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अद्वेतसिद्धि:

श्रीमतपरमहसपरिक्राजकाचार्यश्रोत्रियब्रह्मनिष्ठ-विरक्तशिरोमणि-- पूज्यपादश्रीस्वामिमगलगिरिशिष्य श्रीमतृपरमहसपरित्राजकाचार्य श्रोत्रियब्रह्मनिष्ठ--अनन्तश्रीवि भूषितविद्वद्वरिष्ठ वेदान्त-सिद्धान्तज्योतिषाचार्य पूज्यपाद श्रीस्वामियोगेन्द्रानन्दगिरि विरचित

योगेन्द्रानन्दीदीपिका एवं पक्षतावच्छेदकनिरुक्तिपर्यन्तं योगेद्धानन्दीलघुचद्धदीपिकाभिधान राष्ट्रभाषाव्याख्यानुवादसहिता

सम्वत्‌ २०६३ वि० (सन्‌ 2006 ई०)

प्रकाशक

स्वामी देवनारायण पुरी “देवस्वामी' 'स्वामी योगेन्द्रानन्द गिरि धर्मार्थ ट्रस्ट” (रजि०) श्री मंगल आश्रम, संनन्‍्यासमार्ग, कनखल हरिद्वार-२४९४०८ (त्तरांचल)

(8) सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन

प्रथम संस्करण : १०००

अक्षय तृतीया : संवत्‌ २०६३

शाड्डूराब्द : १२२१८

दिनाडू : ३० अप्रैल २००६

मूल्य : रु, ४७५०.०० पुस्तक प्राप्ति स्थान

श्री मंगल आश्रम, संन्यासमार्ग, कनखल, हरिद्वार -- २४९४०८ (उत्तरांचल) फोन : ०१३३४-२४० ९५२

3 आंकन्हैयश्वग्महादवा विजयततगम

दिशन्तु शं मे गुरुपादपांसव: विश्व दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्य निजान्तर्गत॑ पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोदूभूतं यथा निद्रया। य: साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्त्तये।। वक्तारमासाद्य यमेव नित्या सरस्वती स्वार्थसमन्विताउडसीत। निरस्तदुस्तरककलड्डपड्डा नमामि त॑ शड्डरमर्चिताडप्रिम्‌।।

मत पर ईश की असीम क॒पा ही थी कि जब मै साठ के दशक में अध्ययनार्थ वागणमसी पहया ता वहां मझ अयाचित ही एक दिव्य सन्त का सानिध्य प्राप्त हआ। मेरे जीवन की यह सास यडहा उपलब्ध #।

ये महान सन्त परम श्रद्धय विद्रद्वस्प्ठि स्वामी श्रीयागद्धानन्द गिरि जी महागज़'। उस समय वागणसा में स्वामा जी की कीर्ति चतुर्टिक फेल रही थी। वे उन दिनों गोविन्दमठ में छात्रों का वेदान्त तथा न्याय पढ़ाया करते थे। उनकी अध्यापन शैली, शान्त मुद्रा और स्नेहपूर्ण व्यवहार से दर-दूर के छात्र उनसे अध्ययन करने आया करते थ। वहा स्वामी जी के सम्पर्क मे आया तो मंग मन उनका होकर रह गया। एक अज्ञात अनिर्वाच्य आकर्षण से सदा उनकी ओर आकृष्ट रहा। परम श्रद्यय स्वामी जी विद्यार्थी जीवन के आगस्म्भ से ही अपने बाठलसखा सम अभिभन्नात्मा श्री » प्रज्यपाद सदगुस्दव स्वामी त्रिवणी पुरी जी के साथ ही रहते थ। १९५७ ई० में आप श्री का प्रग्णा से हां श्री ? - प्रज्यपाद सदगस्देव जी ने स्वाध्याय-प्रवचन आग्म्भ किया और १९६१ मे हरैर्द्रिग्स्थ सन्‍्यास आश्रम की स्थापना की। आप श्री के साथ में अपन अभिभन्नात्मा स्वामी महण्वगनन्त प्रगे जा के साथ गाप्मावकाश में वही जाकर रहने लगा आप श्री ने भा निश्चय किया कि तम दाना के अभ्ययनपर्यन्त हा में काशां में रृंगा ५. - ई० मे हम सत्र रुरिद्रार संन्यास आश्रम गये काशी को सदा के लिये प्रणाम करके।

यहा पस्मश्रद्धेय विद्रद्गग्प्ठि स्वामी श्री योगन्द्रानन्द गिरि जी महागज के सातन्रिध्य का पर्याप्त अवमर पुन मिला स्वामा जी के दिव्य व्यक्तित्व का अन्त प्रभाव मेरे मानस पर अनजाने ही प्रभावी होता गया, मेरे जीवन में ऐसे कुछ विरल ही निस्यृह सन्‍त आये, स्वामी जी उनमे मख्य थे। अज्ञात देवीय शक्ति की ही प्रग्णा से प्रेरित होकर अपने सद्गुरुदेव योगीराज स्वामी श्री मगल गिरि जी महागज की पृण्य स्मृति में सन्‍्यास मार्ग पर ही 'मगल आश्रम' का निर्माण कर वे मार्च ४०८२ ई० में यहा गये। परम श्रद्धेय सद्गुरुदेव जी के निर्देश पर मै भी उनकी सवा सुश्रषार्थ मगल आश्रम पे ही गया और आश्रम के भविष्य के साथ सदा के लिए जुड़ गया। अभ्यापन

(दो)

से विरत होकर स्वामी जी ने अद्वैतसिद्धि तथा अन्य कुछ अद्दैत वेदान्त के ग्रन्थों के अनुवाद पूर्ण करने में रचि ली, यद्यपि यह कार्य उन्होंने वाराणसी से ही आग्म्भ कर दिया था। काशा के गोविन्द मठ में रहते हुये विद्यार्थियों को वेदान्त और न्याय का अध्यापन करते हुये ही उनके हित के लिये वेदान्त के ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद और उन पर व्याख्यात्मक टिर्पाणया भी लिखते रहें। हरिद्रार आने के बाद सन्‌ १९७७ ई० में दिद्वद्वरिष्ठ श्री स्वामी मधुसदन सरस्वती जी के 'अद्वैतरत्नरक्षणम्‌” का प्रकाशन हुआ। तब तक स्वामी जी द्वारा अद्रैतसिद्धि का सटिपण हिन्दी अनुवाद कार्य भी चलता रहा। स्वामी जी की इच्छा थी कि 'अद्वैतरतलनरक्षणम्‌” की तरह ही “अद्वैतर्सिद्ध' का भी प्रकाशन हो, लेकिन कई अपरिहार्य कारणों से इसका प्रकाशन संभव हो सका। स्वामी जी के ब्रह्मयलीन हो जाने के पश्चात्‌ भी मेर अन्तस्‌ में यह अभिलापा बराबर बनी रही कि किसी भी तरह स्वामी नी के इस शुभ संकल्प को साकार करूं। अब मित्रों और शुभचिन्तकों के सहयोग से अदैतार्सिद्ध के प्रकाशन की मेरी चिर अभिलाषा पूर्ण हुई। इस अवसर पर पृज्य स्वामी जी में संबंधित मेरी स्पृतिया अन्त परल्ठ पर ल्ठगातार उपर ग्ही है। स्वामी जी के साथ वर्षो का मेग सबन्ध रहा। लोग मुझसे पृछत है - स्वामा जा कितने ब्रढ़ योगी थ, कितने बड़े ज्ञानी थ, कितने विद्वान थे, कितने त्यागी कितन सरल या कितने नि ग्यृह थे? में क्‍या उत्तर दू? मैंने इस बारे में कभी सोचा ही नहीं | एक बार उनके स्वभाव' की अनुभूति हो जाने के बाद मेरे लिये उनकी चरण सेवा के अतिरिक्त और क॒छ जानने-मसमझने की जरूरत ही नहीं रही। स्वामी जी के सान्निध्य में आने के पश्चात्‌ उनकी सेवा के अतिरिक्त मेरे लिये सब कुछ नितानत गौण रह गया। वे कितने बड़े विद्वान, कितने बड़े माधक या तन्चवन्नानी है? यह सोचने-समझने और जानने की मेरे मन में कभी इच्छा ही नहीं थी, आज भी उनका मूल्याकंन करने की तो मेरी इच्छा है और ना ही क्षमता। स्वामी जी के ब्रद्मलीन हो जाने के बाद भी अपने आस-पास मैं सदा उनकी उपस्थिति का अनुभव कर्ता हूँ स्वामी जी द्वारा अनूदित अद्वैतसिद्धि को प्रकाशित करने की मुझमें अठम्य अभिल्ठाषा, उत्सुकता, उत्कण्ठा, व्यग्रता और अकुलाहट लगातार बनी गहीं। अब इसके प्रकाशन के बाद शायद मैं अपने गुरु ऋण, ऋषि-ऋण से कुछ अश तक उक्रण हुआ पुस्तक में यद्यपि अनेक पाठान्तर हैं, जो अन्य किसी भी पुस्तक में उपलब्ध नहीं हैं, तब परम श्रद्धेय ने यह पाठान्तर कहा से लिये? इस विषय मे मात्र वे ही जानते हैं, मुझे तो पुस्तक जिस रूप में मिली, उसी रूप में बिना किसी काट-छॉट ज्यों की त्यों ही प्रकाशित करने का मैंने मकल्प कर लिया सर्वप्रथम मैं विद्रद्गग्प्ठि द्रादशदर्शनाचार्य परमश्रद्धेय आ०म०म० अनन्त श्री विभूषित श्री स्वामी काशिकानन्द गिरि जी का सदा कृतन्न रहूंगा, जिन्होंने अपनी अस्वस्थता के बावजूद मेरे तथा महामण्डलेश्वर स्वामी महेश्वरानन्द पुरी जी के श्रद्धापूर्ण आग्रह पर इस ग्रन्थ की भूमिका

