जैन-लॉ

अप कोशिके चम्पतराय जेन, पैरिस्टर-पटर-सो, विद्यावारिधि.

भू प्रकाशक

श्रो दिगम्बर जैन परिषद्‌, बिजनौर

श्च्श्द रू 6

एपांडा40 ४५ 5॥ा जिछब्याएद्का ]गंफ रि्रां्रा9पे, छवरब्ण, एं, ९.

एत766 99 8. 305९, 88 456 [शतीदा 655, .6. छिश्ाक्ा९5-97द्रातट.

विषय-सूची

विषय भूमिका हिन्दी अनुवाद की .., भूमिका ( असली ग्रन्थ की ) अयथस भाग प्रथम परिच्छेद--दत्तक विधि और पुत्र-विभाग टितीय --विवाह तृतीय ?” “सम्पत्ति चतुधे ”? --दाय पच्चम --ख्री-पन षष्ठ ? >--भरण-पोषण (गुज़ारा) सप्तम ? --संरक्षकता ... अरष्टम ?! --रिवाज द्वितीय भाग त्रेवर्णिकाचार श्रो भट्बाहुसं हि ता श्रीवर््धमान-नीति इन्द्रनन्दि जिन-संद्िता अहेन्नोति 55 हर तृतीय भाग

जैनघम और डाक्टर गौड़ का “हिन्दू कोड?”

श्छठ

११ रे धर घर शव प्र

दर ६८ १-3 १०५ ११७

श्ष्द्‌

क्र

भूमिका हिन्दी अनुवाद की

जेन-लॉ की श्रसली भूमिका अगरेज़ो पुस्तक में लिखी जा चुकी है। जिसका अनुवाद इस पुस्तक में भी सम्मिलित है। हिन्दो अनुनाद के लिए साधारणत: किसी प्रथक्‌ भूमिका की आवश्यकता थो किन्तु कतिपय झावश्यक बातें हैं जिनका उल्लेख करना उचित प्रतीत दोता है। और इस कारण उनकी इस भूमिका में लिखा जाता है---

( ) जैन-लॉ इस समय न्यायालयों में अमान्य है, परन्तु बतमान स्यायालयों की न्‍्याय-नीति यहो रही है कि यदि जैेन-लॉ प्राप्त विश्वस्त रूप से प्रमाशित हा सक॑ ते! बह कार्य रूप में परिणत होनी चाहिए। यह विषय अँगरेज़ी भूमिका पुस्तक के ठतीय भाग में स्पष्ट कर दिया गया है |

( + ) पिछले पचास वर्ष को असन्तुष्टता के समय का चित्र भी ठतीय भाग में मिलेगा जैन-लॉ के उपस्थित होने के कारण प्राय: न्यायालयों क॑ न्याय में भूल हुई है। कहों कहीं रिवाज के रूप में जैन-लाॉ के नियमों फो भी माना गया है; अन्यथा हिन्दु-लाँ ही का अनुकरण कराया गया है। इस असनन्‍्तुष्टता के समय में यह श्रसम्भव नहीं है कि कहीं कहीं विभिन्न प्रकार के व्यवहार प्रचलित है! गये हों

(३ ) अब जैनियों का कर्तव्य है कि तन, मन, धन से चेष्टा करके अपने ही लॉ का अनुकरण करें श्रौर सरकार न्यायात्षयों

के आ, में उसे प्रचलित करावें। इसमें बड़े भारी प्रयास की आवश्यकता पड़ेगी अनायास ही यह प्रथा नहीं टूट सकेगी कि जैनी हिन्दू डिसूसेन्टर हैं श्रार हिन्दू-लॉ के पावन्‍्द हैं जब तक वह कोई विशेष रिवाज साबित कर दे इसके सिवा कुछ ऐसे मनुष्य भी होंगे जा जैन-ल के प्रचार में अपनी हानि सममेंगे | शभरैर कुछ लोग ते योंही नवीन! भ्रान्दोललन के विरुद्ध रहा करते हैं। ये गुलामी में ग्रानन्द मानने के लिये प्रस्तुत हैंगे किन्तु इन दानों प्रकार के महाशयों की संख्या कुछ अधिक नहों होनी चाहिए। ययपि ऐसे सज्बन बहुत से निकलेंग जिनके लिए यह विषय अधिक मनेरखक न्द्दे। यदि सर्व जैन जाति अर्थात्‌ दिगम्बरी, श्वेवाम्बरी और स्थानकवासी तीनों सम्प्रदाय मिलकर इस बात की चेष्ट। करेंगे कि जैन-लॉ प्रचलित हा। जाय तो काई कारण दिखाई नहीं पड़ता कि क्‍यों ऐसा हो, यद्यपि प्रत्यक्षतया यह विषय प्रासानी से सिद्ध होगा (४ ) यदि हम निम्नलिखित उपायां का अवनम्बन करें ते

अनुमानत: शीघ्र सफल हो सकते हैँ--

( ) प्रत्येक सम्प्रदाय का अपनी अपनी समाजों में प्रथमत: इस जेन-्ला के पत्त में प्रस्ताव पास कराने चाहिएँ |

(ख ) फिर एक स्थान पर प्रत्येक समाज के नेताओं की एक सभा करके जन प्रस्तावों पर स्वीकृति प्रदान करनी चाहिए

( ) जो सज्जन किसी कारण से जैन-लॉ के नियमें। को अपनी इच्छाओं के विरुद्ध पावें वे श्रपनी इच्छाओं की पूर्ति वसीयत के द्वारा कर सकते हैं। इस भाँति धर्म श्र जाति की ख्तन्‍्त्रता भी बनी रहेगी ओऔर उनकी मानसिक इच्छा की पूर्ति भी हे। जायगी

8 (॥

( ) मुकदमे बाज़ी की सूरत में प्रत्येक सच्चे जैनी का जो संसार भ्रमण से भयभीत और मोक्ष का जिज्ञासु है यही कर्तव्य है कि वद्द सांसारिक धन सम्पत्ति के लिए अपनी आत्मा को मलिन करे और दुगति से भयभीत रहे ! यदि किसी स्थान पर कोई रीति यथाथे में जैन-लॉ के लिखित नियम के विरुद्ध है ते स्पष्ट शब्दों में क्दना चाहिए कि जैन-लॉ ते। यही है जो पुक्तक में लिखा हुश्रा है किन्तु रिवाज इसके विरुद्ध है। और उसको प्रमाणित करना चाहिए |

इस पर भा यदि कोई सज्जन माने ते उनकी इच्छा किन्तु ऐसी झवस्था मे किसी जैनी का उनकी सहायता नही करनी चाहिए। उनकी असत्य के पक्ष में काई साक्षी ही मिलना चाहिए वरन जो जैनी साज्ञी सें उपस्थित हो उसको साफ़ साफ और सत्य सत्य हाल प्रऋट कर देना चाहिए। और सत्य बात को नहीं छुपाना चाहिए। जब उभय पक्ष के गवाह स्पष्टतया सत्य बात का पक्ष लेगे तो फिर किसी पक्त की हठवर्म्मी नहीं चलेगी। विचार द्वोता है कि यदि इस प्रकार कार्यवाही की जायगी ते जैन- लॉ की खतन्त्रता की फिर एक बार स्थिति हो जायगी।

(५४ ) इस जैन-लों में वतेैमान जैन शार््तरों का संप्रह, बिना इस्र विचार के कि ये दिगम्बरी वा श्वेताम्बरी सम्प्रदाय के हैं, किया गया है। यह हर्ष की बात है कि उनमें परस्पर मतभेद नहीं है। इसलिए यह व्यवस्था ( कानून ) सब ही सम्प्रदायवालों का मान्य है। सकती है। प्यार किसी को इसमें विरोध नहीं द्वोना चाहिए

