श्रीयुत्‌ बेद्य यादवजी त्रिकमजी आचाय

है

आयुर्वेद-सुधा-पयोधि मथन व्यापार मनन्‍्थाचल

तत्तच्छात्र दुरूह संशयनिश्ञा नाशाय मास विषे विद्वद्‌वन्द मिलिन्द वन्धचरण / श्री यादव त्रीकमा- भिख्याख्यात गुरो ! तकात्रियुगले उस भानु मुक्तावली

प्रक्तयनक

--++०रलिहीक (१ इपकममक--77

संसारके समस्त विज्ञान जिस तरह भाव-खभावोंके विशिष्ट प्रकारके वेर्करण पर अथवा अन्वय व्यतिरेक पर अपना प्रथक अस्तित्व रखते हैं, उसी तरद्द आयर्नेंद भी अपना प्रथरू अस्त रखता है दूसरी भाषामें इसे यों कह सकते हैं कि आयुर्गेद शास्त्र भी अपने विशेष प्रकारकें दाशनिक सिद्धान्त पर अवलम्बित है किसी शास्त्रके अध्ययन करनेके पहले उस शास्त्रके आधारभूत सिद्धान्तों तथा उन सिद्धान्तोंकी प्रष्ट: भूमिक्राका ज्ञान परमावर्यक है अतः इस “पदाथ विज्ञान' नामक पुस्तकमें आयुर्गदके उक्त मूलभूत दाशंनिक सूत्ररूपेण निर्दिष्ट सिद्धान्तोंके गृढ़ ग्रंथियोंकी उद्घाटित करने तथा उन सिद्धान्तोंके प्ष्ठभूमिकाकों दशनिका प्रयत्न किया गया है

विधाताकी सर्वोत्कृष्ट सष्टि मानव है और मानव इहलोकमें पुरुषाभप्राप्तेकि लिये स्व॒भावतः ही फ्त्त होता है। पुरुषाथप्राप्तेकि लिये दीर्घायुकी आवश्यकता है और दीर्घायु, आरोग्य संरक्षणसे ह्वी लाभ द्वो सकता है। अम्निवेशादि शिष्योंकों भगवान्‌ पुनवेसु आत्रेय इसी लिये से प्रथम “दीघजीबन' जिज्ञासाका उपदेश करते हैं, और साथ ही पुरुषार्थ प्राप्तिका सर्वोत्तम उपाय आरोग्य संरक्षण वतलाते हैं धर्म, अथ काम और मोक्ष इन चार पुरुषाथौंका आरोग्य ही मूल कारण है ऐसा उपदेश करते हैं आयुर्वेद शास्त्रका उद्देश्य तथा प्रयोजन उक्त आरोग्य संरक्षणके साथ-साथ आत्त जनौंकों अत्तिसे मुक्त करना भी है || उक्त उमयकाय्ये सम्पादनाथ पिभिन्न गुण-कर्मवाले द्वव्यों की आवश्यकता होती है | इन विविध द्वव्योँके अन्दर रहने वाले ग्रुण-कर्म एकजातोय तथा विजातीय दोनों तरदके द्वोते हैं, और ये गुण-कर्म द्रव्य के अन्दर किसी विशेध सम्बन्धसे ही रह्दा करते हैं। अतः भारोग्य संरक्षण तथा अत्तिनाशनके लिये दोर्घायु सिद्धान्तके जिज्ञासुआँकोी ग्रुण-कर्म सम्पन्न द्रव्योंके सामान्य गुण, सामान्य कम विशेष गुण, विशेष कम तथा द्रव्यगत गुण-कर्मोंके नित्य सम्बन्ध (समवाय) आदिका विशेष- ज्ञान परमाश्यक है।

मानव स्टिके आदिकालमें रागद्व षादि मानसिक बिषमताओंके अभावके कारण मानव अति सुखी था परन्तु जब मानव सश्टिके प्रधारके साथ-साथ उक्त मानसिक

विषमताओंका भी प्रसार हुआ, तब देह धारियोंके अन्दर नाना प्रकारके मानसिक तथा

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:< “अथातो दोध जीवितीयमध्याय व्याख्यास्याम: “धर्माथं काम मोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम ॥” ( चरक सू> ) | “स्स्थस्य स्वास्थ्यरक्षण मात्त स्यरोगनुत्‌।” (च० चि० )

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शारीरिक आधि व्याधियोंका भी प्रादुर्भाव हुआ। इन व्याधियोंके कारण ऋषिगर्णोके ब्रत होम आदि आध्यात्मिक कार्यों में वाधाये द्ोने लक्ीं और तब इन वाधाओंसे वाघित होकर हिमवत पर्वमें इनसे मुक्ति पानेके लिये ये विचार विनिमय प्रारम्स हुआ ।* फल- स्वरूप महर्षि भरद्वाज उक्त गोष्ठी द्वारा अग्नगण्य निर्वाचित हुए और ब्रह्मा प्रजापति- अख्विनीकुमार आदि गुरु परम्परासे उपनोत भगधान्‌ इन्द्रके यहां आयुवे दज्ञान लाभार्थ भेजे गये महषि भरद्वाजने भगवान इन्द्रसे गहीत आधयुर्गेदकी अपने सभी सहकर्मी ऋषियोंकों यथावत बतलाया वही आयुर्गेद सारे मर्ल॑लोकमें प्राणधारियोंके कल्याणाथ गुरु-परम्परासे प्रचलित हुआ

'आयुषोवेदः आयुर्गेद/ तथा “भआयुर्विन्दति अनेन इव्यायुगैंदः” अर्थात्‌ अयुका ज्ञान अथवा लाभ जिस शास्त्रके अध्ययनसे हो उसे आयुर्गेद कहते हैं। आयुके ज्ञान तथा लाभके लिये सब प्रथम 'आय' क्या है यह जानना आवंश्यक है

श्र जीवयोयोॉग: जीवन, तनाबच्छिन्न काल: आयु: ।”? अर्थात्‌ू--शरीर और जीवके योगद्रो जीवन और इसके साथ जुटे हुए कालकों आयु कहते हैं। और भी--- “शरीरेन्द्रिय सत्वात्मा संयोगो घारि जीवनम निटयगश्चानुबन्धाश्ध॒ पर्य्यायेरायुरुच्यते ॥” ( च० सु० १) अर्थात्‌ू-शरीर, इन्द्रिय. सत्व (मन) और आत्मा, इनके संयोगकों धारि जीवित, नित्यग अनुबन्ध तथा आयु कद्दते है। ये सब आयुके पर्याय शब्द हैं अत: भायुके ज्ञान के लिये तथा लाभके लिये स्व प्रथम शरीर-इन्द्रिय मन तथा आत्माका ज्ञान होना आवश्यक है। शरोर पाशथ्ेभौतिक है इन्द्रियाँ मी आयुर्वेद शास्त्रमें भौतिक ही मानी गईं हैं। अतः द्ारीररक्षाके लिये प्॑रमहाभूतका शान आवश्यक है केवल पश्चमद्राभूतके शञनमात्रसे ही आयुका ज्ञान तथा लाभ सुंभव नहीं; क्योंकि मानव केवल भौतिक नहीं है। शरीरके साथ-साथ शरीरि तथा शरीर और शंशरिको कामुक बनाने वाले “मन का भी ज्ञान होना परमावश्यक है इसीसे भग्रवान पुनबंसु आत्रेयने कहा है कि--