(तीन)

लिखकर ग्रन्थ के महत्त्व को द्विगुणित करके हमे अनुगृहीत किया।

मैं पग्मादर्श' महामण्डलेश्वर स्वामी श्री महेश्वरानन्द पुरी जी, परमादर्श” महामण्डलेश्वर श्री स्वामी गगानन्द पर्वत जी, श्री स्वामी कृष्णानन्द विरक्त जी महाराज, प्रिय स्वामी विशुद्धानन्द गिरि जी, डॉ> गमचन्द्र पुरी, जिन्होंने किचिद्‌ वक्तव्य” मसमुत्साह प्रकाशन” 'शुभाशसा', प्रासड्रिकम्‌' एव पार लब्ध सम्स्वत्या ' द्वाग ग्रन्थ, ग्रन्थकार एवं दीपिकाकार पृज्यपाद श्रद्धेय स्वामी श्री जी के विषय में अपनी अनुभूतियां और मन्तव्यों को अभिव्यक्ति देकर ग्रन्थ के गौरव का बढ़ाया है। उसके लिये मै इन सबका आभानी हं।

इस दर्लभ अमल्य ग्रन्थ के प्रकाशन में अपन आत्मीय जनो से जो सहयाग मिला, वह स्मग्गीय हैं। प्रिय स्वामी विशुद्धानन्द गिरि जी (शी गोकुल धाम, कनखल-हरिद्वार) और उनके सत्यागी प्रिय ब्रद्मचाग ज्ञानानन्द जी तथा प्रिय गोविन्द चैतन्य (गोपी) ने रात-टिन एक कर स्वामी जां की हस्तलिपि में लिखित ग्रन्थ को कम्प्यूटर से टकित कगने और कम्प्यूटराईज्ड सामग्री की वर्ननी सबन्धी अशुद्वियों को दृग्कर पुस्तक को व्यवस्थित रूपाकार देने का सराहनीय कार्य किया है। इसके लिय वे धन्यवाद के पात्र हैं। मै परम श्रद्धेय दिव्यात्मस्वरूप पृज्यपाद के चरण कमलो प्रार्था करता हूँ कि वे इन्हें सदा शुभाशीर्वाद प्रदान करते रहे।

सम्प्रति इस अप्ृल्य ग्रन्थ के प्रकाशन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिनका भी सहयोग मिला है, उनका मै हटय से आभागी हैं।

मै हिन्दू इलेक्टिक प्रेस के स्वामी श्री दर्गशकर भाटी जी एवं उनके सुपृत्र श्री अनिर्द्ध भाटी जा का भी हार्टिक सप्रम शुभाशीर्वाद देता हँ जिनके सतत प्रयासों से यह ग्रन्थ समय पर सुन्दर रूप से प्रकाश मं आया।

|| इति शुभम्‌।।

स्वामिदेवनारायण पुरी देव स्वामी” मड़ल आश्रम, संन्यास रोड, कनखल-हरिद्वार (उत्तराउचल)

(चार)

भूमिका वेदान्त दर्शन की महनीयता

वेदान्तदर्शन का स्थान दर्शनों में मर्वोपरि है। इसमे प्रथम कारण यह है कि यह वेद का ही अंतिम विचार है। आस्तिक सभी वेद पर श्रद्धा रखते ही हैं। अंतिम विचार तो श्रद्धेयता के साथ बुद्धि की चरम सीमा को छने वाला या पार करने वाला होने से श्रद्धाल एव बुद्धि बल वाले दोनों के लिये आदरणीय बना। यही कारण है कि नास्तिकों ने भो जो वद्धि आल सम्पन्त है, वेदान्त मार्ग का सहाग लेने मे संकोच नहीं किया, भले ही वे अपना डफला अलग बजाते रह बौद्धों के चार दर्शन प्रसिद्ध है। सभी उपनिषदों के ही अधर्मण है। मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिल शून्यस्य मेने जगत योगाचारमते तु सन्ति मतयस्तासां विवर्तोहखिल:। अर्थोकस्ति क्षणिकस्त्वसावनुमितो बुद्धबरेतिसौत्रान्तिक. प्रत्यक्ष क्षणभंगुरं सकल वैभाषिको भाषते।। त्रौछ्धों के दर्शन में माध्यत्मिक मिद्धान्त मुख्य है, क्योंकि सभो बोझ्ो को अन्त में शन्य में ही पहुनना है। “सर्व शून्य शून्य” यह सबकी अन्तिम भावना है। पर शून्य शशविषाणादि को कहते हैं। उसका विवर्त या अनुवर्त क्‍या हो सकता है। अत बुद्धकालीन वैटिक हिसा को गकने के लिए तथा वेद के कर्मकाण्ड में अश्रद्धा पैदा करने के लिए वृद्ध ने श॒न्यवाद को प्रोत्साहन दिया। गीता में “न सत्तन्नासदुच्यते”” आया है। बौद्ध उस में थोड़ा ज्यादा जोड़कर “न सन्नासन्नसदसत्‌”” इत्याटि बोल गये। यागाचार वालो ने भी वैसा ही किया। वेदान्त मे जैसे ग्ज्जु में इठ ज्ञान होने पर सर्प कल्पित होता है वैसे ससार को ज्ञान में कल्पित बताया। योगाचाग ने ज्ञान का आकार मात्र विषय है ऐसा कहा। सौत्रान्तिक तथा वेभाषिक क्षणिकवादी है। यह सास्त्य ओर वदान्त की छायामात्र है। ससार प्रतिक्षण परिशामी है ऐसी वेदान्त का मान्यता है। बाद प्रतिक्षण विनाशी मानते हैं। अनुकरण करना अनुकरणीय की महत्ता स्वाकार करना ह#। किस किस का अनुकरण किया वह विवाद यहा नहीं है। कारण बंद तो संत्रस प्राचान यह सर्वमान्य है। वैदिक कर्मों मं हिसा देखकर ही बुद्ध का मन पर्विर्तन हुआ, यह भी प्रसिद्ध हो है। कर्मकाएड के मध्य में भी शिवसकल्य, परुषयक्तादि अनेक स्थानों में वेद़ान्त निरूषित है। कई उपनिषत मन्त्र भाग में ही आयी हुई हे। जेसी ईशावास्य, मुण्डक, श्वेताश्वत्गदि है -: अद्दैत वेदान्त :- यद्यपि अद्वेतवदान्त की सर्वोपरिता सर्वसप्रतिपन्न नहीं है, यहा तक कि वेदान्ती होते हुए भी अद्वैत को स्वीकार नहीं करते। उदाहर्णार्थ प्रस्तृयमान अद्जैतार्सिद्धि स्वय द्रेतवदान्तियों के पर्वपक्ष में प्रादर्भत हैं। वदान्‍्त को ही आधार रखकर विशिष्टाद्रैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्रैत तथा द्रैत का सिद्ध करन का प्रयास अनक मनीषियां किया है, उसी में अपना बुद्धि बल भी उन्होंने समर्पित किया है। परन्तु यट सब किसी अभिनिवेश का ही परिणाम प्रतीत होता है। मैं अपना

(पांच)

