में साहित्य भी विकसित होंता रहा जहाँ वैष्णव सहिताएं जन्म ले रही थीं, वहां शवागरमों और शजाकक्‍त तंत्रों का विकास भी साथ साथ हो रहा था | आगम' साहित्य का संवन्ध भी दोव परम्परा से है। पर, कुछ आगमों को वैदिक कहा गया इन आममों के प्रामाण्य को स्वीकार करने वाले कई गव और थाक्‍्त संप्रदाय चले शाक्‍तों के चार संप्रदाय केरल, काश्मीर, गोड़ और विलास माने जाते हैं वंगाल और आसाम इनके मुख्य केन्द्र हो गये एक प्रकार से इन दोनों की अखिल भारतीय स्थिति हो गई पर आगममों में ऐसे सूत्रों का सन्निवेश है, जिनस समन्वय की भूमि तैयार हो सके दार्शनिक दृष्टि से कुछ समान सूत्र ये हैं : उपास्यदेव परम तत्व है | यह

१. शारीरिक भाष्य, २।२।३७ २. कमंपुराण, अध्याय १६

१४ सूरसाहित्य : नव मुल्याकन

प्रकृति से परे है। परम तत्व में इच्छा, क्रिया आदि शक्षितयों का निवास हैं जगत्‌ परमतत्त्व का परिणाम है। सृष्ठि क्रम में प्रकृति भी स्वीकृत हैं। त्रिगुण को भी स्वीकार किया गया है। भक्ति पर सभी बल देते हैं भवित के क्षेत्र में सभी वर्ण, स्त्री, पुएष समान अधिकार रखते हैं। चर्या (धार्मिक) और क्रिया (मन्दिर आदि का निर्माण) को भी सभी ने स्वीकार किया ।' पारिभाषिकर दब्दों में मी साम्य है। बीज, मन्त्र, मुद्रा, न्यास आदि मी हैं। योग को सभी में चर्चा हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि भक्ति-संप्रदायों के दर्शन में भी ये तत्त्व या इनके संस्कृत रूप स्वीकृत रहे शवागमों पर आधारित अनेक संप्रदाय थे। शंकराचार्य जी ने इनका

भी खंडन किया लिंगपुराण में पाशुपतों की एक वेदिक शाखा का भी उल्लेख है : ये लिंग, रुद्राक्ष और मस्म धारण करते थे। यहीं मिश्र पाशुपातों की भी चर्चा मिलती है, जो पंचदेवोपासक थे साधना और प्रतीकों की दृष्टि से तांत्रिकों की शाखा इन दोनों से भिन्‍त्र थी इनके अतिरिक्त भी अनेक पाशुपत शाखाएँ थीं जो देश भर में फंली थीं। दशिण में शव-भक्त भी प्रमुख थे। इनमें से कुछ महाभारत और पुराणों से भी प्रभावित थे कश्मीर में शेव मत्त ओर पूर्वी भारत में शाक्त मत का विशेष प्रचार था यों भारत के प्रत्येक गाँव में शिव और शक्ति के छोटे-बड़े मन्दिर अनिवाये रूप से मिल जाते हैं २-वेदों को प्रमाण मानने वाले संप्रदाय और वैदिक मूल्य

जिस प्रकार वेद-विरोधी नास्तिक संप्रदायों की वृद्धि हो रही थी, उसी प्रकार आस्तिक संप्रदायों की संख्या भी बढ़ रही थी। वेद को प्रमाण मानने वाले सिद्धान्तों में चाहे परस्पर मतेक्य हो उनमें वेद-प्रामाण्य समान रूप से स्वीकृत था समस्त मक्ति संप्रदायों की भी यही स्थिति है अनेक शैव, घाक्त, पाशुपत, गणपत्य, सौर आदि नामधारी संप्रदाय अपनी प्रतिष्ठा के लिए अपने को श्र ति-सम्मत कहने लये