( ) जैन-लॉ और हिन्दू-लॉ ( मिताझ्षरा ) में विशेष भिन्नता यह है कि हिन्दू-लॉँ में स्म्मिलित-कुल में ज्वाइंटइस्टेट

[

((०ंए ९४४६/७ ) और सखरबाईवरशिप (5५7४7ए४07599) का नियम हैं। जैनजलों में ज्वाइन्ट टेनेन्सी ( [एंगा $०77८5) है। इनमें सेद यह है कि ज्वाइन्ट इस्टेट में यदि काई सहभागी मर जाय ते! ढसके उत्तराधिकारी दायाद नहीं देते हैं; अवशिष्ट मागियों की हो जायदाद रहती है, और हिस्सों का तखमीना बटवारे के समय तक नहीं हा सकता है परन्तु ज्वाईन्ट टेनेन्सी में (४फपंए०ध्कां) सरवाईवर शिप स्वंधा नहीं होता एक सहभागी के मर जाने पर उसके दायाद उस्रके भाग के अधिकारी हो जाते हैं। इसलिए हिन्दू-क्वों में खानदान मुश्तरिका मिताक्षरा की दशा में मत भ्राता की विधवा की काई हैसियत नहीं होती है श्रोर वह केबल भोजन- वस्त्र पा सकती है। जैन-लॉ में वह झत पुरुष के भाग की अधि- कारिणी होगी चाहे उसकी विभक्ति हा चुकी हो! वा नहीं हा चुकी हा। पुत्र भी जेन-ला के अनुसार केवल पंतामहिक सम्पत्ति में पिता का सहभागी हाता है श्रार अपना भाग विभक्त कराकर प्रथक_करा सकता है किन्तु पिता की मृत्यु के पश्चात्‌ बह उसके भाग को मात्ता की उपस्थिति से नहीं पा सकता; माता की झुत्यु के पश्चात्‌ उस भाग को पाबेगा अस्तु हिन्दू-लॉ में ख्री का काई अधिकार नहीं है। पति मरा और वह सिखारिणी हो गई पुत्र चाहे अच्छा निकले चाहे बुरा माता को हर ससय उसके समक्ष कोड़ी काड़ी के लिए हाथ पसारना ओर गिड़गिड़ाना पड़ता है बहुतेर नये नवाब भेगविल्ञास और विषय- सुख में घर फा धन नष्ट कर देते हैं। वेश्याये" उनकी धन-सम्पत्ति द्वारा आनन्द करती हैं और उसको जलैब व्यय करती हैं। माता ओर पल्नी घर में दे पैसे की भाजी को अकिंचन बैठी रहतो हैं। यदि भाई भतीजें फे हाथ धन लगा ते वे काहे को मृतक की विधवा की चिन्ता करेंगे और यदि करेंगे भी ते टुकड़ों पर बसर करायेंगे।

[ * |

यदि सौभाग्यवश पति कहीं प्रथक दशा में मरा ते विधवा को सम्पत्ति मिली किन्तु वह भी होन हयाती रूप में कुछ भी उसने धर्म काय्य वा आवश्यकता के निमित्त व्यय किया और मुकदसा- छिड़ा रोज़ इसी भाँति के सहस्नों मुकदमे न्‍्यायात्ये। में उपस्थित रहते हैं जिनसे कुठ्म्ब व्यथे ही नष्ट होते हैं और परस्पर शत्रुता चँधतो है। जेन-लॉ में इस प्रकार के मुकदमे हो नहीं हे। सकते

पुत्र की उपश्थिति में भी विधवा का मृत पति की सम्पत्ति को स्वामिनी की हैसियत से पाना वास्तव में अत्यन्त लाभदायक है ! इससे पुत्र को व्यापोर करने का साहस होता है और वह ग्रालस्य और जड़ता से बचता है। इसके सिवा उसका सदाचारी और आज्ञाकारी बनना पड़ता है जितना घन विषय सुख और हराम- खारी में नये नवाव व्यय कर देते हैं; यदि जैन-ला क॑ अनुसार सम्पत्ति उनको मिली हाती ते वह सर्वधा नष्ट होने से बच जाता यही कारण है कि जैनियाँ में सदाचारी व्यक्तियों की संख्या अन्य जातियों की अपेक्षा ग्रधिकतर पाई जाती है यह विचार, कि पुत्र के होते हुए विधवा घन अपनी पुत्री और उसके पश्चात नाती अर्थात्‌ चुत्रों के पुत्र को दे देगी, व्यथे है। हिन्दू-ला में भी यदि पुत्र नहीं है और सम्पत्ति विभाज्य है ता विधवा के पश्चात पुत्री और उसके पश्चात्‌ नाती ही पाता है। पति के कुटुम्ब के लोग नहीं पाते हैं वरन्‌ हिन्दू-ल्ॉ के अनुसार तो नाती ऐसी विधवा की सम्पत्ति की पावेहीगा क्‍योंकि विधवा पूर्श स्वामिनी नहीं द्वोती है वरन केवल यावज्ञोावन अधिकार रखती है। यदि वह इच्छा भी करे ते। भी लाती का अनधिकृत करके पति के भाई भतीजों के नहीं दे सकती। इसके विरुद्ध जैन-लॉ में विधवा सम्पत्ति की पूर्ण स्वामिनी द्वोती है पुत्रो या नाती का कोई अधिकार नहीं होता अतः यदि उसके

[ |]

पति के भाई भतीजे उसको प्रसन्न रकक्‍्ले' और उसका आदर शोर विनय करें ते वह उनका संवका सब घन दे सकती है

इस कारण जेन-लॉ की विशिष्टता सू्यवत्‌ कान्तियुक्त है। इसमें विरोध करना मू्खंता का कारण है। यह भी ज्ञात रद्दे कि यदि कहीं ऐसा प्रकरण उपस्थित द्वो कि पुरुष को अपनी स्त्री पर विश्वास नहीं है तो उसका भी प्रवन्ध जैन-लॉ में मिलता दै। ऐसे अवसर पर दसीयत के द्वारा काये करना चाहिए और स्वेच्छानुकूल अपने धन का प्रबन्ध कर देना चाहिए। यदि कोई जो दुराचारिणी है तो वह अधिकारिशी नहीं हो सकती है। यह स्पष्टतया जैन-लों में दिया हुआ है। मरे विचार में यदि ध्यान से देखा जायगा तो सम्पत्ति के नष्ट होने का भय नये नवाबों से इतना अधिक है कि जैन-लाॉ क॑ रचयिताओं से आक्रोश का अवसर नहीं रहता है

अस्तु जो सज्जन अपने धम्म से प्रेम रखते हैं श्रार उसके स्वातन्त््य को नष्ट करना नहीं चाइते हैं ओर जिनका जैनी होने का गौरव है उनके लिये यही आवश्यक है कि वे झपनी शक्ति भर चेष्टा इस बात की करें कि विरुद्ध तथा हानिकारक अजेन कानूनों की दासता से जेन-लों को मुक्त करा दे गुलामी में आनन्द माननंवाले सजने से भी मरा अनुरोध है कि वे आँखे खेलकर जैन-लॉ के लाभों का समझे और व्यथे को बाते बनाने वा कलम चल्ञाने से निवृत्त होवें।

सौ० सार० जैन

भूमिका

जैन-लॉ एक खतन्त्र विभाग दाय भाग ( [ंपणं8ए7ए0९००७ ) के सिद्धान्त का है। इसके ञ्रादि रचयिता मद्दाराजा भरत चक्र- वर्ती हैं जो प्रथम तीथड्रर भगवान्‌ आदि नाथ मभ्वामी ( ऋषभदेवजी ) के बड़े पुत्र थे* |