ही उदाहरण प्रस्तुत कर सकता ह- ' 'काणादं पाणिनीय सर्वशास्त्रमुखं”” सुनकर व्याकरण और न्याय पढ़ने लगा, तभी वेदान्ती सतीर््यों की मजाक उड़ाता था। रोटी और पत्थर दोनों मिथ्या हैं तो रोटी के बदल पत्थर क्यो नहीं खाते ऐसा तर्क करता था। लगता है ऐसे बचपन से ही ये सब ट्रैतवादी गुजर हो। बहुत सारे नैयायिकादियो में भी यही बात लागू होती है। वास्तविकता यह है कि परम्पग से जिसे जो दर्शन प्रथम प्राप्त होता है, उसी को वह सर्व मूर्धन्य मानता है। श्री वामाचरण भट्टाचार्य कहते थे न्याय ही एक शास्त्र है।अन्य सब न्याय के उपजीवी हैं। यही महान नेयायिक एवं वैशैषिक श्री शंकर मिश्र भी मानते थे। उन्होंने भेदरत्त नाम का एक ग्रन्थ लिखा है। कछ गाली जैसे शब्द जोड़ते हुए वे लिखते हैं- भेदरत्नपरित्राणे तार्किका एव यामिका: अतो वेदान्तिन: स्तेयान्‌ निरस्यत्येष शंकर:।। इसका उत्तर आचार्य मधुसृदन सरस्वती ने उन्ही के शब्दों मे अद्वैतरत्नरक्षण नामक ग्रन्थ मे इस प्रकार दिया- अद्वैतरलरक्षायां तात्तिका एव यामिका:। अतो न्यायविद: स्तेयान्‌ निरस्याम: स्वयुक्तिभि:॥ श्रीणकरमिश्र वेदान्त ग्रन्थ 'खण्डन खण्ड खाद्य पर सुन्दर टीका लिखी है। किन्तु प्राय सर्वत्र प्रथम सरल सुन्दर व्याख्या लिखकर एकाध पंक्ति मूल के खण्डन रूप में भी लिख डालते है, उससे प्रतीत होता है कि उनके मन में कुछ अभिनिवेश सा घुसा हुआ था। न्याय शास्त्र ही ठीक है यह अभिनिवेश होता तो स्तेनादि शब्द का प्रयोग वे करते। शकरमिश्र से भी बढ़कर बाद में एक अतिधुरंधर नैयायिक हुए जिनका नाम श्री रघुनाथ शिरोमणि है। नव्यन्याय के जन्मदाता गड्ढरेशोपाध्याय की तत्त्वचिन्तामणि' पर दीघिति' नाम की व्याख्या श्री रघुनाथ शिरोमाण ने अति सक्षिप्त शब्दों में की। जिसके लिये श्री गदाधर भट्टाचार्य का शब्द है- ''सक्षिप्तोक्तबतिदक्षदीधितिकृत:' उसी 'दीधिति' पर श्री जगदीशतर्कालकार और श्री गदाधर भट्‌टाचार्य की दो व्याख्याए न्याय जगत में अत्यन्त सुप्रसिद्ध है। आचार्य पर्यन्त इन्ही दो विभूतियों की व्याख्या के साथ दीधिति” का अध्ययन पूर्ण होता है। श्री रघुनाथ शिरोमणि का न्याय दर्शन और वेदान्त दर्शन के प्रति कैसा दृष्टिकोण रहा, इसका परिशीलन करने के लिये ही यह प्रसड़ हमने उठाया है। श्री रघुनाथ शिरोमणि 'चिन्तामणि' की 'दीधिति” के अंत में लिखते हैं- विदुषां निवहैरिहैकमत्या यददुष्ट निरटड्धि यच्च दुष्टम्‌। मयि जल्पति कल्पनाधिनाथे रघनाथे मनुतां तदन्यथैव।

(छ:)

विद्वत समूह ने इस न्याय शास्त्र मं एक मति से जिसे जिसे दापयक्त और जिसे निर्दाप बताया, कल्पनाधिनाथ रघुनाथ (शिगेमाण) जल्पकथा में उतरता है ता समत ला वह बिल्कुल विपरीत होगा। अर्थात्‌ टुसरो ने निर्दोष जिसे बताया वह दाषप्र्ण होगा और संठापष जिसे बताया वही निर्दोष निकलेगा। यद्यपि यह एक गर्वोक्ति है, किन्तु शिगेमाण ने उस सार्थक किया और उनके पूर्व में आय पक्षधरमिश्राटि धुरधर नैयायिको का निगकरण कर उसे यथार्थोक्ति परिणत कर द्विया। इस पर चार चाद लगाने वाले जगदीशतकलिकार और गदाधर भव्टचार्य तो नव्यन्याय को दष्पार अगाध सागर ही बना दिया, जिसमे सहयोगी गोलोक बनना झा आदि धृरभर नैयायिक बने। यह ग्घुनाथ शिरोमणि का न्याय शाम्त्र के प्रात दष्टिफोण हुआ ओर अब वदान्त के प्रति दृष्टिकोण कैसा था यह देखे। श्री श्रीहर्ष मिश्र के आनर्वचनोयता मर्वस्व (खाइन खण्ड खाद्य) की व्याख्या करते हुए श्री र्घुनाथ शिगमणि कहत॑ है- धीरा: कुशाग्रमतयो नितरा नितान्त- वेदान्ततन्त्रमिह ये परिशीलयन्ति। तेभ्यो ममेदमुपढौकितमल्पबुद्धे' क्षोभप्रदं यदि तदा मम कोउपराध ।। परमार्थ धी देने वाले धैर्यधाग तीक्षणमात # महप्मसापिया जा भाप निरन्तर गहगट से वदान्त शास्त्र का परीशीलन श्रवण मननादि तछूर्त रहते हैं आपका यह भषामणि्ेप उपहार क्षीभकारी हा सकता है, क्योकि मैं अल्पबुद्धि हू आप महायदिदाया कहै। आपका यह तुच्छ ही लगेगा। आप कहेगे-लोग तो हीग मोता लाकर रखत ह_॒ यह काच का टकड़ा रखकर 'भपार्माण बोलता है तो मेग दोष इसमे क्‍या हें? अल्पबुद्धि के पास जा सा रख दिया। अब आप पूर्वदर्शित घोर गर्वाक्ति ओर वंदान्त के सामने अभृतपूर्व इस नम्नता की तुलना कीजिय। आसमान-जमीन नहीं, आसमान-पाताल का अन्तर दांखगा। वटान्त में आचार्य पदवी बहुतों की है-चित्सुखाचार्य, पद्यादाचार्य इत्यादि। न्याय मे एक ही आचार्य सर्वमान्य है उदयनाचार्य। शकर मिश्रादि भी उनको आचार्य पद से हा कहत हैं। अर्थात्‌ वे सर्वमान्य आचार्य है, वे कहते हैं- ग्राह्मभेदमवधूय घधियो5स्ति वृत्ति- स्तद्वगाधने बलिनि वेदनये जयश्री.।। ज्ञेय वस्तु का (म्व में। भद ठुकगकर बुद्धि ज्ञान) का वत्ति नहीं हाता। मैं घट या मेग ज्ञान ही घट है, ऐसा काई भी अनुभव नहीं करता। में घट का जानता हू इस प्रकार कर्मकारक रूप में ही ज्ञान में घट भासता है। अर्थात्‌ बीच में भट का अनुभव सबको होता हैं। यदि कहों कि वह भेद बाधित है कवल मन्चेन प्रतीयमान है तो यह वदान्त का सिद्धान्त है, क्योंकि असत शणशविपाणादि की प्रतीति नहीं हाती। अत असद से भिन्‍न है। बाधित होने से सत्‌ भी नहीं है। यहीं तो मिथ्यात्व है। ज्ञेय दृश्य को छकर ही वेदान्ती कहते है-जगत मिथ्या दृश्यत्वात्‌। यह

(सात)

फिर वदान्त सिद्धान्त की विजयश्री है। आग उदयनाचार्य कहा- ' “तथागतमतस्य तु कोड्वकाश:”' तथागत मत-बोड़्मत के लिय अवकाश कहा है? यहा 'वेदनये' शब्द से वेदान्त नाम तर्क मात्र कल्पित कोई मत विशप नहीं किन्तु वेद ही है जो सर्व आस्तिक मान्य है यह ध्वनित किया। जय थ्रा शब्द मे था जाहरएर महान आदर प्रगट किया। एसी स्थिति मे उदयनाचार्य के आत्मतन्वविवेकादि ग्रन्था पर गका छिखन वाल श्रद्ठाल तात्कालिक शकर मिश्र वदान्तिया का भदग्त्न चार कह ता उनकी मस्तिप्क को तिकति मात्र बह समझा जायगा।

मामासादर्शन मे भा दा धुर्धर विद्वान जो हुए श्री कमार्लि भट॒ट और प्रभाकर मिश्र भा वदानत के प्रति निष्ठावान थे। भटटपाद कहते है-

इत्याह नास्तिक्यनिराकहिष्णु- रात्मास्तिता भाष्यकृदत्र युक्तद्या। दृढत्वमेतद्विषयस्तु बोध- प्रयाति वेदान्तनिषेवणेन।।

महपि ज॑मिनि ने आत्मा (पस्मात्मा) के बार में कोई विचार नहीं किया। इससे अध्यताआ का यह थभ्रान्ति 7'गां कि मामासा मत मे परस्मात्मा नहीं है। धर्म ही फलदाता है। इस प्रकार नास्तिकता ने हो इसके त्या भाष्यकार शबर्ग्वामी ने बीच में आत्मा की सामान्य चर्चा को; परमात्मविषयक वास्तविक याघ दद्ता या तभी प्राप्त होगा जब वेदान्त का निषवण (नितग ओर नितानत। सवन हा।