दार्शनिक दृष्टि से वेद-वेदान्त के अनेक माष्य प्रस्तुत किय्रे गये इनके द्वारा मूल दर्शन का प्रचार मी होता था और मूल दर्शन विकसित भी होता था अनेक नवीन तत्त्वों का समावेश भाध्यों के द्वारा मूल दर्शन में हो जाता था साथ ही परिस्थितियों के अनुकूल कुछ विशिष्ट तत्त्वों का पुनराख्यान भी हो जाता था | इससे दर्शन जीवन्त बना रहता था। “पुराण” एक दूसरी ही पद्धति से वेद-वेदान्त-सूत्र-धर्मशास्त्र को प्रस्तुत करते थे वे सूक्ष्म को स्थल

१. सर जान उडरफ, शक्ति एण्ड शावत, पृु० २३।

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और दक्षिण में भी | आइचर्य की वात यह है कि शंवागर्मों से इनका विशेष

साम्य हैं। इनका विषय-विमाग इस प्रकार है :* ज्ञान-ब्रह्म, जीव, जगत का निरूपण; योग-मोक्ष के लिए योग प्रक्रियाएँ; चर्चा-नित्य नेमित्तिक इत्य, मूर्ति, यंत्र और इनकी पूजा विधि; क्रिया देवालय-निर्माण, मूर्ति स्थापना, पूजा आदि आगे के विकेसिक मर्क्ति संप्रदायों में मी दशंव का विपय- विभाजन इसी प्रकार रहा | सुर क्रे संप्रदाय को भी अपवाद नहीं कहा जा सकता इन विपयों में से चर्या और क्रियाएं अधिक लोकप्रिय होती गई,। तत्वदर्शन क्रमशः न्यून से न्यूनतर होता गया | संहिताओं में भी चर्या क्रिया निरूपण में ही विजेप रुचि ली गई है।

पंचरात्रां-मत में चतुब्यू ह-कल्पना प्रमुख हैं : विकास-क्रम इस प्रकार है : वासुदेव [परमतत्त्व] से संकपंण [जीव |; संकर्पंण से प्रद्य म्व [मन]; और प्रद् म्न से अनिरुद्ध [अहंकार | | इस प्रकार एक पौराणिक इतिवृत्ति के क्रम में तत्व-विकास को रखने का उपक्रम है

ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्म में पांचरात्र पूजा-विधान वदिक परम्परा के मन्दिरों में प्रचलित नहीं था: वहां वंखानस संहिताएँ ही मान्य थीं। रामानुजाचायंजी ने वेखानस संहिताओं के पूजा-विधान का विरोध करके दक्षिण के अधिकांश मन्दिरों में पांचरात्र विधि को स्थापना की | इस प्रकार जिस पांचरात्र परम्परा को अवंदिक कहा जाता था, वह भक्ति-संप्रदायों में स्वीकृत हुई एक प्रकार से वेद-विरोव का यह एक मृद् और व्यावहारिक रूप था | वेद-प्रामाण्य सिद्धान्त रूप में स्वीक्ृत रहा इनमें भक्ति पर वल दिया गया है इनके अनुसार जीवोद्धार का मार्ग भगवान का अनुग्रह है ।+* इस भवजाल से यदि मुक्ति पानी है तो मगवान की शरण में जाना (न्यास) ही एक मात्र उपाय है। सभी मक्ति संप्रदायों के ये प्रमुख सूत्र रहे। वल्लम संप्रदाय का तो नाम ही पुष्टि मार्ग! [अनुग्रह-मार्ग | है तमिल प्रान्त में कई पांचरात्र संहिताएँ प्राप्त हुई हैं | दक्षिण के आल्वार भक्त पांचरात्र संहिताओं के भिद्धान्तों से बहुत अधिक प्रमावित थे | वेसे रामायण, महाभारत और

पुराणों का प्रमाव मी अत्यधिक है। आल्वारों की दृष्टि से अस्पृश्य-स्पृदय का

१. बलदेव उपाध्याय, भारतीय दर्शन, पु० ४६०

२. जोवे दुःखाकुले विष्णो: कृपा काप्युपजायते [अहिन्ु घुन्य संहिता १४।२६ |

पृष्ठाधार १७

भेद नहीं था पुराण और संहिता दोनों ही मिली-जुली पद्धति पर आधारित आल्वार-साहित्य को श्री संप्रदाय में प्रामाण्य प्राप्त हुआ : इनके साहित्य को परम प्रमाण माना गया : इस साहित्य का गायन होता था ! आल्वार भक्तों की भी पूजा देव-मन्दिरों के पूजा-विधान का अज्भ बन गई | आल्वारों को वेष्णव संत्रदाय का आदि नुरू माना गया पीछे वष्णव संत्रदाय में प्रस्थान- त्रयी और भाल्वार साहित्य के प्रामाण्य और सापिक्षिक महत्व को लेकर कुछ विवाद भी हुआ : मत-विमाजन भी हुआ एक वर्ग प्रथम को, दूसरा वर्ग द्ृतीय को अधिक महत्व देने लगा | वेदांत देशिकाचाय॑ प्रस्थानत्रयी को विशेष