यह सब दा सब एक-दम रचा गया था इस्रल्निए इसमें वह चिद्द नहीं पाये जाते हैं जो न्‍्यायाधीशावलम्बित (]ंघ0४९-780७ ८८ जज मेड ) नीति में मिला करते हैं, चाहे पश्चात्‌ सामाजिक आव- श्यकताओं एवं मानवी सम्बन्ध के अनुसार उसमें किसी किसी समय पर कुछ थोड़े बहुत ऐसे परिवर्तनेीं का दो जाना असम्भव नहीं है जा डसके वास्तविक सिद्धान्त के भ्रविरुद्ध दों।। जैन नीति विज्ञान उपासकाध्ययन शास्त्र का श्रड़् था जो अब विलीन दो गया है | वर्तमान जन-लाॉ की आधारभूत अब केवल निम्नलिखित पुम्तकें*हैं---

१--भद्बाहु संहिता, जो श्री भद्रबाहु स्वार्मी श्र॒तकेवली के समय का जिन्हें लगभग २३०७ वे हुए होकर बहुत फाल पश्चात का संग्रह किया हुआ ग्रन्थ जान पढ़ता है तिस पर भी यह कई शताब्दियां का पुराना है। इसकी रचना और प्रकाश सम्भवतः संबत्‌ १६४७-१६६५ विक्रमी अथवा १६०१-१६०८ ३६० के अन्तर में होना प्रतीव दोता है | यह पुस्तक उपासकाध्ययन के ऊपर निर्भर की गई है। इसके रचयिता का नाम विदित नहीं है

# हैं० जि० सै० ३-५२

[८

२--अहंश्नोति--यह श्वेताम्परी अन्ध है इस सम्पादक का नाम और समय इस में नहीं दिया गया है किन्तु यह कुछ अधिक कालीन ज्ञात नहीं होता है। परन्तु इसके अन्तिम रोक में सम्पादक ने स्वयं यह माना है कि जैसा उसने सुना है वेसा लिपि बद्ध किया

३--वर्धभान नीति--इस का सम्पादन श्रो अमितगति आचाय्ये ने लगभग संवत्‌ १०६८ वि० या १०११ इ० में किया है। यह राजा मुज के समय में हुए थे। इसके और भद्गवाहु संद्धिता के कुछ >छोक सर्वथा एक ही हैं। जैसे ३०-३४ जे भद्रबाहु संहिता में नम्बर ५५-५७ पर उल्लिखित हैं। इससे विदित हाता है कि दानों पुस्तका के रचने में किसी प्राचीन सन्थ की सहायता ली गई है। इससे इस बात का भी पता चलता है कि भद्रबाहु-संहिता यहापि वह लगभग ३२४ वष की लिखी है ते भी वह एक अधिक प्राचीन ग्रन्थ के आधार पर लिखी गई है जे। सम्भवतः इंसवी सन्‌ के कई शताब्दि पूर्व के सम्राट_ चन्द्रगुप्त मैय्ये क॑ गुरु स्वामी भद्रबाहु के समय में लिखी गई होगी, जैसा उसके नाम से विदित होता है क्‍योंकि इतने बड़े ग्न्ध में वर्दधमान नीति जैसी छाटी सी पुस्तक की प्रतित्निपि किया जाना समुचित प्रतीत नहीं होता है।

४--इन्द्रनन्दी जिन सेहिता-- इसके रचयिता वसुनन्दि इन्द्रनन्दि स्वामी हैं। यह पुस्तक भी उपासकाध्ययन अंग पर निर्भर है। बिदित रहे कि उपासकाध्ययन अंग लेप दो गया है ओर अब केवल इसके कुछ उपाड़ अवशंष हैं।

प--जिवर्णाचारइ--संवत्‌ १६६७ वि० के मुताबिक १६११ ई० की बनी हुई पुस्तक है। इसके रचयिता भट्गारक से!मसेन स्वामी

. # इस झंश के विषये की सूची और वर्णन के निमित्ति रा० ब० बा० जुगमन्व्रि छाल जैनी की किताब आउट छाइनज़ झाफ जैनिज्म देखनी चाहिए

[ * |]

हैं जे मूल संघ की शाला पुष्कर गच्छ के पट्टाधीश थे। इनका ठीक स्थान विदित नहीं है

६--श्रीआदिपुराणजी--यह अन्थ भगवज्विनसेनाचाय्ये. कृत है जे इसवी सन्‌ की नवीं शताब्दी में हुए हैं जिसको अब लगभग १२०० वर्ष हुए हैं

वर्तमान काल में बस इतने ही भ्रन्थों का पता चला है जिनमें नीति का सुख्यत: वर्णन है। परन्तु इनमें से किसी में भी सम्पूर्ण कानून का वश्ुन नहीं मि्ञता है। तो भी मेरा विचार है कि जो कुछ अड़ उपासकाध्यथन का लोप होने से बच रहा है वह खघ कानून फी कुल आवश्यकीय बाते के लिए यथेष्ट हो! सकता है चाह उसका भाव समभने में प्रथम कुछ कठिनाइयों का सामना पड़े। गत समय में निरन्तर दु्धटनाओं एवं बाह्य दुराचाररों के कारण जैन मत का प्रकाश रसातत्न अथवा अन्धकूप में छिप गया जब अगरेज़ आये ते जैनियां ने अपने शास्रों को छिपाया सरकारी न्यायालयों में पेश करने का विरेध किया | एक सीमा तक उनका यह कृत्य उचित था क्योंकि न्यायाक्षयों में किसी धर्म के भी शाशझ्ञों का कोइ मुख्य खम्मान नहीं होता कभी कभी न्यायाधीश और प्राय: अन्य कमेचारी शास्नरों के प्रष्ठो के लौटने में मुँह का थूक लगाते हैं जिससे प्रत्येक घार्मिक हृदय को दुःख हाता है। परन्तु इस दुःख का उपाय यह नहीं हे कि शास्त्र पेश किये जावें। क्योंकि प्रत्येक काये समय के परिवर्तनों का विचार करते हुए अर्थात्‌ जैन सिद्धान्त की भाषा में द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा से, होना चाहिए

जैनियें। के शाख्रों को न्यायालयों में प्रविष्ट होने देने का परिणाम यह हुआ कि झ्ब न्यायाक्षयों ने यह निशेय कर लिया है

[ ९०]

कि जैनियों का कोई नीतिशास्त्र ही नहीं है ( शिवसिंह राय बनाम दाखा इलाहाबाद ६८८ मुख्यतः: ७०० प्रष्ठ और हरनामप्रसाद ब० मण्डलदास २७ कल्षकत्ता ३७६ प्रृ० ) | यद्यपि सन्‌ १८७३ ई० में कुछ जैन नीति-शाख्रों के नाम न्यायालयों में प्रकट दो गये थे ( भगवानदास तेजमल ब० राजमल १०, बम्बई हाईकोट रिपाट २४८, २५५-२५६ )। और इससे भी पूर्व सन्‌ १८३३ ई० में जैन नीति- शास्रों का उन्‍्ल्ेख शआ्राया है ( गाविन्दनाथ राय ब० गुल्लालचन्द स्तेक रिपाट सदर दीवानी अदालत कलकत्ता प्रष्ठ २७६ )। परन्तु न्यायालयों का इसमें कुछ अपराध नहों हो सकता है। क्योंकि न्यायालयों ने ते प्रत्येक अवसर पर इस बात की फेशिश की कि जैनियां की नीति या कम से कम उनके रिवाजां की जॉच की जाय ताकि उन्हीं क॑ अनुसार उनके झगड़ां का निर्शेय किया जावे सर ई० मीौनटेगा स्मिथ महादय ने शिवसिंह राय ब० दाखा ( इल्ला- हाबाद ६८८ ?. (.. ) के मुकदमे में प्रिवीकींसिल का निशेय सुनाते समय व्याख्या की थी कि “यह घटना वास्तव में बड़ी आश्रयजनक द्वौती यदि कं।ई न्यायालय जेनियों की जैसी बड़ी कौर घनिक समाजों का उनके यर्थष्ट साक्षी द्वारा प्रमाणित कानून श्रौर रिवाजों की पाबंदी से रोकती, झगर यह पर्याप्त साक्षियों से प्रमाणित हो सकें |”! प्रेम- चन्द पेपारा ब० हुलासचन्द पेपारा १२ वीकल्ली रिपोटर पृ० ४<४ में भी जैन नीतिशाम्रों का उल्लेख आया है। अनुमानतः न्‍्याया- लयों के पुराने नियमानुसार पण्डितों से शास्त्रों के अनुकूल व्यवस्था ली गई होगी। यह मुकदमा सन्‌ १८६< ई० में फैसल हुमा था