सत्वमात्मा शरीर त्रयमतत्‌ त्रिदण्डबत्‌। छोकस्तिप्ठति संयोग।त्‌ ततन्र सबप्रतिष्ठितम ॥” ( च० सू० )

अरह॑+ “कल २०९ भा विकार बबलल-+ जनक 5 + बताना पन तक कन ननन कक लनन++>+++।

# “विप्नभूता यदा रोगा: प्रादुभू ताः शरीरिणामू तवोपवासाध्ययन ब्रह्मचये ब्रतायुधाम्‌ तंदाभूतेष्वनुक्रोश पुरस्कृत्य महषयः | समेताः पुण्यकर्माणः पार्खे- हिमवतः शुभे ( च० सू० )

+ #आयुर्गेदेतु भौतिकानीन्द्रियाणि इन्द्रियार्थाश्ष.. (सु० ज्ञा० १)

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... आर्थात--यह लोक ( कर्मपुरुष ) सत्त ( मन ) आत्मा ( चेतनाधातु ) और

शरीर ( पंचमद्ाभौतिक ) इन तीनोंके त्रिदण्ड ( तिपाई ) के समान संयोगसे खड़ा है सब कुछ इसीमें प्रतिष्ठित है। तातलये यह है कि सत्व आत्मा और द्वारीर इन तीनोंके संयोगका पूर्णज्ञान ही आयुका ज्ञान है और इन तीनोंके संयोगकों समभावसे सवेदा अक्षुण्ण बनाये रखना द्वी आयुका लाभ है इस प्रकार आयु-ज्ञान तथा आयु- . लाभके लिये शरोर, इन्द्रिय, मन॑ तथा आत्माका ज्ञान एवं उनके संयोगकों अक्षण्ण रखनेका उपाय हो आयुर्गेद है

आयुर्गेद शाल्रका सम्यकज्ञान तभी संभव है, जब आयुर्गेदके छात्रोंकी उनके आधारभूत सिद्धान्तों तथा उन सिद्धान्तोंकी प्ृष्ठभूमिका (भारतीय दशनों) का ज्ञान हो यद्रपि आयुर्गेदके संहिता-ग्रन्धोंमें यत्र-तैत्र प्रसंगवश आयुर्गेदके मूलभूत सिद्धान्तों तथा उनकी प्ृष्ठभूमिकाका भी विभिन्न परिषदोमें उद्धरण प्राप्त होता है तथापि ये सूत्र रूपमें निर्दिष्ट होनेके कारण तथा विकीण होनेके कारण आयुर्गेदके छात्रोंढो उनके ज्ञानमें बड़ो कठिनाई होती है प्राचीन कालमें अध्ययनाध्यापनका ढंग आजके ढंगसे बिलकुल भिन्न था। आजकलके अन्थप्रणयनका भी ढंग पहलेकी तरद्द नहीं प्राचीन कालमें सब प्रकारके ज्ञानॉका मूल स्रोत एक ही ज्ञान अर्थात्‌ परमलका ज्ञान माना जाता था और इसलिये विभिन्‍न ज्ञानोंका दिग्दशन करते हुए उनके समन्वयकी चेश की जाती थी ; यही कारण है कि आयुर्वेदके संद्विताप्रन्थोंमें भी विभिन्‍न दशेनों तथा. सम्प्रदायोंके सिद्धान्त यथास्थल आवश्यकतानुसार उद्ध्वत किये हुए मिलते हैं। प्राचीन कालमें गुरु, शिष्योंको सवप्रथम जिज्ञास बननेका उपदेश देता था इस प्रकार जिज्ञासु शिष्य जिम विषयका ज्ञान करना चाहता था अपना लक्ष्य उस विषयपर केन्द्रित कर अपने मनमें उत्पन्न हुए विविध प्र॒रनों तथा शंक्राओंकों गुरुके सामने रखता था और गुरु उसके उन प्रइनों तथा शंकाओंका समुचित उत्तर देता एवं समाधान करता था। उक्त प्रइनोत्तर एवं शंकासमाधानमें प्रइनोत्तर और शंकासमाधानका क्रम प्रधान और विषयका क्रम प्रायः गौण होता था। आजकलके शिक्षणका ढंग उक्त शिक्ष्णशली के बिलकुल विपरीत है आजकल तो गुरुको ही सभी प्रइनोत्तरें तथा शंकासमाधानों को तेयारकर नियत समय पर विद्यार्थियोंके सामने स्वग्मेव कहना पढ़ता है प्राचीन कालके विद्यार्थी जिज्ासु द्वोते थे अतः उनके मनमें सदा तरह के प्रश्न तथा शंकाएँ अभीष ज्ञानके लिये उठतो रहतो थी, पर आजके विद्यार्थी तो सदा यहो चाहते हैं कि उन्हें सब कुछ उनके गुरु ही बता दें। वे स्वयं इसके ऊद्दापोहमें पड़ना नहीं चाहते। ऐसी परिस्थितिमें संहिता ग्रन्थोंके अध्ययनाध्यापनमें खभावतः ही जो अड़चने उपस्थित होती हैं वे सर्वविदित हैं। आजकलके उपाध्याय तथा विद्यार्थी दोनोंके सामने यह समस्या बहुत दिनोंसे बनो हुईं हैे। इसी समत्याकों हल करनेका प्रथत्न इस पुस्तकमें किया गया है। दे

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प्रस्तुत पुस्तकके प्रणायनका सारा श्रेय परम पृज्य-गुरुवर श्री बद्य यादवजी त्रिकमजी आचायेकों ही है जिनकी सतत प्रेरणासे यह पुस्तक लिखी गई है.। पुस्तक प्रणयनमें इस बातका विशेष ध्यान रखा गया है कि संहिता ग्रन्थोंमें जो दाशनिक विवेचन--सश्टि विज्ञान तथा अध्यात्मसंबन्धो-यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं उनका क्रम- पूवेक समुचित .संकलन हो और उनके रहस्योंका उद्घाटन किया जाय . साथ द्वो यह भी दशनिका प्रयल किया गया है कि आयुर्गेद शात्रके अध्ययन तथा व्यवह्वारमें उसको क्‍या उपयोगिता है आयुर्गेदका क्षेत्र सृष्टि विज्ञान तथा आध्यात्मिक विज्ञान तक हो सोमित नहीं, वरन जगतके सृष्ठ पदार्थोके वर्गीकरण तथा उनके गुणधर्मका विवेचन भी आयुर्वेदका प्रधान प्रतिपाद्य विषय है अतः पदार्थ-विज्ञान जो आयुर्वेद- शासत्रकी एृष्ठभूमिका है उसका ज्ञान आयुर्वेद ज्विज्ञाखुओंकों सर्वप्रथम द्वोना परामवर्यक् है। इसी दृष्टिकोणसे इस पुस्तकका नाम भो “पदार्थ-विज्ञान' रखा गया है।