हत्त्व देने के पक्ष में थे। नारायण या विष्णु के अन्य रूपों की प्रतिष्ठा हुई नृसिह, वराह, राम आदि की पूजा भी प्रचलित हुई | दक्षिण के व्यक्तिवाचक नामों और मन्दिरों की दृष्टि से इनकी पूजा का सह अस्तित्व मिलता है। सूर्य और गणेज्ञ की पुजा भी प्रचलित थी

पुराण-परम्परा में आने वाले ग्रन्थ 'भागवत' ने आगे के विकसित भक्ति संप्रदायों को अत्यधिक प्रमावित किया प्रस्थानत्रयी में भागवत को जोड़कर वल्लमाचार्य जी ने प्रस्थान-चनुष्ट की स्थापना की | चैतन्य संप्रदाय में भागवत को सर्वाधिक महत्व दिया गया। “...पांचरात्र संहिताओं, विष्णु पुराण, और “श्रीमाष्य' का आश्रय लेकर एक वेध मार्गी वैष्णव साधना विकसित हुई ओर दूसरी रामानुजा मार्गी या आवेश और उल्लासमंग्र भ्रकति मार्गी साधना भागवत का आश्रय लेकर विकसित हुई उत्तरकाल के वल्‍लभ और चंतनन्‍्य संप्रदाय भागवत को परम प्रमाण के र्‌प में स्वीकार करते है। मागवत पुराण श्रीकृष्ण के प्रेम मूलक भक्ति धर्म का प्रतिपादक है ।*” श्रीक्ृष्ण को पूर्ण ओर साक्षात्‌ अवतार कहा गया और शेष अवतार अंशावतार है। इस प्रकार नारायण, राम, आदि अवतारों के स्थान पर एन संप्र दायों में कृष्ण का सर्वा- धिक महत्व हुआ आगे चलकर भागवत और सहिताओं के उत्सों से प्रप्तिद्ध चार संप्रदाय उत्पन्न हुए ।* चेतन्यमत को मध्व-मत्त के साथ संबद्ध करके देखा जाता है, पर उसका अस्तित्व भी स्वतन्त्र है। भमध्यकाल के उत्तराद्ध में समस्त धामिक और दाशेनिक चितन की परम्पराएँ इन संप्रदायों के र्‌प में

१. डा० हजारोंप्रसाद द्विवेदी, सध्यकालीन घर्मं साधना, परृ० ४७ | २. श्रीं वेष्णव 55 रामानुजाचार्य ( विशिष्टाहत ). ब्रह्मज-सथ्ब (दंत).

रुद्र -5 विष्णु स्वामी. वल्लभ ( शुद्धाइंत) तथा सनक -- निम्बाक (दव॑ ताइ त)

१्८ सरसाहित्य : नव मूल्यांकन

ढल गई योगमार्ग भी इस काल में साथ-साथ चलता रहा। धीरे-धीरे वैष्णव तत्त्वों से उत्तर मारत का योगमार्ग भी प्रभावित होने लगा और तांत्रिक