था प्रभाकर मिथ ने था पयूहतां में बताया-

अहकारममकारावनात्मन्यात्माभिमानौ , मृदितकषायाणामेवेतत्‌ कथनीयम्‌ ||

शगगदि अहकार पर्यन्त सबम अह प्रत्यय ओर मम प्रत्यय हाता है। यर अनामा मं आत्माभिमान है! उस अभिमान का प्रतियागी आत्मा कोन हे? यह मृटितक्पराय अधिकागी का हीं बताना चाहिए। अत शबर्स्वामां ने उस पर कछ्ू नहीं कहा। इस भाष्य व्याख्या बहती में अर प्रत्यय विषय को अनात्मा बताया तो उससे इन सबसे भिन्न अर्थात्‌ परिच्छन्न सर्ववस्तुभिन्न हो आत्मा कवल प्रत्यय मात्र स्वरूप अभिप्रत सिद्ध होता है। उसका ज्ञान कैसे होगा ? किससे होगा? इस पर शबरस्वामी ने स्वय कहा- 'स एप नेति नत्यात्मेति होवाच' मूर्तार्मतीभयनिषधार्थ श्रुति मे जैति नेति यह द्विरुक्ति है। वह तनव सर्वनिषेधावधिरूप ब्रह्म ही है यह ध्वनितार्थ है। इसका स्पष्टीकरण ''न्यायरत्नावली'' में इन शब्दों में किया-

“आत्मा निष्प्रपज्च ब्रह्मैव

यहीं पाठ सभवत न्यायरत्नावलीकार को उपलब्ध है। मदितकषाया को ही क्‍यों कहना

चाहिए 2 इसका स्पष्टीकरण प्रभाकर ने इस प्रकार किया है- “'कमप्सड्रिने तथा वाच्यम।” आह भगवान्‌ द्वैपायन: 'न बुद्धिभेद॑ जनयेदज्ञाना कर्मसडब्विनाम्‌”

इति रहस्थाधिकारें। “तस्मान्न विवृतमहकारममकारयोरनात्मविषयत्व भगवता भाष्यकारण

(शबरस्वामिना) द्रैपायनवचनानरोधान्नाज्ञानादिति।'” “कर्मव्याख्यास्थल में अद्वैतात्माविचार कर्न

(आठ)

पर कर्मपरायण लोगों का बुद्धिभेद होगा। अत: ऐसा करो यह द्रैपायन की ही आज्ञा या अनुरोध है। मीमांसक लोग आत्मा को पहचानने के कारण परमात्मनिरूपण नहीं किया या खण्डन किया ऐसी बात नहीं है।'” इन सब बातों का पर्यालोडन करने से निश्चित होता है कि मीमांसक भी अद्वैतवाद में ही निष्ठा रखते रहे। सांख्यदर्शन एवं योगदर्शन वेदान्त के समीपतर ही हैं। सांख्यकारिका में बताया है- एवं तत्त्वाभ्यासान्नास्मि मे नाहमित्यपरिशेषम्‌। अविपर्ययाद्विशुद्ध केवलमुत्पद्यते ज्ञानम्‌।। नास्मि अर्थात्‌ शरीरादि तादात्म्य से ब्राह्मणोउस्मि गौगेषम्मि इभ्योठमस्मि इत्यादि नहीं। और में मम शरीरं धन पुत्रादय इत्यादि नहीं। नाह। अहकाग्परिच्छिन्नाहभावना भी करे। यही ता वेदान्त में भी बताया। नाना जीवभेदादि कुछ अंश मात्र छोड़ें तो साख्य के साथ वदान्त का कोई विरोध नहीं होगा। अनिर्वचनीयता भी योगदर्शन में ध्वनित है। ““कृतार्थ प्रति नष्टमप्यनष्ट तदन्‍्यसाधारणत्वात्‌ ”! नष्ट भी अनष्ट कैसा? देवदत्त पड़ोसी के लिये मरा, बेटों के लिये जिन्दा ऐसा होता है क्या? प्रकृतिरूपी माया अनिर्वचनीय है यही तात्पर्य है। अस्तु। दर्शनीयतम दर्शन तो वेदान्त दर्शन है, जहां सभी बातें स्पष्ट हैं। अत: वेदान्त दर्शन दर्शनीयतम है सर्वोपरि है यह निश्चित होता है। -: अट्वैतसिद्धि:- वेदान्त दर्शन में सूत्र भाष्यादि अनुपम ग्रन्थ तो है ही। इनसे अतिरिक्त प्रक्रिया ग्रन्थ एव प्रकरण ग्रन्थादि के रूप में मुद्रित अमुद्रित हजारों ग्रन्थ भी विद्यमान हैं। जिनके रचयिता बड़-बड़े विद्वान हुए। उन्हीं में प्रस्तूयमान अद्वैतसिद्धि अन्यतम है। कुछ भावुक सन्त एवं पण्डितों में यह प्रचलित है कि उपनिषत्‌ गीता एव ब्रह्म सूत्र ये लघुप्रस्थानत्रय है और चित्मुखी खण्डन एव अद्वैतसिद्धि बृहत्प्रस्थानत्रय हैं। यह तो सनन्‍्तों की भावुकता ही है। भावुकता में आकर जो भी कहते हैं वह अधिक विमर्शनीय नहीं होता है।फिर भी तत्त्वान्वेषियों की जिज्ञासा प्रशमनार्थ कुछ कहना भी पड़ता है। विद्या स्थान को ही प्रस्थान कहते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति में विद्यास्थान बताया। पुराणन्यायमीमा धर्मशास्त्राड्मिश्रिता : वेदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च॒तुर्दश।। इन्ही को लेकर वररुचि (पुष्पदन्ताचार्य) ने महिम्मस्तोत्र में “'त्रयी सांख्यं योग: पशुपतिमतं वैष्णवमिति प्रभिन्ने प्रस्थाने '' इस प्रकार प्रस्थान शब्द से कहा। श्री मधुसूदन सरस्वती ने इस श्लाक की व्याख्या में अन्य सभी शास्त्रों का उपलक्षण मानकर सबको प्रस्थानान्तर्गत बताया। अनुक्त विलक्षण अर्थों को लेकर प्रस्थान भेद हैं। अतएव वैशैषिक को न्याय में अंतर्गत किया। वेदान्त को मीमासा में इत्यादि सरस्वती जी ने बताया। इसी के सदृश आधार पर वेदान्त में भामती प्रस्थान और विवरण प्रम्थान

(नौ)

टो बताये, क्योंकि दोनों में परस्पर विलक्षण प्रक्रिया बरतायी गयी है। जिनका परस्पर में समावेश नहीं होता। गीता महाभारतान्तर्गत होने से धर्मशास्त्र रूप प्रस्थान है। उपनिषत वदान्तान्तर्गत है। ब्रह्ममत्र मीमासान्तर्गत है। फिर भी तन्त्वज्ञानरूप परमधर्मप्रतिपादकत्वेन विशिष्ट प्रस्थानरूपेण कहे जाते हैं। चित्मुखी, खण्डन तथा अद्वैतसिद्धि को तीन प्रस्थान के रूप में कहीं उल्लेख भी नहीं है और ऐसे व्यवहार की कोई शिष्ट परम्परा है और अत्यन्त विलक्षण भिन्न सिद्धान्त प्रतिपादकता भी नहीं है। इनमें लघृत्व और बृहत्व की विवेचना भी कठिन है। कलेवर छोटा बड़ा होने से लघु बृहत कहें तो लघुतम ब्रह्ममृत्र, लघुतर गीता, लघु उपनिषत इत्यादि भी कहना पड़ेगा और बृहत चित्मुखी, बृहतर खण्डन, बृहत्तम अद्वैतसिद्धि ऐसा भी प्रस्थान भेद होने लगेगा। भाष्यादि सहित कहे तो ब्रह्मसूत्रभाष्य अद्वैतसिद्धि से लघु नहीं है। विषयगाम्भीर्य को लेकर कहते है तो विपरीत ही सिद्ध होगा। अतः अपनी अपनी भावना के अनुसार लघु बृहत्‌ कहने लगे यही मानना समीचीन लगता है।

सत लोगों की एक और भी उप्यक्षा प्रचलित है। अद्वैतमिद्धि वाद ग्रन्थ है। चित्मुखी जल्पग्रन्थ है। खण्डन वितण्डा ग्रन्थ है। यह भी पूर्ववत्‌ भावनामात्राश्रित है। वाद का संक्षिप्त लक्षण है-- “तत्त्वबुभुत्सो: कथा वाद-””। तच्च जिज्ञामुओं की कथा वाद है। अद्वैतमसिद्धि में श्रीमान व्यासगज ओर श्री मधुसूदन सम्स्वती का शाख्त्रार्थ उपनिवद्ध है। अपने- अपने सिद्धान्त पर दोनो अटल होने मे तन्वबुभुत्सा दोनो में नही रहीं। व्यास राज का लक्ष्य अद्रैवमत खण्डन मात्र सा दीखता है। सरस्वतीजी का लक्ष्य पर्मत खण्डन और स्वमत मण्डन मात्र है। जल्प का लक्षण क॒छ घटना है। '“विजिगीषुकथा जल्प:”” ऐसा जल्प का संक्षिप्त लक्षण है। दोनों ही विजिगीषु यहा इस प्रकार लक्षित होते हैं। न्याय सूत्रानुसार विस्तृत लक्षण हैं-