सम्प्रति आयुर्गेदका अध्ययन प्रधानतः चिकित्सा व्यवसायके लिये किया जाता है। चिकित्सा व्यवसायके ज्ञानके लिये चिकित्साका साधनभूत द्रव्य ( जिनके द्वारा चिकित्सा करनी है ) का ज्ञान सर्वश्रथम आवश्यक है। अस्तु---

यथाथ ज्ञान तथा अनुभवकेे लिये उपके साथन ( प्रमाण ) का ज्ञान होना आवश्यक है। प्रध्तुत पुस्तकमें सर्वप्रथम प्रमाणका वणन इसीसे अभीष्ट हुआ है प्रमाणकि द्वारा दी प्रमाका ज्ञान होता है। पदार्थज्ञान ( पुस्तकेका ग्रतिपाद्य विषय ) प्रमा है जो प्रमाणोंके द्वारा ही उपलब्ध हो सकता है। अतः आयुर्गेंदके संहिता ग्रन्थोंमें जिस प्रक्तार प्रमाणोंका वर्णन उपलब्ध होता है उनका संकलन कर प्राचीन तथा अर्वाचोन प्रमाण मीमांसाके साथ समन्वय किया गया है। और उनके व्यव- द्वारिकता ( शासख्त्रके अध्ययन तथा चिकित्सा व्यवसायमें ) का प्रतिपादन किया गया है। पुस्तकका प्रथम अध्याय इसी विषयका प्रतिशादन करता है द्वितीय अध्याय में पदार्थ विवेचन तथा पदार्थ वणन है इस अध्यायमें आयुर्वेद शास्त्र द्वारा ग्रहोत बंदोषिक षट॒पदाथौका निरूपण तथा उनके लक्षण आदिका आलोचनात्मक विवेचन किया गया है और उनकी व्यवहारिकताकों दर्शाया गया है। इस अध्यायके चार पाद हैं, जो निम्न प्रकार विभक्त किये गये हैंः---

प्रथमपाद--इसमें पदार्थ क्या है, उसके ज्ञानकी क्या आवश्यकता है, उनका वर्गीकरण अर्वाचीन तथा प्राचोन दाशनिकोंने किस दश्सि किया है इत्यादिका वर्णन है। पुनः द्रव्यनिर्षण तथा द्रव्यके सम्बन्धमें पौरस््य एवं पाश्चात्य विचारोंका दिग्दर्शन कराया गया है। पश्चात्‌ द्रव्यके भेद तथा उनका पृथक निरूपण और व्यवहारमं उनको उपयोगिता सिद्ध को गई है साथ ही परमाणुवाद तथा प्रकृति- वादका सामझस्य दिखाते हुए आधुनिक परमाणुत्राद और प्राचीन परमाणवादका भेद

( झू )

स्पष्ट किग्रा गया है। अन्तमें जड़ तथा चेतन भेदसे £ब्यौंका वर्गीकरण किया गया है और कारण तथा कार्य£ब्यका भेद बतलाया गया है

द्विती यवाद--इसपादमें गुणकम निरुपण तथा विवेचन किया गया है। गुणकर्मके सम्बन्धमें आधुनिक विचारोंका दिग्दशन कराते हुए उनके ज्ञानकी उपादियताका प्रतिपादन किया गया है

तृतीयपाइ--सामान्य तथा विशेषका निरूपण तथा विवचन इसपादमें किया गया है। द्रव्य ज्ञानके लिये उनके जाति ( सामान्य ) तथा व्यक्ति ( विशेष ) का ज्ञान परमावश्यक है। अआयुर्गेद शासत्रका प्रधान प्रयोजन सखास्थ्यरक्षण और . अतिनाशन है। यह काये द्वव्योंके सामान्य गुण कम तथा विशेष गुण कमके ज्ञानके बिना कथमपि सम्पन्न नहीं हो सकता। खास्थ्य रक्षण तथा रोगनाशन दोनों कार्योंमें देह-धातुओं को साम्यावस्थामें रखना पड़ता है स्वास्थ्य रक्षणमें साम्य|बस्थाको अक्षुण्ण बनाये रखनेके लिये, प्राणधारियोंके शरीरमें सदा सजन तथा विनाशका चक्र चलते रहनेके कारण, आवश्यकतानुसार सामान्य तथा विशेष गुण कमवाले द्र॒व्यों द्वारा पूर्ति करना पढ़ता है। स्वास्थ्यकी परिभाषा पर पाठक यदि एक बार दृष्टिपात करें तो उन्हें इस तथ्यका सहजमें ही पता लग जायगा---

“समदोष: समाप्नमिश्व समघातु मलक्रियः

प्रसन्नात्मेन्द्रिय मनः स्वस्थ इत्यभिघीयत |” अर्थाव--शरीरके मूलभूत उपादान दोष (बात, पित्त, कफ) जब सम-सम्यावस्था में हों, अम्नि ( कायाप्नमि ) सम हो, धातु ( रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्णा, शुक्र आदि ) सम अवस्थामें हों, मलक्रिय--अर्थात्‌ शरीरसे अनिष्ट पदाधीका ( जो आहार- पाक तथा धातुपाककी अवस्थामें उत्सजित होते रहते हैं ) निष्कासन, समुचित- रूपसे द्वोता हो और उक्त सभी क्रियाओँके समुचित होते रहने ( समभावसे होते रहने ) के साथ आत्मा, इन्द्रियां और मन प्रसन्न हों तो उसे स्वस्थ कहते हैं, ऐसी परिस्थितिमें सतत विनाशका चक्र चलते रहनेवाले शरीरकी पूर्तिके लिये आद्यार-द्रव्योंके गुणकर्मोका ज्ञान और उन गुणकमोंके सामान्य और विशेषका ज्ञान हुए बिना स्वास्थ्य रक्षणमें कथमपि कोई कृतकार्य नहीं द्वो सकता इसीप्रकर रोग- नाशनमें भी उक्त सामान्य तथा विशेषका ज्ञान परमावश्यक है क्योंकि “सवथा सर्वे- भावानां सामान्य बृद्धिकारणं हासहेतुर्विशेषक्ष” यह अकाव्य नियम है ओर रोग इसके अतिरिक्त कि शरीरके अन्दर किसी धातुकी ब्रद्धि हास तथा विकृति हो और क्या है ! और चिकित्सा भी तो शरीरके बढ़े हुए दोषोंको घटाना और घटे हुएको बढ़ान!