हिन्दुओं को भी ऐसा ही भय अपने शालत्यों की मानहानि का था जैस! जैनियों को, परन्तु उन्होंने बुद्धिमानी से काम लिया जैनियों

[ ११ ] की भांति उन्होंने अपने धर्म-शास्त्रों को नहीं छिपाया पमलौर उनके छपने छपाने में बाधक नहीं हुए। जैनियों को महासभा ने बारम्बार यही प्रस्ताव पास किया कि छापा धर्म विरुद्ध है। इसका परि- शाम यह हुआ कि अब तक लोगों को यह प्रकट नहीं हुआ कि जैन- धर्म वास्तव में क्‍या है क्यौर कब से प्रारम्भ हुआ और इसकी शिक्षा क्या हैं; कौन कान से नीति श्रौर नियम जैनियों को मान्य हैं तथा उनकी कानूनी पुस्तक वास्तव में कया क्‍या हैं। रा० ब० बा० जुगमन्दर लाज्न जैनी बेरिस्टर-एट-ज्ञा भूत पूर्व चीफ जज हाई- कोट' इन्दौर च्ले प्रथम बार इस कठिनाई का अनुभव करके जेन-लॉ नामक एक पुस्तक सन्‌ १€०८ ६० में तैयार की जिसको स्वर्गीय कुमार दवेन्द्रप्रसाद जैन आरा-निवासी ने १€१६ ई० में प्रकाशित कराया परन्तु यह भी सुयोग्य सम्पादक को अधिक श्रवकाश मिलने एव' जैन समाज के प्रमाद के कारण श्रपूर्ण ही रही और इसके विद्वान रचयिता ने विद्यमान नीति-पुस्तकों में से कुछ के संग्रह करने और उनमें से एक के अनुवाद करने पर ही संतेष किया। किन्तु इसके पश्चात्‌ उन्होंने जेन-मित्र-मण्डल देहली की प्राथना पर व्धमान नीति तथा इन्द्र नन्दी जिन संहिता का भी अनुवाद कर दिया है। इन अनुवादों का उपयाग मैंने इस ग्रन्थ में अपने इच्छानुसार किया है जिसके लिए अनुवादक महेो- दय ने मुझे मैत्रो-भाव से सहर्ष श्माज्ञा प्रदान की। मगर ते भी जैनियां ने काई विशेष ध्यान इस विषय की ओर नहों दिया हाँ, खनन १८२१ ३० में जब डाक्टर गौड़ का हिन्दू-काड प्रकाशित हुआ कौर उसमें उन्होंने जैनियों को-धर्म-बिमुख हिन्दू (700प 485९४- ०/७ ) लिखा उस समय जैनियों ने उसका कुछ विरोध किया और जैन-ला कमेटी के नाम से ध्रेंगरेज़ी-भाषा-विज्ञ वकीलों , शाखज्ञ पण्डितों

आम

और अनुभवी विद्वानों की एक समिति स्थापित हुई जिसने प्रारम्भ में अच्छा काम किया परन्तु अन्तत: अनेक कारणों, जैसे दूर देशा- न्तरों से सदस्यां की एकत्रता कष्टसाध्य होना इत्यादि, फे उपस्थित होने से यह करमंटी भी अपने उद् श्य को पूरा कर सको | जब यह दशा जेन-समाज की बतैमान समय में है ता इसमें क्‍या आश्चय है. कि १८६७ ई० में कलकत्ता हाईकोर्ट ने जैनियों पर हिन्दू-लाँ के लागू कर दिया (महावीरप्रसाद बनाम मुसस्मात कुन्दन कुँवर वीछ्ली रिपोर्टर प्र० ११६ )। छेोटेलाल ब० छुन्नू- लाल ( कलकत्ता प्ृ०. ७४४ ); बचेवी ब० मक्लनलाल ( इलाहाबाद प्रू० ५५ ); पेरिया अम्सानी ब० कृष्णा स्वामी ( १६ मदरास १८२ ) मण्डित कुमार घब० फ़्लचन्द ( २े कश्तकना वी० नेट्स प० १४४ ) ये सब मुकदमे हिन्दू-लां के अनुसार हुए और ग़लत निग्गेय हुए क्योंकि इनमें जेन रिवाज ( नीति ) प्रमाणित नहीं पाया गया और जो मुकद्म सही भी फैसल हुए& वह भा वाम्तव में ग़लत ही हुए क्‍योंकि उनका निशेय मुख्य जैन रिवाजों की आधी-

-- उदादरणाथ दखा--

शिवसि राय ब० दाखो $ इल्ठा० दुझृ८ प्री० का०; अम्माबाई ब० गोपिन्द २३ वस्बई २९७; लक्ष्मीचन्द बनाम गद्योेबाई इल्टा० ३१६; मानक- चन्द गोलेचा ब० जगत सेठानी प्राण कुमारी बीबी १७ कलकत्ता १८; सोहना शाह ब० दीपाशाह पञ्माद रिकार्ड १५६०२ न० १४ $ शस्भूनाथ ब० ज्ञान- चन्द १६ इला० ३७६ ( जिसका एक देश सही फुसल्टा हुआ ); हरताभ- प्रसाद ब० सण्डिड्दास २७ कुछ० ३७६; सनेहरहाल ब० बनारसी दास २६ इत्ठा० ४६९; अशरफी कुँअर ब० रूपचन्द ३० इला० १६७; रूपचन्द ब० जम्ब असाद ३२ इला० २४७ औरी० की०; रूपभ ब० चुन्नीव्ाात्ट अम्बूसेठ १६ बम्बइ ३४७; मु० साना ब० सु० इन्द्रानी बहू ७८ इंडियन केसेज (नाग-

पुर ) ४६१; मौजीकाल ब० गोरी बहू सेकेण्ड अपील न० ४१६ (१८६७ नाग पुर जिसका हवाडा इंडियन केसेज़ ७८ के पघ० ४६१ में है )।

[ १३ ]

नता के साथ ( यदि ऐसे कोई रिवाज दों ) मिताक्षरा कानून से हुआ कि जेन-छो के अनुसार जैसा कि होना चाहिए था

इन मुक॒दमों के पश्चात्‌ जो और मुकदमे हुए उनमें भो प्राय: यही दशा रही परन्तु तो भो सरकार का उद्दश्य और न्याया- लगा का कर्तव्य यही है कि वह जैन-लॉ या जैन रिवाजों के ध्रनुसार ही जेनियों के मुकृदर्मों का निर्णय करें। यह कोड इसी झभिल्ाषा से तय्यार किया गया है कि जैन-लॉ फिर स्वतन्त्रतापृवंक एक बार प्रकाश में आकर काये मे परिणत हो! सके तथा जेनी अपने ही कानून के पान्द रहकर अपने धर्म का समुचित पालन कर सके'

यह प्रश्न कि हिन्दू-ल्लों की पाबन्दो में जैनियों का क्या बिग- ड़ता है उत्पन्न नहीं द्वोता है होना ही चाहिए# इस प्रकार ते