“'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ: सिद्धान्ताउविरुद्ध: पञ्चावयोपपन्न: पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वाद:”'। '“यथोक्तोपपन्न: छलजातिनिग्रस्थानोपालम्भो जल्प:।” “' प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा।” एतदनुसार तत्त्वबुभुत्मा वादलक्षण में प्रविष्ट नहीं है, एसा कहो तो जल्प लक्षण चित्सुखी में नहीं होगा। क्योंकि वहां छल-जाति आदिरूप दुष्ट प्रयोग नहीं है। खण्डनखण्डखाद्य वितण्डा ग्रन्थ है यह भी गलत है। स्वपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा यह लक्षण खण्डन में नहीं है। खण्डन की यह पंक्ति है-

“तदेव॑ भेदप्रपञ्योडनिर्वचनीय: ब्रहव तु परमार्थसदद्वितीयमिति स्थितम्‌”'

““वस्तुवस्तु वर सर्व प्रपठ्चनसत्त्वासस्वत्त्वव्यवस्थापननिविवृत्ता: सिद्ध

चिदात्मनि ब्रह्मतत्त्वे केवले भरमवलम्ब्य चरितार्था: सुखमास्महे ''॥।

यह पूर्वपंक्ति भी द्र॒ष्टव्य है। इसके बाद प्रमाणोपन्यास भी बड़े सुन्दर ढग से किया “'श्रुतिरेवाद्वैते प्रमाणम्‌। श्रूयते खलु एकमेवाद्वितीयं नेह नानास्ति किचनेत्यादि।'

सन्त लोग सीधे सादे होते हैं। शुरूआत से अन्त तक खण्डन, खण्डन, सो भी अति जटिल देखकर बोलने लगे यह वितण्डा ग्रन्थ है। चित्सुखी में भी जगह-जगह महाविद्यानुमानादि देखकर जिनका अर्थ लगाकर थक जाने से कहने लगे कि यह सब दूसरों को चुप करने के लिये, जीतने के लिये लिखा है, इससे कया तत्त्वज्ञान होगा? अत: यह विजिगीषु कथा जल्प है। किन्तु

(दस)

अद्वैतसिद्धि में ऐसा कर्कशतर्कात्मना परखण्डन है और महाविद्यानुमानादि मुखबंदी उत्तर है। यहां तो वक्तव्य विषयों का सुन्दर सरल ढंग से वर्णन है। अत: यह वाट ग्रंथ है। इस प्रकार ऊपर लक्षणों को लगाकर संतों ने वाद-जल्प वितण्डा भेद किया, ऐसा लगता है।

जैसा भी हो। अद्वैतसिद्धि वेदान्त का एक महान ग्रन्थ है इसमें दो राय नहीं है। परिमार्जित भाषा में विषयनिरूपण करना अद्वैतसिद्धि की खास विशेषता है। स्वमिद्धान्त का प्रतिपादन अत्यन्त स्पष्ट एवं सुलझी हुई अनुद्रेगकारी भाषा में प्रस्तुत करने मे श्री सग्म्वतवीजी की कुशलता स्पष्ट झलकती है। 'अनुद्रैगकरं वाक्य सत्यं प्रियहित यत्‌ स्वाध्यायाभ्यसन चैव वाइमय तप उच्यते ''। ये सारी बातें अद्वैतसिद्धि में साफ निहार सकते हैं। स्वाध्यायभ्यसनं का वेदाभ्यास अर्थ प्रसिद्ध है। वह भी “विश्वं सत्यं मधवन्‌”' इत्यादि मन्त्र व्याख्या में अध्येता देख सकते हैं। अतण्व अद्वेतसिद्धि आचार्य का वाइमय तप कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

यद्यपि यह ग्रन्थ द्वेतसंप्रदायी माध्वाचार्य के अनुयायी व्यामतीर्थविरचित न्‍्यायामृत का खण्डनात्मक निबन्ध है, तथापि प्रथम पढ़ते समय कहीं भी ऐसी झलक नहीं मिलती जिससे कि यह लगे कि यह किसी ग्रन्थ विशेष का खण्डन किया जा रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि अद्वैतसिद्धि की व्याख्या गौड़ ब्रह्मानन्दी (लघुचन्द्रिका) में भी यह आभास नहीं मिलता कि मूल तथा टीका खण्डनात्मक ग्रन्थ है। स्वीय सिद्धान्त प्रतिपादन में स्वत: उपस्थित होने वाले या स्वय उठाये हुए पूर्वपक्ष का ही निराकरण करते हुए विषय प्रतिपादन किया जा रहा है, ऐसा सबको लगता है। हा गौड़ ब्रह्मानन्दी में कहीं-कहीं माध्व निर्देश किया है। किन्तु विप्रतिपत्ति प्रथम मूल में दिखान से शास्त्रार्थ मे स्वत: उपस्थित होने योग्य नैयायिक बौद्ध माध्व गमानुजादि का वह उल्लेख है ऐसी ही प्रतीति होती है। माध्वादि एसा आदि पद जोड़कर लघुचन्द्रिकाकार ने बड़ी कशलता से ऐसी छाप अध्येताओं में डाली है। मतलब न्यायामृत पढ़ते समय जैसे लगता है कि द्रेषपूर्वक या अभिनिवेशपूर्वक शांकर अद्वैत मत खण्डन किया जा रहा है, ऐसा अद्रैतमिद्धि या लघुचन्द्रिका पढ़ते समय नहीं लगता है।

विद्वत्‌ शिरोमणि श्री अनन्त कृष्ण शास्त्री विरचित चतुर्ग्रन्थीमार देखने पर इतना जरूर लगता है कि द्वैतवादियों का इस प्रकार यहां पूर्वपक्ष ग्रन्थ है और इस प्रकार उसका समाधान किया गया है। ऐसा नहीं लगता कि यह अनुपूर्व न्यायामृत खण्डन है। यद्यपि अद्वैत सिद्धि में कई जगह कई पुष्ठों में उल्लिखित न्यायामृत पूर्वपक्षों को खण्डन किये बिना ही छोड़ दिया है किन्तु पूर्व खण्डन से गतार्थ होने से और कई जगह ग्रन्थ विस्तार मात्र होने से वहां अक्षरश: खण्डन नहीं किया। इतनी बात अवश्य है कि सजा-सजाया क्रमबद्ध पूर्वपक्ष श्री सरस्वतीजी को मिल गया स्वबुद्धिवैभव से उसका निराकरण मात्र उनको करना था। नूतन ग्रन्थकार को जो पूर्वपश्च एवं उत्तरपक्ष दोनों को समजाकर लिखने की मेहनत होती है, वह उनको नहीं करनी पड़ी। परन्तु न्यायामृतकार ने भी सजे सजाये दूषणों का ( या दृषणाभासों का) ही संग्रह मात्र किया। यह बात स्वयं उन्होंने प्रत्येक परिच्छेट के अंत में लिखा-' 'व्यासयतिना संगृहीते न्‍्यायामृते'”। इसका मतलब हुआ कि उन को अद्वैत निशगाकरण के लिये अपनी बुद्धि लगानी नहीं पड़ी। नाना स्थानों

(यारह)

में बिखरी पड़ी सामग्री का संग्रह मात्र करना पड़ा। श्री सरस्वती जी ने गुरुकृपा से, स्वीय विविधविद्या परिचय से एवं मनन से परिनिष्पन्न तत्त्व को अद्वैतसिद्धि में प्रस्तुत किया, यह बात '“निखिलमतियल्नेन निहित॑”” इस अद्वैतसिद्धगत वाक्य में स्पष्ट है। -: शास्त्रार्थ पद्धति से ग्रन्थोपक्रम :- तत्राद्रैतसिद्धिद्वतमिथ्यात्वसिद्धिपूर्वकत्वात्‌ इत्यादि स्वकृत उपक्रमानुसार आचार्य ने शास्त्रार्थ पद्धति से प्रथम द्रैतमिथ्यात्व को सिद्ध किया। प्रथम परिच्छेद लगभग पूरा ही द्वैतमिथ्यात्वानुमान का साड़ोपाड़ निरूपण है। एकजीववाद एवं अज्ञानवादादि कुछ ही अंश अतिरिक्त है। शास्त्रार्थ में प्रथम विप्रतिपत्ति मध्यस्थ के द्वारा उपस्थित की जाती है। “ब्रह्मप्रमातिरिक्ताबाध्यत्वे सति सत्त्वेन प्रतीत्यर्ह चिद्भिन्न प्रतिपन्नोपाधौ त्रैलाकिकनिषेधप्रतियोगि वा” इस प्रकार वहीं विप्रतिपत्ति आचार्य ने प्रस्तुत की। यह व्यावहारिक संसार मिथ्या है या नहीं”” यही विप्रतिपनि का अर्थ है। विप्रतिपत्ति क्यो रखनी चाहिए? इसलिए कि किसी विषयान्तर को लेकर एक दूसरे को पराजित करे जिससे मुख्य विषय किनारे रह जाये। पर ऐसे शास्त्रार्थ में वेदान्तियों को उतरना ही क्यो चाहिए? यह प्रश्न होगा। उत्तर यही है अपने आप में क्‍या न्‍्यूनता है यह मालम पड़ेगा। सार्वकालिक दृढ़ सस्कार उत्पन्न करने का मौका मिलेगा। व्युत्पत्ति वृद्धि होगी। अतः शास्त्रार्थ की उपयोगिता है और विप्रतिपत्ति प्रदर्शन भी सार्थक है।