तथा समकी रक्षा करना द्वी हे-- चतुणां भिषगादीनां शस्तानां धातुबकूते।

प्रवृत्ति्धातु साम्यार्था चिकि्त्सेत्यभिधीयते ॥”

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इस प्रकार किसी बारीर धातुकों बढ़ाने तथा घटानेके लिये द्रश्याँके सामान्य तथा विशेष गरुणकर्मोका ज्ञान आवश्यक होता है द्वव्यगत सामान्य गुण कम तथा विशेष गुणउुमका ज्ञान सामान्य तथा विशेष ज्ञानके बिना कभी भी संभव नहीं। अतः सर्व- प्रथम आयुर्वेद शास्त्रमें सामान्य तथा विशेषका व०न किया गया है भगवान इन्द्र से आयुर्गेदकी शिक्षा ग्रहण कर महर्षि भरद्वाज अअने सहकर्मी ऋषियोंके साथ जब मानवके कल्याण-कामनासे द्विमवत्‌ पारबेमं समवेत होकर ध्यानस्थित हुए तो--

हि ने “महषयरते दद्शुयथावज्ज्ञानचल्षुषा सामान्य विशेष गुणान द्रव्याणि कमे || समवायं तज्ज्ञात्वा तन्‍्त्रोक्तं विधिमास्थिता:

लेभिरे परमं शम जीवितं चाप्यनइवरम ॥” | ( च० सू० )

ज्ञानवक्षुओंके सामने सामान्य, विशेष, गुण, द्रव्य, कम तथा समवाय इन छः पदार्थोकों देखा ओर उनके ज्ञानसे तन्त्रोक्त विधि ( शास्त्रोपदिष्ट विधि हितका ग्रहण और अहितका त्याग ) को अननाया जिससे उन्हें परम शान्ति प्राप्त हुई और अनश्वर जीवन प्राप्त हुआ

चतुर्थपाद--इसपादमें समवायका निरूपण तथा वर्णन किया गया हे ब्रव्यके अन्दर उक्त गुणकर्म किसी संबन्धसे ही रहते हैं यह संबन्ध नित्य होता हे अर्थात्‌ आप किसी प्रकार प्रथिव्यादि द्रव्पोंके गुहत्वादि गुण तथा पतनादि कमको प्थक नहीं कर सकते | प्रवक पदार्थ होने पर भी ये गुण कम, ऋव्यसे पृथक नहीं पाये जते हैं इस प्रड्नार गुणकर्मोंका द्रव्योंके साथ यह अप्रथग्भावरूप जो संबन्ध है वद्दी समवाय है समवाय ज्ञानके बिना द्रव्यके विवेचनमें कोई भी सफल नहीं हो सकता

तृतीयाध्याय--इस अध्यायमें तत्वमीमांसाकी गई है आयुर्गेंदके ग्रन्थोंमें सश्चिर्णनमें चतुविशति तल्वोंका वर्णन मिलता है अतः उन तत्वोंका विशदीकरण उनके मूलखोतों ( साख्य ) को उद्धत करते हुये किया गया है

चतुर्थाध्याय--इस अध्यायमें आत्ममीमांसा है आत्मा और परमात्माका भेद, लिज्ञशरीरका वर्णन तथा लिब्रशरीरके साथ पूर्गजन्म कृतकर्म किस प्रकार आमुक्ति पर्यन्त चिपटे रहते हैं, जिनकी वजह से आत्माकों बार विविध योनियोंमें संचरण करना पढ़ता है आदि विषय्रोंका वर्णन किया गया है आयुर्गेद-शास्त्र क्ंवििपाककों भी मानता-है आयुर्गैंदके संद्विता ग्रन्थोंमें अनेक स्थलों पर ऐसा वर्णन पाया जाता है छि देहधारियोंके पूर्व जन्मझ्त शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप उन्हें आरोग्य तंथा रोग प्राप्त होते हैं। अनेक ऐसे भी रोग होते हैं जो औषदधों द्वारा साध्य नहीं होते जो कर्म होते हैं और भोगके पश्चात स्वयं द्वी नष्ट हो जाते हैं

( छे )

इस पुस्तकके प्रणयनमें जिन मित्रों ने सहायता दो है उनके प्रति क्ृतज्ञता बकाश करना मेरा कर्तव्य है। गुरुकुल विश्वविद्यालयके दर्शनके प्रौढ़ पंडित प० सुखदेव जी विद्यावाचस्पति तथा प्रो० नन्‍्दलाल जी खन्ना पाइचात्य दशनके उपाध्याय ; अपने अमून्य सम्मति तथा परामर्श देनेके कारण हमारे विशेष धन्यवादके पात्र हैं। शुदकुल विज्वविद्यालयके प्रस्तोता पं" वागीखर जी विद्यालंकार भी. मेरे उसो प्रकार अन्यवादके पात्र हैं जिन्होंने पुस्तककोी भाषा सुधारनेमें मेरी सहायताकी है अन्‍्तमें जाने परमप्रिय शिष्य सत्यपाल जी आयुर्गेदालंकार (गृह चिकित्सक भ्रद्धानन्द सेवाश्रम) गुहकुटठ विश्वविद्यालयकों भी धन्यवाद दिये बिना नहीं रद्द सकता जिन्होंने इस पुस्तक के पाण्डुलिपिको स्पष्ट तथा प्रेस योग्य बनानेमें पर्याप्त परिश्रम किया है

हे निवेदक--- रावरक्ष पाठक

अकाडएकका वक्तव्य

आयुर्वेदके अच्छे प्रन्थोंका अभाव सबवंसाधारणके साथ ही विशेष ज्ञानके जिज्ञासुकों भी खटक रहा था। इस अभावको दूर करनकरी इच्छासे श्रीबेय्यनाथ आयुर्वेद भवन ने पुस्तकप्रकाशन काये प्रारम्भ क्रिया था। उसी पुस्तक्मालाका यह सातवां पुष्प आपके सामने रखते हुए हमें प्रसन्‍नता होती है

प्रस्तुत ग्न्‍रन्थके विद्वान लेखक गुरुकुल कांगड़ी ( हरिद्वार ) आयुर्वेदिक कालेजके सफल प्रिंसिपल रह चुके हैं और इस समय अयोध्या शिवकुमारी आयुर्वेदिक कालेज, बेगूसरायमें प्रिंसिपल हैं

आयुर्वेद-मात्तंण्ड श्री याद्वजी त्रिकमजी आचाय, बम्बई की प्रेरणा आपन यह ग्रन्थ लिखा है। इसीसे इसकी उपयोगिता समझी जा सकती है

अन्य बेद्यनाथ-प्रकाशनोंकी तरह यह ग्रन्थ भी यदि आयुर्वेद-जगत्‌ के लिए हितकर हो सका तो हमें हार्दिक प्रसन्‍नता होगी। इति शम्‌

विनम्र रामनारायण शर्मा, वेच्य अपष्यक्ष ता८ १०-६-४८

श्रीबेद्यनाथ आयुर्वेद भवन ( कलकत्ता, पटना, माँसी, नागपुर )

हि नस शलानलन पल डममर>बभक.तयकंन्‍+-मअमयाप मान >लन-का ली पल जन - २७७०० कनकक बा »-म>नजम- नस्ल

के वक्त

सहायक पुस्तकाका सू आपधुवद-- १-० चरक संहिता

चक्रपाणि टीका ( चक्रवाणिदत्त )

जल्प कल्पतरु टीका ( गंगाधर सेन )