के इस बान के दिखाने के त्टिए कि यदि जैनी अपने कानून की पाबन्दी नहीं कग्न पाये गे ते किस प्रकार की हानिर्या उपस्थित होगी एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा जैनियों में पुत्र का अधिकार पाता के आधीन रक्खा गया है जिसकी उपस्थित में वह विरसा ( दाय ) नहीं 'पात) हैं ख्त्री अपने पति की सम्पूर्ण सम्पत्ति की पूर्ण स्वासिनी होती है। वह ख्तन्‍त्र होती है कि उसे चाहे जिसको दे डाले उसको कोई रोक नहीं सकता, सिवाय इसके कि उसको छोटे बच्चों के पालन-पेफण का ध्यान अवश्य रखना होता है। इस उत्तम नियम का यह प्रभाव है कि पुत्र के सदाचार, शील और आज्ञापालन में आदर्श बनना पड़ता है ताकि माता का उस पर प्रेम बना रहे पुत्र की स्वतन्त्र स्वामित्व साता की उपस्थिति में देने का यह परिणाम होता है कि माना की आज्ञा निप्फल हो जाती है जेनियां में दोषियों की सैख्या कम होना जैसा कि अन्य जातियों की अपेक्षा वर्तमान में है जैन-कानून बनानेवाल्टों की बुद्धि- मत्ता का ज्वलन्त उदाहरण है। यदि जैनियों पर वह कानून व्टागू किया जाता है जिसका प्रभाव माता की ज़बान को बंद कर देना या उसकी आज्ञा को निप्फल बना देना है तो ऐसी दशा में उनसे इतने उत्तम सदाचार की आशा नहीं की जा सकती

[ १४ ] हम यह भी पूछ सकते हैं कि यदि मुसलमानों और इखाइयों के मुकदमे भी हिन्दू नीति के अनुसार फेसल कर दिये जावें ते क्या हानि है। इस प्रकार किसी अन्य मत की नीति की पाबन्दी से शायद कोई व्यक्ति सांसारिक विषयों में काई विशेष हानि दिखा सके परन्तु स्वतन्त्रता के इच्छुकी को स्वयं ही विदित है कि प्रत्येक रीति क्रम (५४४४७०)) एक ऐसे दृष्टिकोण पर निभर होता है कि जिसमें किसी दूसरी रीति क्रम ( 5४४0॥ ) के प्रवेश कर देने से सामाजिक विचार और श्राचार की स्वतन्त्रता का नाश हा जाता है और व्यथ द्वानि अथवा गड़बड़ी के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त नहीं हाता इतना कह देना भी यथेष्ट होगा कि रिवाजों के रूप में ही जैन-नीति के उद्देश्यां का पृणतया पालन हा सकता है ओर इसलिए अब तक जैसा हाता रहा है वैसे ही होते रहने दे क्योंकि प्रत्येक कानून का जाननेवाला जानता है कि किसी विशेष रिवाज का प्रमा- खित करना कितना कठिन काये है। संकड़ां साज्ञो और उदाहरणों द्वारा इसके प्रमाणित करने की आवश्यकृता हाती है जा साधारण मुकदमंवालों की शक्ति एवं छोटे मुकदमा की हैसियत से बाहर है आर फिर भी अन्याय का पूरा भय रहता है जैसा कि एक से अधिक अवसरों पर हो चुका है। समाज भी भयभीत दशा में रहता है कि नहीं शालम माखिक साक्तिययां द्वारा प्रमाशित होनेवालें रिवाज- विशेष पर न्यायालय सें क्या निर्णय हो। जाय यदि कहीं फैसला डल्तरा पत्नटा हा। गया ते अशांति आर भी बढ़ जाती है, क्योंकि यह ( नि्ेय ) वास्तविरु जाति रिवाज के प्रतिकूल हुआ किसी साधारण मुकदमे में अन्याय हा जाना यद्यपि दोषयुक्त है किन्तु उससे अधिक द्वानि की सम्भावना नहीं है क्योंकि उसका प्रभाव केवल विपक्षियों पर ही पड़ता है। परन्तु साधारण रिवार्जा

[ १४ ]

के सम्बन्ध में ऐसा देने से उसका प्रभाव सर्व समाज पर पड़ता है | इसी प्रकार की और भी द्वानियाँ है जो उसी समय दूर दो सकेंगी जब जैन-लॉ स्वतन्त्रता को प्राप्त हो जायगा

कुछ व्यक्तियों का विचार है कि जेन-धर्म हिन्दू-धर्म को शाखा है। और जेन-नीति भी वही है जे हिन्दुओं की नीति है। यह लोग जैनियां का धर्म-विमुख हिन्दू ( ॥[700 0ऑ१५४९॥००७ ) मानते हैं। परन्तु वास्तविकता सर्वथा इसके विपरीत है। यह सत्य है कि हिन्दू-लॉ और जैन-लों में ग्रधिक समानता है तो भी यदि आया का खतनत्र कानून कोई हो सकता है- ता जेन-लॉ ही द्वो सकता है। कारण कि हिन्दू-धर्म जैन-घर्म का स्रोत किसी प्रकार से नहीं हो सकता वरन्‌ इसके विरुद्ध जैन-धर्म हिन्दू-धर्म का सम्भवतः मूल हे। सकता है। क्योंकि हिन्दू-धर्म और जैन-धर्म में ठीक वही मम्बन्ध पाया जाता है जो विज्ञान ओर काव्य-रचना में हुआ करता है एक वेज्ञानिक है दूसरा अलड्डारयुक्त इसमें से पहिल्ला कौन हो सकता हैं आर पिछला कान इसका उत्तर टामस कारलाइल के कथनानुसार यां दिया जा सकता है कि विज्ञान ( 5छ०॥०० ) का सद्भाव काव्य-रचना ( ४)]०४०४ ) से पूर्व होता है भावाधे, पहिले विज्ञान होता है और पीछे काव्य-रचना+#

जैनी लोग धर्म विमुख हिन्दू ( निशातिच तींडबछा।। ए५ ) नहों हो। सकते हैं। जब एक घमे दूसरे धर्म से प्रथक हाकर निक-

... देखा रचयिता की बनाई हुई निम्न पुस्तके ---

की ऑफ नॉलेज (7९९ए५ 0[| $फशए७60४2० ) प्रैक्टिकल पाथ (]780.0७) 7॥0), कानफ्लेएन्स आफ ओपोजिट ((५)0ी॥९700 0 0[फ०व७8 ०). 9 ) और हिन्दू उदासीन साधु शह्बुराचाय' की रचित

आत्मरामायण तथा हिन्दू पांण्डत के० नारायण आइर की रचित परमनेन्ट हिस्ट्री आफ भारतवर्ष ( ?लामाक्याएा परा७07ए फ्रावाश्रा्वाछ8 )