भाव और रस के प्रतीक 'माधुय' के अनुयायी भक्ति-संप्रदायों को प्रभावित करने लगे

साहित्य की एक और प्रवृत्ति की ओर यहाँ संकेत कर देना आवश्यक है हिन्दू धर्म के आचार और व्यवहार को नियंत्रित और सुरक्षित करने के लिये स्मृतियां लिखी गई थीं स्मृतियों की मध्य युग में टीकाएं लिखी गई निवन्धों की रचना हुई | पुराणों को इनके साथ संबद्ध करके धरम शास्त्र नाम से इस समुच्चय को द्योतित किया जाता था। धर्म शास्त्र सामाजिक जीवन के भाचारों और संबंधों को नियंत्रित करता है। वर्णाश्रम-व्यवस्था का नियमन भी इसी से होता है इसी प्रकार कुछ साहित्य धर्म साधना के नियमों का भी अनुकथन करने वाला था। 'स्मार्त' शब्द स्मृति से उत्पन्न है। स्पार्तों में आचार-व्यवहार और देवोपासना, धर्मशास्त्र और धर्म-साधना परक साहित्य माना जाता था पंचदेवोपासना की स्वीकृति के द्वारा इनके द्वारा समन्वय की भी एक भूमिका प्रस्तुत हुई। साधना मुख्यतः 'सूर' से पूर्व योगमूलक और भक्ति-मूलक थीं |

भक्तिमूलक साधना को उक्त धर्म-शास्त्र, धर्मे-साधना-साहित्य के आधार पर दो भेदों में विभकत किया जा सकता है। पहला मत धर्म शास्त्रीय आचार- व्यवहार, नीति-विधि को स्वीकार करके चलता था। दूसरे मांगे में वेदादि प्रामाण्पय की अस्वीकृति तो नहीं है, पर सघन रागात्मक साधना में इस लोक, वेद, स्मृति आदि के नियंत्रण को अनावश्यक अवश्य कहा गया भगवत्प्रेम के घनीभूत क्षणों में धमंशास्त्रीय आचार को वाधक भी समझा जाता था इस प्रकार रागात्मक साधना में वेदों की उपेक्षा का स्वर जाने-अनजाने गया योगी और संतों में वेद, लोक, या पुस्तकीय विधान का खंडन बौद्धिक आधार पर था। भक्ति के रसाश्रयी रूपों में मक्ति और प्रेम का मूल्य ही सर्वोच्च था अतः भावना के आधार पर अन्य बौद्धिक या ज्ञानात्मक, अथवा कमंकाण्डीय मूल्यों के लिए कोई स्थान, नहीं रहा | कुछ भक्ति संप्रदायों की दाश्॑निक पीठिका में प्रस्थान-त्रयी और घर्मशास्त्र अथवा उनका विशेष रूप से किया गया माष्य व्याप्त था पर कुछ संप्रदायों ने इस पीठिक्रा को भी छोड़ सा ही दिया आर भक्तिमूलक भावोन्नयन की साधना को दूसरी ही भूमिका में देखा गया जिन संप्रदायों में यह पीठिका मान्य भी थी, उनमें भी पीछे प्रेम भक्ति का मूल्य ही प्रवल होता गया और वेद-विधि, स्मृति-आचार शिथिल | जहाँ इन

पृष्ठाधार १६

संप्रदायों में मावात्मक सेवा का विधान किया गया है। वहाँ वेद की उपेक्षा के स्वर मी स्पष्ट है इस पक्ष पर गोपी भाव और माघुय भाव पर विचार करते समय और मी स्पष्टीकरण क्रिया गया है गोपी भाव को पृष्ठ और मांसल करने में, और गुर्जर जाति के भाव- प्रवण लोकसाहित्य और विश्वासों का भी महत्त्वपृर्ण हाथ माना. गया है ।* इस भावना को लेकर जो श्वद्धार-मुक्तक साहित्य के शझ्लेत्र में प्रचलित हुए, उनका श्रेय भी इस जाति को दिया जा सकता है ।* इस जाति की भाव साधना ने भी वंदिक रीति को ठेस पहुँचाई इस 'मागवत' परम्परा की णक, यवन, पल्हव आदि जातियों ने भी स्वीकार किया इन्होंने अपने को भागवत कहा भी है इनके लिए बेद-प्रामाण्य का महत्व नहीं था। भागवत मूल्यों का ही विस्तार और ग्रहण -इनके द्वारा हुआ संक्षेप में कहा जा सकता हैं कि चाहे वेद को अमान्य ठद्दराया गया हो, पर अन्य मावात्मक जीवन मसूल्यां के प्रदल हो जाने पर बंदिक मूल्यों का छास स्वाभाविक था। तरल भावना से ओत प्रोत लीला साहित्य विकसित होने लगा इसके प्रमाण ये हूँ “ल्षेमेन्द्र का द्यावतार चरित' जयदेव का गीत गोविद' चंद का दसम इनमें शास्त्रीय मर्बादा, वेद की अनुना, तथा लोकमर्यादा विच्रलित सी खड़ी हैं। मूर की गोपियाँ अनेक स्थानों पर प्रेम के सामने वेद या लोक की मर्यादा की अबना करती मिलती हैं जब गोपियाँ रास में सम्मिलित होने गई, तब कृष्ण ने इहि विधि वेद मारंग सुनी ।7 कह कर बेद की मर्यादाओं का संकेत किया | इस पर गोपियों ने गीता के स्वर में उत्तर दिया-- हम जानें केवल तुम्हीं कों, और बया संसार ।7