उपस्कार टीका ( योगेन्द्रनाथ सेन )

जेजट टीका ( दरिदत्त शास्त्री द्वारा सम्पादित )

प्रदोषिका टोका ( ज्योतिषचन्द्र सरस्वती कृत ) २--सुभ्रुत संहिता

डत्हण टीका

चक्रपाणि टीका,

हराणचन्द्र चक्रवर्ती

गो० भा० घाणेकर टीका ३--अशंग-संग्रह ( इन्दु कृत टीका ) ४--अश्ज्हदय ( अरुणदत्त और हेमाद्रि टीका ) ७--कावयप र॑ंद्विता ६--भेल संदिता ७--आयुर्वेद दशन--पं नारायणदत्त कृत 228 पं० महादेव चन्द्रशेखर पाठक

९--पश्चमद्दा भूत-त्रिदोष परिषद्‌ को रिपोर्ट

१०--बत्रिदोष विमर्श-पं० धमंदत सिद्धान्तालकार ११--पश्चमहाभूत-- श्री उपेन्द्रनाथदास कृत १२--नत्रिदोष सिद्धान्त--श्रोवामन शास्त्री दातार १३--द्वारीत संहिता १४--ध्वव्यगुण विज्ञान--श्रीयुत्‌ यादवजी कृत १०--पदरर्श विनिश्वय

आयुरवदेतर--- १६--न्याय दशेन--वात्स्यायन भाष्य १७--न्याय वात्तिक १८--न्याय बिन्दु १९--न्याय कन्दली ( श्रोधराचाये ) २०--न्याय वशेषिक --प्रशस्तपाद-भाष्य

२१--तकंसं ग्रह २२---तकंभाषा

२३--सिद्धान्त मुक्तावली-- श्रीविश्वनाथ कृत 92 रामरुद्री दिनकर टीका

२४-- न्यायसिद्धान्त मुक्तावली-- श्रीद्सिददेव ऋत २०--सांख्य दशन २६--सांख्यतत्त्व कौमुदी-- ईश्वरकृष्ण

» . ». (गौड़पाद वाचस्पति मिश्र, बालराम उदासो 9 २७--सववेदरशन संग्रह-अभयंकर २८--प्रमाणसमुचय वृत्ति--दिछनाग २९--वेदान्त परिभाषा २३० - तत्त्वचिन्तामणि ३१--श्लोकवात्तिक 2२--योगदर्शान-- पतजञ्नलि ३३--योग-वाशिष्ठ ३४--ब्रह्मसृत्र ( शंकरभाष्य ) _. ३७- गीता-रहस्य ( तिलक ) २३६--अद्व तपिद्धि ३७--पदार्थखण्डन-रघुनाथ ३८--पदार्थ तच्निर्माण ३९--उपनिषद्‌ १० ४० -- प्रमाणवात्तिक

४१--सांख्याथभाष्य--आयमुनि

४२--वेशेषिक दर्शन ,,

४३--सांख्यसंग्रह---क्षेमेन्द्र

४४--मनुस्मृति

४०--याशवत्क्य स्मृति

४६--पराशरस्मृति

४७--भारतीय दर्शनका इतिहास ( बलदेव उपाध्याय ) 7” देबराज शर्म्मा

४८--महाभाष्य

४९--दर्शान-दिग्दश न--राहुलसांकृत्यायन

००--पाश्रात्य दशनका इतिहास--पं रामावतार और गुलाबराय कृत'

०१--विष्णुपुराण

५२--मनोविज्ञान--चन्द्रमी लि शुक्ल कृत लालजी शर्मा

हि. ए०२०--80ए9 0 ातादा 7200500॥9 99 क्‍088-(050]09. ज४०७-००७८९॥ ०0 4.028]0. ००-- ॥6 4]609 १९709]60 ४26. ज६०-)॥०७!ए5१5 0 'जाशत छए छिपरत९६ रि०४७५७). ५७--०७००७०९, [[776, )267[ए 97 /2]७४०४7००९ ६, ५८-०--४७5७ ४४५५ ि70७9608८ 97 ॥). . ॥709048. ज५०-]70६70 .,08० 99 3. ., ६8९9४. ६०० 7?77८9]68 729]050979 792ए सं, १. 808080०॥ 799, ६१०-(४४06 04 7070050[)॥9 09 (:. 7:. '/, ]०90, ६९--)॥५०६६९॥।०घ४४ ए7ए९१६९ 9ए 5॥7 ]97॥65 ]९०७५. ६३०- $४[।70त 274 ]45 ४४०7)7०7०४ 70५ (९. 7. 'श, ]090. ६४०--]१]56079 06 त87 4.,080 0५ 5. ०८. ४॥१ए४)))७५!४७॥. ६५० 7४४४ #7ए 7, 7,6ए७. ६६५--750॥87 7|॥॥7]050]7ए79 0०५ 5. रि.0॥४)८५॥४०७४. ६७--४१०570976 380%8707700 0०06 सरीए॥तेप 5600069 ४५ 8.8, 52767. ६८०-]?2४१00०965 04 777॥]05079॥#9 79 ४४, ]8॥768.

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७७--])ए7१6 [72827778 72५ "9705०९६,

कोष-पग्रन्थ

5५८--अमरकोष

७९--गशब्दस्तोम महानिधि

०-- वेहत्‌ बाचस्पत्यभिधान हे

< )--7५7०८ए८।०१0000॥8 37(879]८६

क्वियानुक्रम शिंका

विषय प्रष्ठ समपंण

प्राकूथन

प्रकाशक का निवेदन प्रथमोध्याय:--

प्रमाण विज्ञान प्रमा और प्रमाण सुश्गरतानुमत चतुर्वित्र प्रमाण चरकानुमत त्रिविप प्रमाण प्रयपक्ष प्रमाणके लक्षण प्रत्यक्ष प्रमाणके भेद «१२ अनुमान के लक्षण १३५ अनुमान के भेद २१ स्वर्थानुमान २१ परथानुमान २२ पश्नावयव २२ लिज्ठ-परामश २३ अन्वय व्यतिरेकी २३ केबलान्वयी डे केवलव्यतिरेकी २७ दूसरी व्याख्या २४

प्रास्य पारवात्य विचार समस्वय ९५ आप्तआगम तथा ऐतिद्य प्रमाणके

लक्षण २९ युक्तिके लक्षण ३२ उपमान के लक्षण ३५ अर्थापत्ति के लक्षण ३८

अनुपलब्धि या अभावके लक्षण. २५

डर.