[ १६ |

लवा है ता उनके अधिकांश सिद्धान्त एक ही होते हैं। भ्रन्तर केवल दे। चार बातों का हाता है अब यदि हिन्दू मत को अलंकार- युक्त मानकर जैन मत से उसकी तुलना करे ते बहुत से श्रन्तर मिलते हैं। समानता कंबल थाई सी ही बातों में है, सिवाय उन बातें के जो लौकिक व्यवहार से सम्बन्ध रखती हैं। यहाँ तक कि संस्कार भी जो एक से मालूम पड़ते हैं वास्तव में उद्देश्य की अपन्षा भिन्न हैं यदि उन्हें ध्यानपृ्वक देखा जाय जैनी जगत का प्रनादि मानते हैं; हिन्दू इश्वर-कृत जैन मत में पूजा किसी अनादि निधन स्वयंसिद्ध परमात्मा की नहीं हाती है वरन्‌ उन महान पुरुषों की द्वाती है जिन्होंने अपनी उद्देश्य सिद्धि प्राप्त कर ली है और खर्य परमात्मा बन गये हैं ! हिन्दू मत में जगतू-स्वामी जगत्‌-जनक एक इंश्वर की पृजा होती है। पूजा का भाव भी हिन्द मत में वही नहीं है जा जैन मत में दै। जैन मत की पूजा आदश पुजा (0५४)॥9/8 ) है। उसमें देवता का भाग लगाना आदि क्रियाएँ नहीं हाती हैं, देवता से कोई प्राथेना की जाती है कि इमका अमुक बम्तु प्रदान करो। हिन्दू मत में देवता के प्रसन्न करने से अथ- सिद्धि मानी गई हैं। शास्त्रां के सम्बन्ध में तो जेन-धर्म और हिन्दृ-धर्म में आकाश पातात्न का अन्तर है। हिन्दुओं का एक भी शास्त्र जैनियो' को मान्य नहों हैं और हिन्दू ही जैनियां के किसी शास्त्र को मानते हैं। लेख भी शाश्रों के विभिन्न हैं। चारों वेद और अठारदह पुराणों का जा हिन्दू मत में प्रचलित हैं कोई अंश भी जैन मत के शाख्रों में सम्मिलित नही है, जैन मत के पृज्य शात्रों का कोई अंग स्पष्ट अथवा प्रकट रीति से हिन्दू शाम्नों में पाया जाता है। जिन क्रियाओं में हिन्दू और जैनियां की समा- नता पाई जाती है वह कवल सामाजिक क्रिया है, उनका भाव

[ १७ ] भी जहाँ कद्दी वह धार्मिक सस्वन्ध रखता है एक दूसरे के विपरीत है साधारण सभ्यता सम्बन्धो समानता विविध जातियों में जो एक साथ रहती सहतती चली आई हैं, हुआ ही करती है मुख्यतः ऐसी दशा में जब कि उनमें विवाहादिक सम्बन्ध भी होते रहें जैसे हिन्दू और जैनियां में होते रहे हैं। कुछ सामाजिक व्यवद्दार जैनियों, हिन्दुओं और मुसलमान इत्यादि में एक से पाये जाते हैं परन्तु इनका कोई मुख्य प्रभाव धर्मे-सम्बन्धो विषयों पर नहीं होता है। इसके अतिरिक्त राजाओं और बड़े पुरुषों की देखा देखो भी बहुत सी बाते' एक जाति की दूसरी जाति में ले ली जाती हैं। आपत्ति-काल में धर्म श्र प्राशरक्षा के निमित्त भी धार्मिक क्रियाओं में बहुत कुछ परिवर्तन करना पड़ता है। गत समय में भारतवर्ष में हिन्दुओं ने जैनियों पर बहुत से अत्याचार किये। जैन शावकों कौर साधुओं को घार दुःख पहुँचाये और उनका प्राशघात तक किया। ऐसी दशा में जैनियों ने अपने रक्षाथे ब्राद्णोय लोभ की शरण ली ओर सामाजिक विषयों में ब्राह्मणों का पूजा पाठ के निमित्त बुलाना आरम्भ किया* यह रिवाज अभी तक प्रचलित है और अब

स्वयं भह्रबाहु संहिता के एक दूसरे अप्रकाशित भाग का निम्न लोक इस विषय के स्प्ष्टतया दुर्शाता है-- जेँ कि चिव उप्पादम्‌ अ्रण्ण' विगस्ध क्व तत्थणासेई दुक्खियय देज् सुबण्ण' गावी भूमिय विष्प देवाण' ॥४॥ ११२ भावाथे--जा कोई भी झापत्ति या कष्ट पड़ें ता उस समय ब्राह्मण देवताओं को सुबर्ण, गऊ और प्रथ्वी दान देना चाहिए इस प्रकार उसकी शांति हो जाती है नेाट--जैनियों पर हिन्दुओं के अत्याचार का वर्णन बहुत स्थानों पर झाया है। निम्नांकित लेख एक हिन्दू मन्दिर के स्त पर है जो हिन्दुआ की जैनिये! के प्रति गत समय की स्पर्धा और अन्याय का ज्वलहून्त उदाइरण है ( देखे दर

[ ९८

भी विवाहादिक संस्कारों में ब्राह्मणों से काम लेते हैं। परन्तु बम सम्बन्धी विपय नितान्त प्रथक्‌ हैं। उनसे कोई प्रयोजन नहीं है। अनभिज्न तथा अध विज्ञ पुरुषों ने आरम्भ में जैन-घर्म को बौद्ध-धर्म की शाखा समझ लिया था किन्तु अब इस भ्रम में कदाचित्‌ ही कोई पड़ता हो अब इसकी हिन्दू मत की शाखा सिद्ध करने को कुछ बुद्धिमान उतारू हुए हैं से| यह श्रम भी जब उच्च कोटि के बुद्धि- मान इस ओर ध्यान दे गे शीघ्र दूर है। जायगा |

नीति के सम्बन्ध में भी जेनियों शऔर हिन्दुओं में बड़े बड़े अन्तर हैं। जैनियों में दत्तक पारलैाकिक सुख प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं लिया जातारे पुत्र क॑ हाने होने से कोई मनुष्य पुण्य 5फ0॥|0५॥ 0 [0 0 ने क्वाता छा ]877 44 0५०५ 3-7 ):- “सरसेल्म के स्तम्भ-लेख सम्बन्धी विवरण से स्पष्टलथा अकट है कि हिन्दुओं ने जेनियों पर किस किस अकार श्रन्याय किये जिससे उस देश से श्रस्ततः जैन- धर्म का अन्त हा गया यद्द स्तस्भ-लेख वास्तव में शिवोपासक हिन्दुओं का ही है। संस्कृत भाषा में सलिस् अ्रमन के मन्दिर के मण्डप के दाने और बाये' तरफ़ स्तम्भो पर यह एक हग्बा लख है जिसमे उलिखित है कि स्े० १४३३ प्रजोत्पत्ति माघ बदी १४ खामवार के दिन सन्त के पुत्र राजा लिह्न ने, जो भक्तयान्मस शिवोपासक था, सरसलस के मन्दिर में बहुत सी में 2 चढ़ाई इसमे हस राजा का यह काय भी सराहा गया है कि उसन कतिपस श्तरेतास्ब्र जैनियें के सिर काटे यह छेख दे प्रकार से विचारणीय हैं प्रथम यह कि इससे प्रकट होता है कि श्रेश्न देश से ईसा की ग्यारहवीं शताब्दि के प्रथम चतुथ भाग में शिवमतानुयाय्री जनियों के साथ शत्र ता रखते थे यह शन्नता साहुहवीं शताडिद के प्रथम चतुध भाग तक जानी दुश्मनी बन गई। द्वितीय यह कि दक्षिण भारत में श्वेतामबर सम्प्रदाय को भी चहई के शिवोपासक छोग ऐसा सम्प्रदाय समझते थे जिसका अत कर देना शेंवों को अभीणट था |”?