व्यावहारिक जगत्‌ मिथ्या दृश्यत्वाद्‌ जड़त्वात परिन्छ्िन्नत्वातू, शुक्तिरूप्पवत्‌ इस प्रयोग में ''हेतूदाहरणाधिकमधिकम्‌”” इस न्याय सूत्रोक्त अधिकनामक निग्रहस्थान क्‍यों नहीं, तीन-चार हेतु बोलना व्यर्थ है। नहीं। ये अनुमान ही तीन हैं। जिनमें जो उपस्थित है सो बोलें। ग्रन्थकार ने तीनों एक साथ में लिख दिये।

:- मिथ्यात्व के पांच लक्षण :-

(१) मिथ्यात्व के पांच लक्षण इसके बाद बताये। “' तत्र मिथ्याशब्दोडनिर्ववचनीयतावचन :”! इस पंचपादिका के अनुसार सदसद्धबमनिर्वचनीयत्वं या सदसद्धिन्नत्व यह प्रथम लक्षण है। व्रिकालाबाध्यत्वरूपी सत्व जगत मे नहीं है और शशविषाण के समान जगत असत्‌ भी नहीं है। असद्विन्नत्व क्यों कहना चाहिए, वह सर्वस्वीकृत है। माना। मद्धिन्नत्व लक्षण तो वहा जायेगा। अतिव्याप्ति तो होगी ही। असत्‌ कछ है ही नहीं। उसमे कोई धर्म नहीं तो अतिव्याप्ति दोष केसे उसमें रहेगा? उसमें धर्म नहीं, यह अधिकरणत्व आप कैसे कहते हैं जब धर्म नहीं है। शब्दज्ञानानुपाती मानेंगे तो वैसे ही अतिव्याप्ति भी समझ लो। कहीं शशविषाण को मिथ्या समझें इसके लिए भी असद्धिन्नत्व भी जोड़ा जाता है। जो शशविषाण को कुछ समझते ही नहीं है उनके लिये पञ्चमलक्षण सद्धिन्नत्वमात्र है ही।

(२) प्रतिपन्नोपाधौ त्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्व यह दूसरा लक्षण है। जगत के ज्ञाताश्रय ब्रह्म में जगत का अभाव है। जैसे मिथ्या रजताश्रय शुक्ति में रजत का अभाव है। ब्रह्म रूप होने से अभाव अद।त्त्विक है। अतात्तिक कहो तो भी व्यावहारिक है। किन्तु अतात्तिक हो तो उसका भी निषेध होगा तो प्रतियोगी जगत खड़ा होगा। जैसे घटाभाव का निषेध करो तो घट खड़ा होता

(बारह)

है। नहीं। टृश्यत्वेग जगत और जगदभाव दोनों का निषेध होने से जगत खड़ा नहीं हो सकता। जैसे घट के प्राककालीन अभाव और घट दोनों का निषेध घट ध्वसमकाल में होता है, फिर घट उत्थित भी नहीं होता।

(३) ज्ञाननिवर्त्यत्वं मिथ्यात्व॑ यह तीसरा लक्षण है। वार्निक में बताया है- “तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थसम्यग्धीजन्ममात्रत :। अविद्या सह कार्येण नासीदस्ति भविष्यति '' यह रज्जु है समझ लिया करो द्रष्टा स्वयं कहेगा-न यहां सर्प था, है और हाोगा। वैसे ही ब्रह्मदर्शन होने पर अनुभव में आयेगा कि यहां जगत था, है और होगा। और वहीं यथार्थता है।

(४) स्वाश्रयनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्व मिथ्यात्वं यह चतुर्थ लक्षण है। यह लगभग द्वितीय लक्षण के समान ही है। स्वात्यन्ताभाववति सच्चेन प्रतीयमानत्वं ऐसा लक्षण का स्वरूप असत्‌ में अतिव्याप्तिवारणार्थ सरस्वतीजी ने किया ही परन्तु असत का अधिकरण ही अप्रसिद्ध होने से ही लक्षण असत्‌ में नहीं आयेगा। शेष द्वितीय लक्षण के समान ही हैं।

(५) पञ्चम लक्षण सद्धिन्नत्व है। प्रमाणसिद्धभिन्नत्व उसका अर्थ बताया और असत में अतिव्याप्तिवारणार्थ पूर्ववत्‌ सच्चेन प्रतीयमानत्व जोड़ना होगा।

आद्यं स्यात्‌ पञ्चापाद॒ुक्त ततो विवरणोदिते। चित्सुखीय॑ चतुर्थ स्या-दन्त्यमानन्दबोधजम्‌ |। -: मिथ्यात्व मिथ्या है कि नहीं +-

यह मिथ्यात्व मिथ्या है या सत्य? मिथ्यात्व मिथ्या है तो प्रपञ्च में मिथ्यात्व वस्तुत: नहीं अत: सत्य होगा। मिथ्यात्व यदि सत्य है ता वैसे प्रपठ्च भी सत्य होगा। इस प्रकार द्वैतवादियों ने पूर्वपक्षी उठाया है। परन्तु मिथ्यात्व वाले जगत को व्यावहारिक सत्य मानने वाले अद्रैतवादी के मत में मिथ्यात्ववाला मिथ्यात्व भी व्यावहारिक सत्य होगा, इसमें पारमार्थिक सत्य कैसे सिद्ध होगा? दृश्यत्वेन रूपेण जगत्‌ तथा मिथ्यात्व दोनों का निषेध होने से सत्यत्व उभरगा नहीं।

-: हेतुओं पर विचार-प्रथम हेतु-दृश्यत्व +-

यहां तक साध्य मिथ्यात्व निरूपण के बाद दृश्यत्वादि हेतु पर विचार किया। वृत्तिव्याप्यत्व, फलव्याप्यत्व, चिद्रिषयत्व, संविदन्तरापेक्षित्व, अस्वप्रकाशत्व जैसे छह विकल्प दृश्यत्व के बारे में उठाकर फलव्याप्यत्वातिरिक्त सबको मूलकार ने मिथ्यात्व साधक माना। दृग्दृश्यमम्बन्धभड् प्रकल्प में दृश्य होने से मिथ्या कैसे यह स्पष्ट होगा। ब्रह्म दृश्य नहीं स्वय प्रकाश है।

-: जड़त्वादि अन्य हेतुओं पर विचार :-

जड़त्व का अन्ञानत्व और अनात्मत्व दो व्याख्या स्वीकृत हुई। अस्वप्रकाशत्व भी मान लिया गया है। परिच्छिन्नत्व देशत: कालत: और वस्तुत: ऐसे तीन प्रकार से हैं। टेशत: परिच्छेद अत्यन्ताभावप्रतियोगित्व है। कहीं है कहीं नहीं। जैसे घटादि। कालत: परिच्छेद ध्वंसादि प्रतियोगित्व है। कभी है कभी नहीं है। वस्तुत: परिच्छेद अन्योन्याभाव प्रतियोगित्व है अर्थात्‌ परस्पर भिन्नत्व | अनन्त में परिच्छिन्न का होना होना बराबर है। अत: स्वसमानाधिकरणाभावप्रतियोगी है। अंशित्व का अर्थ सावयवत्व है। परमाणु भी सावयव है। उसके भी पूर्वपश्चिमादि दिग्विभाग है।

(तरह)

इस प्रकार अनन्तावयव होने पर मेरू सर्षपप समानतापत्ति होगी यह दोष दिया परन्तु इसका परिहार प्रतिवादी को ही करना है। जो भी अवयव होगा उसका पूर्वपश्चिमादि विभाग मानना पड़ेगा। अन्यथा एक परमाणु में टूसरे परमाणु घुसेंगे तो कभी महत्व नहीं आयेगा। घुसने के लिये एकदेश संयोग मानना पड़ेगा तो अंशित्व होगा। अय॑ पट: एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगी अंशित्वात्‌ इतरांशिवत्‌ ऐसा अनुमान चित्सुखाचार्य ने किया। -: उपाधिनिरास :- स्वाधिकसत्ताकदोषप्रयुक्त भानत्व कह कर उपाधि