&9

विपय ऐेतिद्य प्रमाणके लक्षण प्रमाण विचार में आये हुए कुछ परिभाषिक शब्द बुद्धि यथार्थानुभव अयधथार्थानुभव करण समवायिकारण असमवाधथि कारण निमित्त कारण समवाय पक्ष हेलाभाष सव्यभिचार असाधारण अनुपपंद्ारी विरुद्ध सत्प्रतिपक्ष अपिद्धक तीन भेद आशभ्रया सिद्ध खरूप सिद्ध व्यपत्वा सिद्ध बाधित आकांक्षा योग्यता सन्नित्रि अयथार्थानुभवके भेद

विषय

द्वितीयाध्याय--

पदा्थ के लक्षण

वशेषिक दशनके आचाय्य वशेषिक तत्वमीमासा पदार्थों का साथम्ये और वेधम्टे केटेगोरी

अरस्तु के विचार

काण्टके विचार

निर्णायक विचार के खहप और

तदनुरूप केटे गोरी

बशेषिकानुमत आयुर्वेद गृहीत

पदार्थ

द्वितीयाध्याय--प्रथम पाद

( द्रव्य विज्ञान ) द्रव्य के लक्षण द्रव्य निर्देश द्रव्योँ के साधम्ये वेधम्ये

द्रव्मके सम्बन्धर्मे अर्बाचोनबिचार

प्थिवी

पृथिवी का निदृष्ट लक्षण जल निरूपण

तेज निरूपण

वायु निरूपण

आकाश निरूपण पश्चमहाभुर्तों के भौतिक गुण पश्चमद्ाभूतों की बनावट परमाणु वाद

शंका-समाधान

परमाण बाद तथा प्रकृति वाद

कालनिरूपण दिक-निरूपण आत्मा निरूपण

( )

श्छ

है. है] ४६ है, आल ४९ ४९ णज्‌

५१

ते

28% ५८ ६० ६१ ६२ ६४ ६५६ ६९ ७१ ७९, <] ८२ ८४ <«५ ८७ ९० ५३

--मन-मकनक न-मिननीयणी +॑ालि ली मननननाना- "५ जगा

विषय परमात्मा का निरूपण

सगुण आरमा आदि का निरूपण

पुरुष का परिमाण आत्माके अगुत्र और नित्यलके हेतु सगुण आत्मा क| निरूपण राशि पुरुषका निरूपण

देहातिरिक्त आत्माके सदभावका

निरूपण

परमात्मा अनादि और अनित्य है

आत्माके लक्षण और गुण

आत्माका सत्व, मन बुद्धि, और देशन्द्रियोंके योगसेज्ञानकी प्रद्नत्ति

मनो-निहूपण

मनका स्वरूप

मनका अग॒त्व तथा एकत्व सनके विषय तथा कमे मन तथा चेतना का स्थान मनो विज्ञान

मनो विक्राशमें कल्पनाका महत्व

कठ्पना और स्वास्थ्य स्मृतिका मनोविकासमें स्थान स्मृतिका आधार

धारणा

पुनईचेतना

पहचान

ध्यान

ध्यानके प्रकार

विचार

प्रत्ययन

सम्बन्पज्ञान और विशेषण-ज्ञान

मा नसिक रचनात्मक क्रिया

प्रष्ठ हर २८ ३०१

१०१ १०२

०१५ 9४७

३१०

४3

03 ११४

३१७ १३१७ 377 हज

बे १३६

१३५९ १४५

१४०: १३४१

१४१

हे 28 ३४२ १४३ १४४ १४४ १४५ १४६

( ))

विषय प्रष्ठष. बिपय प्र्प्ठ मनोविरलेषण १४६ धम निरूपण १८% अव्यक्तमन के कांस्य १४७... अधथर्म निरुपण १८१ प्रतिबन्धक व्यवस्था... १४७ परलापरत निरूपण १८१ सांकेतिक चेशय १५०... युक्ति निरुषण १८२ विस्मृति १५१ संख्या निरूषण १८८५ विधिप्तता १५). संयोग निशुपण १८३ रोगोंढी उ्पत्ति १५१... विभाग निरूपण १८३ अव्वक्तमन और मनोविकास १५१. प्रथवत्व निरुपण १८४ सचेतन और भचेतनके भेदसे .. परिंमाण निरुपण १८५४ द्रब्योंके दो भेद १५४... संस्कार निरुपण बैडे५ वि हि .. अभ्यास निरूपण * १८५ द्वितीय-अध्याय--ह्वितीय पद गुण सदा किसीद्रब्य में रहता है. १८० ... ( गुणकमविज्ञान ) . क्षमके लक्षण , १८६ गुण लक्षणप््‌ १५७... कमेके भेद १८७ व्याश्रयी १५९ द्वितीयाध्याय--तृतीय पाद गुणके सम्बन्ध अर्वाचीनमत १५९५... ( सामान्य विशेष विज्ञान ) गुणको संख्या . १६२ : सामान्य निरुपण १८९ इद्रिय अर्थ विषयके पर्याय... १६४... साधनन्यके भेद १९० शब्दादि गुणोंका सावर्य-बधम्य १६५... विशेषके लक्षण १९५ रूप निरूपण _ १६७ द्वितीय अध्य य--चतुथपाद रस निरूपण 7४. 5 ( समवाय चिज्ञान ) गन्व निरूपण | १७०. समवाय निरूपण १९८ स्पश निरूपण १७० ! तृतीयाध्याय (तल विज्ञान ) शब्द निरूपण _ पृउ० तत्व निरूपण २०८२ गुरुत्व निरूपण १७३ सांख्यानुमत चतुविशति तत्व" २०४ स्नेह निरूपण १७५ अव्यक्तक्ना त्रिगुणात्मकत् २० हैं बुद्धिका निरूपण १७९. अश्रुपम््‌ कर सुखका निरूपण ०७९. मद्त्तल २०७ दुःखका निरूपण १८०... चरकके मतसे सगे सृष्टि निश्वण. २०४८' इच्छाका निरूपण १८०... अष्ट प्रकृति २१५ द्रंधका निरूपण १८०: चरकानुमत २४ तल २१६

प्रयत्न निरूपग १८० | प्रकृति पुरुषडा साधर्म्य वेक्रकर्ण २२५

( )

. विषय प्रष्ठ तन्मात्राओंका नरहूपण २२७५ सत्काय्यवाद २२७ सांख्यानुमत-गुण निरपण २३० अव्पक्त (मूल प्रकृति) से जगतकी उलत्ति २३४

चतुथ--अध्याय ( आत्म-विज्ञान )

आत्म निरूपण २३६ आत्मा या पुरुष अनेक हैं २३७ युरुषके काय्य २३३७ पुरुषके संयोगसे प्र$तिमें चेतन्य २३८ सष्टि-सग निरूपण २३८ सांख्यसम्मत विकास क्रम २४०

महत्तत-बुद्धिका लक्षण और काये २४१. |

र्ज्ड

विषय

अहंकार-कालज्ञान और काय्य

ज्ञनिन्द्रिय-कम न्वियाँ तथा मन

इन्द्रिय वृत्तियाँ *

अन्तःकरणोंको बृत्तियाँ

बाह्य तथा अभ्यन्तर बृत्तियोंका एक साथ तथा क्रमसे द्वोना

इन्द्रियों तथा अन्तःकरणोंको

परिचालना

त्रयोदश विधकरण

इन्द्रियोंके विषय

करणोंमें अन्तःकर णका प्राधान्य

विशेष और भअविशेषोंका निरूपण

लिड्ड-शरी रका निरूपण

प्प्ठ २४६ २७२रे २७३ २४४

२४५ २४५ २७४६ २४७

२७४८

प्रष्ठ सं०

>१६४

शद्धि-पच्च

कारण

सूट

वक्ता

लिब्नलिड्ननो युक्तपेक्षसतक: अनुमो ति

साधवत्ता ५७४९४९८॥४६ 37]5 ६0 ६6 [(0॥ (2६680755]