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इस प्रकार गोपीमाव वदिक मूल्यों का खंडन चाहे करें, पर इस

वंदिक मूल्यों की अपेक्षा भावात्मक जीवन मूल्य ही मान्य हैं। ३-अवता र-कल्पना

अवतार कल्पना मनुप्य की अमूर्त के मूतिकरण की सावना का ही एक अंग है। यह साबना साहित्य के क्षेत्र में मी चलती है और दर्जन के श्षेत्र

१. भंडारकर, वंष्णविज्म, शेविज्म, एण्ड अदर माइनर रिलिजन्स आफ इन्डिया, पृ० ५३ २. डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिन्दी साहित्य की भूमिका, पृ० ११३, ११४

है

« सू० सा० १६३४ बही, १६३६

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२० सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन

में मी कभी साहित्य-क्षेत्रीय मूर्तीकरण संबंधी रूपक दाशेनिक चिन्तन की मूर्त गाथा प्रस्तुत करते हैं, कभी दाशंनिक क्षेत्र का रूपक-परकर्नचतन साहित्य में उतर आता है। लोकोत्तर धरातल पर यह प्रक्रिया दुहरी रहती है। पहले प्राकृतिक शक्तियों में दिव्यत्व का आरोप करके उनको लोकोत्तर किया जाता है फिर मनुष्य अपने ही माव-विचार, रूप-आकार और. क्रिया-व्यापार का आरोप करके अलौकिक प्रस्तुत को लौकिक अप्रस्तुत के माध्यम से मूर्त कर दिया जाता है। उसकी उच्चतर कल्पना इस प्रकार की शरक्तियाँ अनेकत्व में एकत्व के संधान के लिए विकल हो उठती है : अन्ततः दृश्य शक्तियों के पीछे भन्तनिहित एक अहृश्य मूल शक्ति का आमास मिलने लगता है। चिन्तन ओर कल्पना की यह क्रिया-प्रतिक्रिया वेदिक वेदवाद में मिलती है इस कल्पना को प्रक्रिया को पूर्ण समझने के कारण ही विद्वानों ने वेदों में अद्व तवाद, ऐकेश्वरवाद, या बहुदेववाद का अनुसंधान किया है वास्तव में ये तीनों ही कल्पना के एक प्रक्रिया की विकास की स्थितियाँ उसके परस्पर पूरक पक्ष है वेदिक देववाद की कल्पना में बहुदेववाद के स्थल अधिक हैं। पर, इसके चरम विकास को प्रकट करने वाले स्थल भी है जहां कहा गया है कि एक ही महा देवता को विभिन्‍न नामों और रूपों से कहा गया है ।' हिरण्यगर्भ समस्त भूतों का अधिपति है। उसी ने द््‌ लोक और भूलोक को धारण किया है। उसी को हविस्‌ अपित करनी है ।* यह कल्पना का उच्चतम स्वरूप है

इस महद्देवता को मूलशक्ति स्वीकार कर लेने के पश्चात्‌ कल्पना का स्थान चितन ने लिया इस मूल सत्ता से जीव, जगत आदि के विकास और इन तत्त्वों के परस्पर सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिये औपनिपदिक-जटिल चितन की ऊहापोह सामने आई | मूर्तं कल्पनाओं का आधार भी छूट गया और उस अनन्त के साथ कल्पित संबंध भी शिथिल होने लगे। उपनिषदों ने निषेघात्मक विशेषणों और अनिवर्चतीयता के आधार पर ब्रह्म-निरूपण का प्रयत्त किया पर, 'नेति' के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला | वसे कहीं-कहीं कुछ