बाद मे इन दृश्यत्वादि हतुओं में सोपाधिकत्व का निरास आचार्य ने किया। बाध्य रजतादि की अपेक्षा अधिकसत्ताक दोषप्रयुक्तभानत्वं रजत में है। चाकचिक्य व्यावहारिक है परन्तु जगत से अधिक मत्ताक तो केवल ब्रह्म है वह दोष नहीं है। अत: साधनाव्यापक है। माया दोष है। किन्तु उससे बाध्य जगत का भान नहीं है। उससे अधिकसत्ताक की जगह स्ववाधका<्बाध्य' मूल में उल्लिखित है। (हमने सरलता के लिये अधिक सत्ता लिखा) सत्ता ब्रह्म में है पर वह दोष नहीं। दोष माया है। उसमें अधिक सत्ता नहीं है। अत: साध्यव्यापक तथा साधनाव्यापक हुआ। परन्तु देहाध्यास में स्वाधिकसत्ताकदोषप्रयुक्तभानता नहीं है। “ब्राह्णो यजेत” इत्यादि वचन से देहात्मध्यास व्यावहारिक है, किन्तु मिथ्या भी है। उससे अधिक सत्ता दोष में होने से साध्यव्यापक नहीं है।

-: आभास साम्य निराकरण +-

अनुमान में एक आभास साम्य भी दोष होता है। ब्रह्म प्रातिभासिक दृश्यत्वात्‌ शुक्तिरूप्यवत्‌

ऐसा क्यो कहा जाये? हेतु असिद्ध है। “यत्तदद्रेश्य! इस श्रुति में बताया वह दृश्य नहीं है। --: साध्यदोषनिराकरण :--

इस प्रकार हतु का उपपादन करने के बाद साध्य की ओर मुड़ते हैं। बाधदोष साध्य को लेकर होता है। प्रत्यक्षत: बाध, साक्षबाध, अनुमानत: बाध, आगम बाध ऐसे नाना प्रकार से बाध होता है। प्रथम में जगत में सत्ता (अस्तित्व) प्रत्यक्ष है। अत: मिथ्यात्व असिद्ध होने से हेतु बाधित है पर शुक्ति रजत में भी अस्तित्व दीखता है। यह रजत है ऐसा बोलते हैं। तो वहां भी मिथ्यात्व बाधित है बोलो। यह घट है ऐसा ज्ञान प्रमा है। वह रजत है यह ज्ञान भ्रम है। प्रमाविषयत्वं सत्यत्व॑ एसा लक्षण सत्ता का करेंगे। पर प्रमा तो आंखों से नहीं दिखती है तो प्रत्यक्ष बाध कैसे कहोगे। सफल प्रवृत्ति अनुमान करो तो अनुमानबाध हुआ प्रत्यक्ष बाध कहां हुआ। जैसा सत्यत्व अहम में वही सत्यत्वं जगत में है कहो तो ब्रह्म की सत्यता ही जगत में है। जगत की स्वतंत्र सत्यता नहीं है यही अर्थ निकलेगा। स्वतन्त्र सत्यता नहीं माने मिथ्या है। त्रैकालिकनिषेधा5प्रतियोगित्व कहो तो तीन काल, अनन्त काल प्रत्यक्ष कहां है। सामान्य लक्षणा को नैयायिकों ने ही अमान्य कर दिया है। अत: प्रत्यक्ष बाध कहना संभव नहीं है। साक्षी बाध भी नहीं होगा। साक्षी अविद्यमान को प्रकाशित नहीं करता।

सन्‌ घट: यहां सत्‌ ब्रह्म अधिष्ठानरूप से भासता है। सत्‌ अभाव: इत्यादि भी उसी प्रकार

(चौदह)

है। सत्ता जाति अर्थ नहीं। सद्‌ रजत यहां अधिष्ठानानुवेध मात्र है। उससे सत्य (सत्यत्व) सिद्धि नहीं होगी। -: प्रत्यक्षस्थानुमानबाध्यता :-

जगत मिथ्या इस अनुमान से प्रबल जगत सत्य है। यह प्रत्यक्ष ही है। अतएव आगम से भी प्रत्यक्ष प्रबल है क्योंकि प्रत्यक्ष ही प्रथम प्रमाण है। उसके पीछे अनुमानादि है। प्रत्यक्ष से जगत की सत्यता सिद्ध है। इस पूर्वपक्ष का उत्तर है कि चन्द्र सूर्यादि थाली बराबर है,ऐसा प्रत्यक्ष है। वह अनुमान और आगम को जो विशालतम सिद्ध करने वाले हैं, बाधित करेगा जो किसी भी बुद्धिमान के लिये मान्य नहीं है। तत्तव्त्यक्षों में प्रामाण्य निश्चित हो तभी प्रत्यक्ष प्रबल होता है, आगमविरोध होने या प्रत्यक्ष में प्रामाण्य निश्चित नहीं होता।

-:: प्रत्यक्षस्यागमबाध्यता :-

प्रश्न यह है कि प्रत्यक्ष उपजीव्य होने से प्रबल है। प्रत्यक्ष के पीछे अनुमानादि का जीवन है, अस्तित्व है। धूम को और पर्वत को देखा जाये तभी तो अनुमान हुआ। शब्द सुना तभी बोध हुआ। बात सत्य है। किन्तु एतदर्थ व्यावहारिक सत्यता ही अपेक्षित है पारमार्थिक प्रत्यक्ष की जरूरत नहीं है। घट को पहले कहीं देखा तब भूतल में घटाभाव ज्ञान हुआ तो वह घट को बाधेगा नहीं क्‍या? सूर्य प्रादेशिकत्व दर्शन का लक्षयोजन विस्तारिवचन से बाध नहीं होता है क्या? औदठम्बरी सर्वा वैष्टयितव्या यह सर्ववेष्टन प्रत्यक्षबचन औदम्बरीं स्पृष्टवा उद्गायेत्‌ इस स्पर्शश्रुत्यनुमेय अवेष्टन से बाधित होता है कि नहीं? होता है।

-: प्रत्यक्ष आगमबाध्य हो तो कहीं भी श्रुति में लक्षणा नहीं होगी:--

शंका होगी कि प्रत्यक्ष यदि आगम बाध्य हो तो यजमन: प्रस्तर इत्यादि वाक्य में लक्षणा (अर्थवादता) क्‍यों मानते हैं। मान लो--यजमान प्रस्तर (दर्भमुष्टिविशेष) है। तत्त्वमसि में लक्षणा क्यों मानते हो? उत्तर है परीक्षित प्रमाण्य स्थल में प्रत्यक्ष प्रबल होगा। तात्पर्य परीक्षण होने से शब्द प्रबल होगा। वाक्यशेष प्रमाणान्तरसंवाद अर्थक्रिया आदि से प्रत्यक्ष परीक्षण होता है। तात्पर्यलिड्रादि से आगम परीक्षित होता है।

-: अपच्छेद न्याय :-

अपच्छेद न्याय से भी आगम प्रबल होता है। “पौर्वायर्ये पूर्वदौर्बल्यं प्रकृतिवत्‌”' उद्गात्रपच्छेद बाद में हो और प्रतिहर्तरपच्छेद पहले हो तो प्रतिहर््रपच्छेटनिमित्तक सर्वस्व दक्षिणावाला योग बाधि होगा। उद््‌गात्रपच्छेदनिमित्तक अदक्षिण याग होगा। अध्वर्यु (यजुर्वेदी) आगे आगे, उसके पीछे प्रस्तोता, उसके पीछे प्रतिहर्ता (ये दोनों उद्गाता के सहायक हैं) उसके पीछे उदगाता (सामवेदी) फिर ब्रह्मा, सबसेपीछे यजमान ऐसे बहिष्पमान स्तोत्र के लिये गमन होता है। लंबी धोती पहन कर विशेष भाग कंधे से पीछे की ओर डालते हैं, उसे कच्छ कहते हैं। आगे आगे वाले का कच्छ पकड़कर, पीछे-पीछे वाले चलते हैं। उनमें किसी का हाथ छूट जाये तो उसको अपच्छेद कहते हैं। दो का अपच्छेद हुआ हो और उममें प्रतिहर्ता का पहले और उद्‌गाता का बाद में, वहां के लिये यह व्यवस्था बतायी है। इसी प्रकार प्रत्यक्ष अनुमान उपमान, शब्द अर्थापत्ति आदि क्रमिक

(पन्द्रह)

है। इन में शब्द बाद का है। वह प्रत्यक्ष को बाधित करेगा। -: अनुमान से प्रत्यक्ष का बाध ठीक नहीं इसका समाधान :-