व्यापकारस्तकः

. गुणयोगद्वचन

सकलत्वे वद्य को करने तत्समवेतं गौको लाओ 30०पा80 आयुर्वेदाध्यापन प्र्चा

भाग उपेक्षित पावने

शुद्धि

करण स्‌क्ष्म व्य्क्ता लिज्गलिड्रि नो युक्तापेश्षस्तकः अनुमिति साध्यवत्ता ]00877९7(. 55(0069]07 (-2६९९०१॥०८०। व्यापकारोपस्तकः गुणयोगायद्वचनम्‌ सकलतत्त्वे वेघ को कराने यत्समवेत गौ--को--लाओ ०्ट्व्प्ाथ्त भायुवेदाध्ययन प्रजा भम्न अपेक्षित पवने मतः .

पंक्ति

०५

ट्र। हि

ट।

अन्तिम

( ) अशुद्धि

नारदीयसूत्र न्अयत्र प्रतीत निद्या परात्मा 90 (0१0 (:0777297[9 7:]8८(

5 उपयुक्त तथा तत्य खाद्यश राशि-पुरुष कारणानामबमलाद सर्वाश्रयस्था गयोनश्न त्रिगुणलवादि शुके देशान्तरगतिस्वप्र सम्प्रदोषः ज्ञानस्यभाबी ज्ञान से अन्तरभ्यन्तर गभस्तपः आह तो मूद्धन्यायात्मन:

श्द्धि नासदीयसूक्त अन्यत्र

प्रतीति

नित्यों

परमात्मा 72707 (,0707707]9. ]]॥ ०६

उपयुक्त

अर्थात्‌

तच्च

खादयश्‌ राशिःपुरुषः करणनाम वेमल्याद सर्वाश्नयस्था तेयग्योन्यश्व त्रिगुणातीतत्वादि शुभे देशान्तरगतिः स्वप्ने सम्प्रमोषः ज्ञानस्थाभावों ज्ञान के अन्तरमनम्येन्तरं गभस्तयः आदतों मूद्धन्याय्ायात्मनः

5

जी अति आग

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पंक्ति १५ १५ १९

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( ) अशद्धि

चिन्तिःस्वन्दो रहित स्बत्व

शुद्धि चिन्निःस्प- दो सहित सत्व

]20700793597705 £)&( [९ घ57550]07

7950००।(65 कम्पनात्मकम्‌ वियन्ते स्वतिसदाहता सत्वम जपा (:9][2&

सोपमिति निशाममें

[77[776[0:06 5प्र5० २०१[|

92 (.0घ756[४]85 [77]607 [257 ए76([ '४००प)पा४7ए ताब5 साक्षादवर्च ( कम ) द्व्न्द्विय 3.5:750007 व्यावान [708९९(00998] 5 इस श््यप्रितत्व॑

77909](6५, कम्पनो|त्मकम्‌ विधत्ते

स्मृतिरुदाहताः

सत्वमञझ्ञसा

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दिशामें

[770९7 ८९०४४८. 59766

छ/६॥॥

22

(207586]ए€५७ [7ए67[५8 7+#3877९[!८ ४४०८४०४७॥ 06935 साक्षादवचन ( काये ) दषोन्द्रय 0 9०52०६०7' व्यवधान [7768८(00&] रस

द्रव्याश्षित्तत्त्वं

पृष्ठ सं० १७ हि १७८ ६८० १८४ २०३

हक

93

शछछ २५ २५१

१५७३

हि

हि 5

( ने ) शशुद्धि

स्पन्दन नागाजन द्वेष है व्यवहार साधारण १७५ तथाबह व्माकात्‌ दरशयति अपरो तम्मात्राप्य इृदमय मदसे संद्दत कारणानां प्रतिनियम।द्‌ कारणों द्रष्टात्व भावाच् अनिवार्य रूपादियु रटष्रि कारणों स्वान्‌ स्वान्‌ परसस्‍्पराकृत केचित्‌ प्रकाश अवस्थामें बावयादि

_अधमआाऊ८ 5८उउआाकापतरपपतद-ाए+रकएउ्कारेपक पालक,

92 नागाजुन भेद है व्यवह्ारासाधारण २५ तथा बः विपाकात्‌ दर्शयति परो तनमात्राण्य

इद्मग्र

मदतसे सड्डात करणानां प्रतिनियमाद करण

द्र्प्ट्त्ब

भावाश्व

अणिमादि: रूपादिषु

ट्ष्ट

करणों

स्‍्वांस्वां

परसपराकृतः केन वित्‌ प्रकाइय अवस्था वाक्यादि.

» श्रीधन्वन्तरये नमः *

पदार्थ-विज्ञान

“5३ >> जलन

फ्रमाण-क्ज्ञान प्रथम-अध्याय

अथात: पदाथविज्ञान प्रमाणविज्ञानीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामो यथोचुरात्रेयादयो महषय: +- प्रमाणमू-- यथार्थानुभवः प्रमा, तत्साधनं प्रमाणम्‌” (उदयनाचार्यः) > प्रमीयतेषननेति गप्रमाणम्‌। उपलब्धि: साधनं, ज्ञानं, परीक्षा प्रमाणमिटनर्थान्तरं समाख्यानि वचनसामथ्यात्‌। परीक्ष्यते यया-- बुद्धा सा परीक्षा प्रमीयतेडनेनेति करणार्थामिधान: प्रमाण शब्दः”। ( गंगाधरः ) “परीक्ष्यते ब्यवस्थाप्यते वस्तुस्वरूपमनयेति परीक्षा ।” ( चक्रपाणिः ) भावाथथ--यथार्थ अनुभवके साधनको प्रमाण कहते हैं यथार्थ अनुभवका नाम 'प्रमा' है। जिसके द्वारा 'प्रमा' या यथार्थ अनुभवकी उत्पत्ति हो उसे प्रमाण कहते हैं “प्रमाण” साधन है ओर 'प्रमा'! उसका साध्य या फल है वक्तव्य--जगत भौतिक है जगतका अर्थ गतिमान---चलते-चलछते नाश- को प्राप्त होनेवाला अर्थात कारणोंमें लीन होनेवाठा है। जगतकी सश्किा कारण पशञ्चमहाभत है और पशग्चमहाभतका आदि कारण ब्रह्म” या “परमात्मा है, जो सत्य, विज्ञाममय और आनन्दमय है। सत्य सदा विज्ञानात्मक होता है अर्थात विज्ञान सका सरूप हे। जो सत्य ओर विज्ञानात्मक होगा वह आनन्दमय होगा ही, अतः तेत्तिरीयोपनिषदर्में विज्ञानगों भी “ब्रह्म& का स्वरूप कहा है। जब अनेक बार हेतु-हेतुमदूभाव, प्रयोज्य-प्रयोजक भाव और