( ) देखा शिवकुमार बाई ब० जीवराज २९ कट बी० नाट्स २७३ मानकचन्द बनास मुन्नाझाछ ६४४ प्रज्ञाव रकाड १६०६-४ इंडियन केसेज पा०४४; चधमाननीति २८

[ १<€ ]

चाप का भागी नहीं होतारे बहुत से तीथेझ्ूर पुत्रवात्‌ द्वोकर भी परम पृज्य पद को प्राप्त हुए। इसके विपरीत बहुत से मनुष्य पुत्रवान्‌ द्वोते हुए भी नरकगामी होते हैं। ते जैन-धर्म का यह उपदेश है हो सकता है कि कोई अपनी क्रियाओं या दानादि से किसी सतक जीव को ज्ञाभ पहुँचा सकता दहै। पिण्डदान का शब्द जहाँ कहीं जैन नीति-शाश्षों में मिलता दै उसका वही श्रथ नहीं है जे। हिन्दुओं के शाख्रों मे पाया जाता है कि पितरों के लाभाथे पिण्ड देना। ऐंसा प्रतीत होता है कि जैनियों ने यह शब्द प्रत्या- चार के समय में त्राह्मण जाति के प्रसन्नाथे अपनी कुछ कानूनी पुस्तक में बढ़ा लिया जैन-लॉ में .पिण्डदान का अर्थ शब्दाथे में लगाना हागा। जैसे सपिण्ड का अधथ शारीरिक अथवा शरीर सम्बन्धी है उसी प्रकार पिण्डदान का अथे पिण्ड का प्रदान करना, श्रथवा वीये- दान करना, भावाधे पुत्रोत्पत्ति करना है जिसके द्वारा पिण्ड श्रधांत्‌ शरीर की उत्पत्ति होती है। जैन-सिद्धान्त के अजुप्तार पिण्डदान का इसके अतिरिक्त और कोई ठीक अथ नहीं हो। सकता है। यह ध्यान देने योग्य है कि अहज्नोति में जे श्वेताम्बर सम्प्रदाय का एक मात्र नीति-सम्बन्धी प्रन्थ है पिण्डदान का उल्लेख कहीं भी नहीं आया है।

ज्वियों के अधिकारों के विषय में भी जैन-लां और हिन्दू-लॉ मे बहुत बड़ा अन्तर है। जैन-लॉ अनुसार स्लियाँ दाय भाग की पूणतया अधिकारिणी होती हैं हिन्दू-लॉ में उनका केवल जीवन पर्य ( ॥80 ९४४४0 ) अधिकार मित्रता है। सम्वत्ति का पूर्ण स्वामित्व हिन्दू-लाँ के अनुसार पुरुषों ही को मिलता है। पढ्नों पूर्णतया अधांड्रिनी के रूप में जैन-लॉ में ही पाई जाती है। पुत्र घर (३ ) भद्॒बाहु स० ८--६।

[ २० ]

भी उसके समक्ष कोई अधिफार नहीं रखता है। जैन-लॉ में लड़का केवल बाबा ( पितामह ) की संपत्ति में अधिकारी है। पिता की निजी स्थावर सम्पत्ति में उसको केबल गुज़ारे का अधिकार प्राप्त है | और अपने जड्रम द्रव्य का पिता पूर्ण श्रधिकारी है चाहे जिस प्रकार व्यय करे | इसके अतिरिक्त हिन्दू-लॉ में अविभाजित दशा की प्रशंसा की गई है। जैन-लॉ में उसका निषेध करते हुए भी प्रथकता का आपग्रद्द है ताकि धर्म की वृद्धि हा जन-लॉ में अविभाजित सम्पत्ति भी सामुदायिक द्रव्य ( [0000८५9 4॥ ८०७४०) ) के झरूप में है कि मिताक्षरा के अनुसार अविभक्त सम्पत्ति ( [भा ८५७॥ ) के तैर पर यदि कोई पुत्र धर्मभ्रष्ट एवं दुष्ट वा ढठीठ है और किसी तरह से माने ते जैन-नीति के अनुसार उसको घर से निफाल देने की ध्ाज्ञा है परन्तु हिन्दू-लों के अ्रमुसार ऐसा नहीं हा सकता इसी प्रकार क॑ अन्य भंदात्मक विषय हैं जा हिन्दू-लॉ और जैन-लॉ के अ्रवलेकन से स्य' ज्ञात हा जाते हैं। इसलिए यह कहना कि जेल-धर्म हिन्दू-धर्म की शाखा है और जेन-ला, हिन्दू-लाँ समान हैं, नितानन्‍्त मिश्या है

अन्तिम सट्डूलित भाग में मैंने वह निबन्ध जाड़ दिया है जा डा८ गौड़ के हिन्दू-कोड के सम्वन्ध में लिखा शा परन्तु उसमें से वह भाग छेड दिया हैं जिसका वर्तमान विषय से काई सम्बन्ध नहीं है। तथा उसमें कुछ ऐसे विशेष नोट बढ़ा दिये गये हैं जिनसे इस बात का ऐतिहासिक ढंग से पता लगता है कि जैनियों पर हिन्दू-लॉ का लागू करने का नियम कैसे स्थापित किया गया |

अन्ततः मैं उन विनयान्मत्त धर्मप्रेमियों से जे अभी तक शास्त्रों के छुपाने का विरोध करते चल्ले झाते हैं अनुराध करूँगा कि अब वह समय नहों रहा है कि एक दिन भी और हम अपने शास्त्रों को

| हेह .] छिपाये रहें यदि उनको शास्त्र सभा फे शास्त्र को मन्दिर से ले जाकर न्यायालयों में प्रविष्ट करता रुचिकर नहीं है ( जिसको मैं भी अनुचित समभता हूँ ) ते उनका अपने शासषों को छप्वाना चाहिए ताकि छापे की प्रतियों का अन्य प्रत्येक स्थान पर प्रयोग किया जा सके, और जैन-धर्म, जैन-इतिहास और जैन-लॉ के संबंध में जो किंबद तियाँ संसार में फैल रही हैं दूर हो! सके लन्दन चम्पतराय जैन, २४-६-२६ बैरिस्टर-एट-ला, विद्यावारिधि

जेन-लॉ

अथम भाग

प्रथम परिच्छेद दत्तक विधि और पृत्र-विभाग

या कहने का ले बहुत प्रकार के सम्बन्धियों को पुत्र (१) शब्द से सम्बाधित कर देते हैं। परन्तु कानून के अनुसार पुत्र दो ही प्रकार के माने गये हैं ( ) एक औरस (२ ) दूसरा दक्तक (२)।

आरस पुत्र विवाहिता स्त्री से उत्पन्न हुए का, श्रौर दत्तक जो गाद लिया है। उसे कहते हैं। सर्वे पुत्रों में औरस ओर दत्तक ही मुख्य पुत्र गिने गये हैं। गौण पुत्र जब गाद लिये जातें तभी पुत्रों की भाँति दायाद हो सकते हैं अन्यथा अपने वास्तविक सम्बन्ध से

( ) जेसे सहोदर ( रघु ञ्राता ), पुत्र का पुत्र, पाला हुआ बच्चा इद्यादि ( देखो भद्वबाहु संडिता ८०-८३; वध मान नीति २--४; इस्दध्र० जि० सं० ३२---३४; अह ६६-७३; त्रिवर्णाचार ६। ६; नीतिवाक्यारूत अ्रध्याय ३१ )। इनमें कहीं कहीं विरोध भी पाया जाता है जो श्रज्ुुमानतः कानून को काव्य अर्थात्‌ पद्म में लिखने के कारण है। गया है क्योंकि काब्य-रचखना कानून लिखने के लिए उचित रीति नहीं हे