मिथ्यात्व प्रत्यक्ष बाधित है, फिर भी अनुमान से जगत में सिद्ध करेंगे तो वह्नि: अनुष्ण: द्रव्यत्तात्‌ जलवत्‌ यह अनुमान भी सही होगा। नहीं। त्रिकालाबाध्यत्वरूप सत्यत्व का प्रत्यक्षहोता ही कहां है? व्यावहारिकत्वरूपी सत्यत्व को अद्ैत मत में भी है।

प्रत्यक्ष लिड्रादि अबाध्य है कहना नितरां गलत है। फिर आप को सूर्यचद्धादि थाली जितने ही बड़ है, इसी बात में अड़े रहना पड़ेगा। आकाश नीला ही है इसे पकड़ रखना पड़ेगा।

सत्‌ घट: यह परीक्षित प्रत्यक्ष प्रमा है। तभी तो उसमें पानी भरते हैं। उससे भावी अनुमानागमादि ही बाध्य है। नहीं। परीक्षा में अर्थक्रियाकारीत्वरूपी सत्यत्व ही सिद्ध हुआ। त्रैकालिकबाधाभावरूपी सत्यत्व नहीं। अत: जगत मिथ्या दृश्यत्वात्‌ यह भावी अनुमान बाधक ही होगा।

अनुमान से अनुमान का बाध भी संभव है।

अनुमान से श्रुति का बाध हो पर अनुमान से अनुमान का बाध तो होगा ही। वियतं सत्‌ असदन्यत्वे सति प्रातिभासिकान्यत्वाद ब्रह्मवत्‌। नहीं। प्रतिभासिकान्य देहात्मैक्य भी है। वह सत्‌ नहीं मिथ्या है।

मिथ्यात्व के विशेषानुमान बहुत हो सकते हैं।

“'विमतं मिथ्या ब्रह्मान्यत्वात्‌ शुक्तिरूप्यवत्‌” इत्यादि सत्ताईस अन्य मिथ्यात्वानुमान सिद्धिकार ने दिखाये हैं।

-: आगम बाधोद्धार प्रसंग में:-

पूर्वपक्षी कहते है अनुमान का आगम से बाध हो सकता है। '“विश्व॑ सत्य” इस श्रुति का क्या करों। “यच्चिकंत सत्यमित तन्न मोघं”” यह भी श्रुति है। पर अर्थ में कुत्र किंलग्नं! वाली बात है। ऋतज्येत्न ब्रह्मणस्पति: इत्यादि पूर्व मन्रार्थ को उत्तर मन्त्र में “स सुष्ट्त:'” इस प्रकार स्तुति विषय कहकर फिर प्रशंसावाची शब्दों से स्तुति की। फिर उसी स्तुति वचनों को लेकर कहा- विश्व॑-सर्व स्तुति वचन सत्यं- यथार्थ, तु गुणवादमात्रम्‌। इसी मन्त्र में अच्छेन्द्र ब्रह्मणस्पती यह उत्तरार्ध में आये का संबोधन है-मघवाना। क्या उन दोनों को जगत सत्य है यह पता नहीं था कि बताना पड़ा। समर्थ इन्द्र परमात्मा को लेकर “यच्चिकेत '' इत्यादि मन्त्र है। वह जो जातना है उसे जैसे “तदैक्षत बहु स्यां'”, तो उसे सार्थक करता है सृष्टिकर देता है वह उस ईक्षण को मोघ-व्यर्थ नहीं होने देता। “यहां जगत की परमार्थ सत्यता की बात कहां से निकल पड़ी? '

-: असत भी साधक है +-

असत्य हेतु से साध्यमान साध्य भी असत्य ही होगा। दृश्यत्वादि हेतु से साध्य मिथ्यात्व भी मिथ्या हो जायेगा। मिथ्या हेतु से साध्य सिद्ध हो तो आकाश नीलिमा से आकाश में स्पर्शानुमान भी सत्य होगा इत्यादि पूर्वपक्ष का उत्तर है कि व्यावहारिक सत्य से व्यावहारिक सत्य

(सोलह)

भले सिद्ध हो किन्तु त्रिकाला बाध्यत्व या ब्रह्मज्ञाना बाध्यत्वरूपी सत्यत्व सिद्ध नहीं होगा। तु तद्द्वितीयमस्ति ततोःन्यद्‌ विभक्तयत्पश्येत्‌ यज्जिप्रेत्‌ इत्यादि श्रुति त्रिकाला बाध्यत्व निषेधक है। अतोन्‍्न्यदार्त, नात्र काचन भिदास्ति इत्यादि भी श्रुति है। त्रिकाल मतलब सर्वकाल में अबाध्यत्व प्रत्यक्ष नहीं है, क्योंकि सर्वकाल प्रत्यक्ष नहीं है। -: असत्‌ का साधन मानने में बाधक है। :- बाष्प में धूमभ्रम होगा तो उससे भी वह्नि का अनुमान सच्चा होता है। असत्‌ को साधक नहीं मानोगे तो रेखातादात्म्येन आरोपित वर्णों से बोध नहीं होना चाहिए। और आप के पूरे लिखित मुद्रित पुस्तकें ब्रेकार हो जायेंगी। रेखा से वर्ण एवं शब्द का अनुमान करेंगे तो मिथ्या ककारादि मे सत्यानुमान स्वीकृत हो जायेगा। हस्व दीर्घादि भी वर्णों में कल्पित है। नाग: नग: नाट: नदः इत्यादि में वह अर्थ बेधब्रोधमाधक है। -: दृगदृश्यसम्बन्धभड़ :- जगत मिथ्या दृश्यत्वात्‌ यह अप्रयोजक हेतु है। दीखता है इसलिय मिथ्या है, जो दीखता नहीं वह सत्य है वह उल्टा दिमाग है कि नहीं? ऐसा पूर्वपक्ष भी नाकाम है। दूक्‌ और दृश्य का सम्बन्ध क्या है? दृक्‌ ज्ञान अंदर है। दृश्य घटादि बाहर है। दोनों का संयोग समवायादि कोई सम्बन्ध नहीं बनता। विषय-विषयि-भाव सम्बन्ध द्वैतवादी कहते हैं परन्तु विषयत्व और विषयित्व ये दो ही वह हैं। दोनों एक-एक में रहेंगे। द्विष्ठ नहीं है। सम्बन्ध द्विष्ठ होता है। इन दोनों को जोड़ने के लिये और कोई सम्बन्ध सम्बन्ध ढूंढो। अत: दृक्‌ और दृश्य का आध्यासिक सम्बन्ध ही रह जाता है। अर्थात्‌ दृक्‌ में दृश्य कल्पित है। तब मिथ्यात्व स्वत: आपतित होगा। यह कहें कि वृत्तिनिर्गम मान्य होने से विषय देशस्थवृत्ति में प्रतिबिम्ब चैतन्य का सम्बन्ध होगा। नहीं। वृत्तिगत प्रतिबिम्ब का वृत्ति से ही सम्बन्ध होगा। घटादि के साथ नहीं। वृत्त्यभिव्यक्त घटावच्छिन्न चैतन्य का सम्बन्ध माने तो चैतन्य का घटादि के साथ आध्यासिक सम्बन्ध ही होगा। असड्डो ह्यय॑ पुरुष: श्रुति है। घटावच्छिन्न चैतन्य सम्बन्ध घट में मानेंगे तो घट में घट सम्बन्ध होने से आत्माश्रय होगा। -: प्रतिकर्मव्यवस्था में :-- एक को घट ज्ञान हुआ तो अज्ञान नष्ट हुआ और घट प्रकाश हुआ तो पूर जीवात्माओं को घट प्रकाश क्‍यों नहीं होता? और अज्ञान नाश होने से सर्वजगत्‌ प्रकाश से सभी सर्वज्ञ क्यों नहीं होते। अज्ञान कोई सावयव पदार्थ नहीं है कि एक अंश नष्ट हो गया तो अन्य अंश रह जायेंगे। अत: अज्ञान भी असिद्ध है, अन्ञानजन्य होने स॑ जगत मिथ्या है यह भी असिद्ध है ऐसा द्रेतवादियों का पूर्वपक्ष है। उत्तर है--“ 'साड्डाप्यनड्राप्युभयात्मिका नो”” अज्ञान अनिर्वचनीय है। उसका एकदेशादि कार्य भी संभव है। घट देश में एक व्यक्ति के लिये वह अभिभूत हुआ जब घटाकार वृन्ति हुई। कालान्तर में उसी के लिये फिर उद्धृत हो सकती है। अन्य व्यक्तियों के लिये अभिभूत होने से सर्वज्ञता आदि पूर्वोक्त कोई दोष नहीं हो सकता। -: प्रतिकूल तर्क निराकरण :- सामान्य अंश ज्ञात हो विशेष अंश अज्ञात हो तो भ्रम होता है। इदं रजतं' यहां इदमंश

(सत्रह)

ज्ञात और शुक्ति अंश अज्ञात होने से भ्रम हुआ।