(२ ) देखो उपयु क्त प्रमाण न॑०

रे जैन-लॉ

यदि बह अधिकारी हैं ते दायाद होते हैं जैसे लघु आता औरस झौर दत्तक दाने ही सपिण्ड गिने जाते हैं श्रौर इसलिए पिण्डदान करनेवाह्ले अर्थात्‌ वंश चलानेवाले माने गये हूँ | शेष पुत्र यदि अपने वास्तविक सम्बन्ध से सपिण्ड हैं ते सपिण्ड होंगे अन्यथा नहीं दत्तक पुत्र में वह पुत्र भी सम्मिलित है जे क्रात कहलाता है जिसका अथ्थे यह है कि जे! मोल लेकर गोद लिया गया हो। जिस शात्त्र ( ) में क्रोत को अनधिकारी माना है बहाँ तात्पये कंक्‍ल माल लिये हुए बालक से है जो गाद नहीं लिया गया हो | नीतिवाक्याम्ृत ( ) में जो पुत्र गुप्त रीति से उत्पन्न हुआ हो अथवा जो फेंका हुआ हे। वह भी अधिकारी तथा पिण्डदान के याग्य ( कुल फे चलानेवाले) माने गये हैं, परन्तु वाम्तव में वे औरस पुत्र ही हैं। किसी कारश से उनकी उत्पत्ति को छिपाया गया या जन्म के पश्चात्‌ किसी हँतु विशेष से उनको पृथक कर दिया गया था। चारों बर्णों में एक पिता की सन्‍्तान यदि कई भाई एकत्र ( शामिल ) रहते हां ओर उनमें से एक के ही पुत्र हो ता सभी भाई पुत्रवाले कहतावेंगे ( ) इस प्रश्न का कि क्या वह अन्य भाई अपने लिए पुत्र गोद ले सकते हैं कोइ उत्तर नहीं दिया गया है। परन्तु यह स्पष्ट हे कि यदि वह एकत्र रहते हों ते उनको पुत्न गोद लेने में काई बाधा नहीं है। और इस कारण से कि विभाग की मनाही नहों है श्लौर वह चाद्दे जब अलग-भ्रल्ग हे। सकते हैं यह परिणाम निकलता हैं कि उनका गाद लेने की मनाही नहीं

( ) नी० वा० अध्याय ३१

( हर ) 93 97 है | (२ ) भद्र० संहि० इे८, अह ६००१

प्रथम भाग डे

१८२ ) परन्तु अब इसका कुछ व्यवहार नहीं है ( देखो गौड़ का हिन्दू कोड द्वितीयावृत्ति प० ३२४ )। यदि कोई व्यक्ति बिना गोद लिए मर जाय तो दूसरे भाई का पुत्र उस मस्तक के पुत्र को भाँति अधिकारी होगा |

यदि किसी पुरुष के एक से अ्रधिक स्त्रियों दो और उनमें से किसी एक के पुत्र हो तो वह सब खस्िया पुत्रवती समझो जावेंगी (६ )। उनकी गाद लेने का अधिकार नहीं होगा ( )। क्योंकि ख्त्रियाँ अपने निमित्त गोद नहीं ले सकती हैं केबल अपने मृतक पति के ही लिए ले सकती हैं। और केवल उसी दशा में जब कि वह मृतक पुत्रवान्‌ हो। वह एक स्त्री का लड़का उन सबक धन का

अधिकारी होगा ( )। कौन गोद ल॑ सकता हे

पक्रौरस पुत्र यदि हो ( ८) या मर गया दो ( ) ता पुरुष अपने निमित्त गोद ले सकता है ( १० ) या औरस पुत्र को उस्रफे दुराचार के कारण निकाल दिया हो और पुत्रत्व तोड़ दिया गया हो ते! भी गोद लिया जा सकता है ( ११ )।

यदि पुत्र अविवाहित मर गया हो ता उसके लिए गाद नहीं लिया जा सकता ( ) अर्थात्‌ उसके पुत्र फे तौर पर नहों लिया जा सकता। दत्तक पुत्र को यदि चारित्यभ्रष्टता क॑ कारण निकाल

(६ ) भद्ग संहि० ३६; अह धर्म

( ७) ? ४०; ?” &०८।

(८) ”! ”? ४१; झूमप--र६; वध ३१--३४ ( & | 99... 95 *६; व० नी० ३४

(१ ०) 98... 99 8१; अह छ्प--८६; व० नी० ३४ |

(११) अ० नी० ८-८६

रु जैन-लॉ

दिया गया हो ते भी उसके बजाय दूसरा छड़का गोद लिया जा सकता है ( १२)।

यदि पति मर गया हो ते विधवा भी गोद ले सकती है ( १३ )। विधवा को अनुमति की आवश्यकता नहीं है ( १४)। यदि दे विधवा हों तो बड़ी विधवा को छेोटो विधवा की अनुमति के बिना गोद लेने का अधिकार प्राप्त है (१५)। साख बहू दोनों विधवा हें। ते! विधवा बह गोद ले सकती है ( १६ )। बशते कि दाय बहू ने पाया हा जे उसी दशा में सम्भव है जब पुत्र पिता के पश्चात्‌ मरा हा अभिप्राय यह है कि जायदाद जिसने पाई है बही गाद ले सकता है। जिसने जायदाद विरसे में नहों पाई है वह गाद लेकर वारिस जायज को वरसे से महरूम नहीं कर सकता। विधवा बच्दू सास की आज्ञा से गोद लेबे ( १७ )। परन्तु यह भी डपदेश मात्र है कि लाज़मी शक्त मालूम पड़ती है सिवाय उस अवस्था के जब कि सास जाथदाद की अधिकारिणी है। ऐसी दशा में उसकी अनुमति का यही अभिप्राय हागा कि उसने विर्से से हाथ खोच लिया और दत्तक पुत्र वह जायदाद पायेगा दत्तक

( १२ ) व्धे० र८; अरह पम-पह

( १३ 7? रेणब३०; / रू वें १३२६ भद् ७३

( १४ ) श्रशरफी कुँवर ब० रूपचन्द, ३० इत्ठाहाबाद १६७ शिवकुमार ब० ज्योराज २९ कठ० वीकली नेट्स २७३ )',(',। ज्योराज बनास शिवकुँवर इं० कैसेज ६६ ए० ६५ मानक चन्द ब० मुन्नाताज, ६४ पश्चाव रिकाड १६० ई० वन इं० के० ८४४। मनाहरलाल ब० वनारसी दास २६ इल्त० ४६५

( १४ ) श्रशरफी कु बर ब० रूपचन्द ३० इलाहाबाद १६७; अमावा ब० महदगीदार> वस्त्रई ४१६।

(१६ ) भद्व ७४; अह ११०।

( १७ ) भद्ग ११६ |

प्रथम भाग श्‌

पुत्र के अविवाहित मर जाने पर उसके लिए कोई पुत्र गोद नहीं ले सकता है ( १८)। उसकी विधवा माता उसका धन जासाता को दे दे वा बिरादरी के भाजन वा धमम-कार्य में स्वेच्छानुसार लगावे ( १€ )। अभिप्राय यह है कि उसके विरसे की अधिका- रिणी उसको विधवा माता ही होगी जे! सम्पूर्ण अधिकार से उसको पावेगी वह विधवा अपने निमित्त दूखरा पुत्र भी गोद ले सकती है ( २० ) अर्थात्‌ अपने पति के लिए ( २१ ) उस मृतक पुत्र के लिए नही ले सकती है एक मुकदमे में, जिस का निशेय हिन्दू-लॉ के अनुसार हुआ, जैन विधवा का पहिलते दत्तक पत्र क॑ मर जाने पर दूसरा पुत्र गोद लेने का अधिकार ठीक माना गया (२२ )। दत्तक लेने की सब वर्णों को आज्ञा है (२३ )। बम्बइ प्रान्त के एक मुकदमे मे जिसका निशय रिवाज के अनुखार सन्‌ १८.5६ ई० में हुआ जिसमें पिता की जीवन अवस्धा में पुत्र के मर जाने से सर्व सम्पक्ति उस मृतक पुत्र की विधवाओं ने पाई, परन्तु बड़ी विधवा ने पुत्र गाद ले लिया, इसे न्यायालय ने इचित ठहराया यद्यपि छोटी विधवा की बिना सम्मति यह काये हुआ था ( २४ ) |

( १८ ) भव्य २६; श्रह १२३--१२२ १२४; वध ३०-३२

( ४६६ ) भद्ग० ४८; अह १२३; वध ३३--३४

( २० ) वध ३४ ओर देखो प्रिया अम्मानी ब० कृष्णस्वामी १६ सद- <