>> 6->>रण७ग-७ ४५» «० >++ है कल. गत जचजज-+- तीज + _४ -+ज--.3+०»+०२७०२-+ ७» +-कनन+-बककी-++>++न-+ मनन» +०“2००+७७- 4७०७क --++० के फोकनीनीण3+काओ अकनजिना।“ 74 लए घज हनन पिणिक+-+->> लत ऑल ता 55५

+ ““विज्ञानं ब्रह्म चेदवेद” ( तत्तिरीय १-५ )

(5

शा

पदाथ-विज्ञान रा मा

कार्य-कारणभावके रूपमें किसो ज्ञानकी सत्यता सिद्ध हो जाती है तब उसे विज्ञानका नाम मिलता है। इस सिद्धिस आनन्दकी प्राप्ति होतो है। यह आनन्दमय-सन्य- विज्ञान, प्रह्मस्वरूप अनादि, अनन्त ओर असीम है विज्ञान अपनी अनन्त शाखाओंसे अपनो सत्यता द्वारा जगतका कल्याण किया करता है, किन्तु उसके ज्ञानके उपाय सीमाबद्ध हें (ऐहिक तथा परलॉकिक वस्तुओंके यथार्थ ज्ञानेक लिए “प्रमाण' की आवश्यकता होती हैं, अतः इस “पदार्थ विज्ञान” नामक पुस्तकमें सर्वप्रथम पदार्थके यथार्थ ज्ञानके साधन “प्रमाण! का वर्णन किया गया है

प्रमा ओर प्रमाण--संस्कृत साहित्यमें ज्ञान' - शहद सामान्य तथा विशेष दोनों प्रकारके जानकारीके लिए व्यवहत होता ह86। यह झ्ान यथार्थ तथा अयथार्थ दोनों प्रकारका हो सकता है। परन्तु 'प्रमा केवल यथार्थज्ञान ( सत्य ज्ञान ) को हो कहते हैं, यह अय्रथार्थज्ञान ( मिथ्याज्ञान ) के बिल्कुल विपरीत है। अतः 'प्रमा' उस ज्ञानका नाम है. जिसमें सत्य या यथार्थत्व तथा अनधिगतत्व ( [7वा॥ ऐि०ए८ाएए ) ये दो गुण अवय हों! जहांतक प्रमाके प्रथम गुण 'सत्य' का सम्बन्ध है, इसमें सभी विचार।का सत एक समान है। परन्तु सत्यके अर्थ विवेचनमें मतभेद दिखाई पड़ता ह। प्रधानतः सत्यकी चार व्याख्याएं उपलब्ध होती पहला विचारक “सत्य के व्यावहारिक अथको प्रधानता देता है। वह सत्य उसी जक्लानक्री सानता हं जो कि अथं या प्रयोजनका साधक हो ,। पाश्ात्य विचारक्ों यह प्रास्मेटिक-श्यूरी ( 7608760० (॥6079 ) के समान 8। दूसरा टिच्वारक प्रधानतः नयायिकका विचार इस प्रकार ह--“जा ( थ्र्म ) जहां वहां उस ( घस ) का ज्ञान होना 'प्रमा' कहलाता है। जस घटमें घटत्व आर पटमस पदत्यक्रा पाथ्रात्य विचारकाॉका यह कॉग्स्पॉन्डन्स ध्यूरो ( (.07725[)000 60८०९ (६7603॥9 ) है «। तीसरा विचारक अनुभवके आवारपर उत्पन्न जञानकों 'सत्या या “प्रमा! कहता है यह पाश्चाव्य विचारकाॉका “्यरा आफ फोियरस्स ( )॥6०79

कजजजन 5०%. कआचानाण 5 का नन्‍ननन नओओ ऑन्‍ाओन आअएओर जी ढ2]" अन्‍ण्कन सन्त के ब+- जननी ०-७ +< जः >कटननननलीनन>े»+>-+

ज्ञान-नं, ज्ञाऊभावेत्युट सामान्य विशेषरूपे बुद्धिमानत्रे, ज्ञान हिधावस्तु- मात्रग्योतक निविकष्पकम्‌। सविकत्यन्तु संज्ञादियोतकतल्वादनेकथा ( शब्दस्तोम ) | वेदान्त परिभाषा---अ०--१ * “यतः अथक्रिया समथ वस्तुप्रदशर्क सम्यक ज्ञानमय” और यतथार्थसिद्धिस्तत्‌ सम्यगज्ञानम्‌” ( न्यायबिन्दु अ. १) 2 “यंत्र यदस्ति तत्र तस्यानुभवः प्रमा तद्बत्‌ तत्प्रकारकानभवों वा ( तख्वचिन्तामणिः )

प्रमाण-विज्ञान

| 0०04 (८0796767८6 ) के समान हद जो ( 47770909 ०4 €५४७०८7१€४७८ ) सम्बाद या सम्बादित्वकों इस ज्ञानक प्रति कारण मानता है। अइड्ठे तवादी बेदान्ती अबाधित्व ( >४०॥४-००४क्षत८07 )का सत्य तथा 'प्रमा' का प्रधान लक्षण मानते हैं ९:

उपरोक्त सूत्रम यह बताया जा चुका है कि यथाश्र अनुनत् या ज्ञान ( ४०)॥०१ ]75]087677:९ ) का प्रमा ऋहत हैं। अतः यह खर्च सफठ्ठ्हां जाता है कि यथाथ अनुभवके विषय ( ()70]6€८0 ०6 ४०!॥0 €%१९१३९७०९ ) की संजा 'प्रमय! होगी वह खाधन जिसके द्वारा 'प्रमाता!' विषय (प्रमय) का यथार्थ ज्ञान (प्रमा) लाम करता उसे “प्रमाणं+ कहत है। प्रमाता नथा। प्रमयकी उपब्धितिसात्रस प्रमाका छासम नहीं हा सकता है, क्योंकि प्रमाताके अन्दर प्रमा लामक लिए किसी साथकका ह।ना आवश्यक्ह। अतः वह साधक जिसके अभाव प्रमाता तथा प्रमयके विद्यमान रहनेपर भी प्रमाका छाभ हा उसे “प्रमाण' कहत इसोलिए प्रमाणका प्रसाका साथक्रतम कारण कहा गया ह। ऐसा कारण जा साधथकतस ( 5०५४६ €६६९८०::४१ ) हो उसे दार्शनिक वाइमयम करग कहेते है। अतः प्रमाणका तकरंग्रद्र्मं प्रमाका कारण कहा गया है। सश्नतानमत चद्यषध पअमाण--

के,

तस्याड्भवरमाद्यमागमग्रव्यक्षानुमानीपमानरविरुद्धमुल्यमानमुपधारय।'

( मु० घू० ११३ )

डल्हण--'>»९१८७ प्रत्यक्षमिति यत्किब्लिदेबाथस्य साक्षात्कारि ज्ञान तदेब प्रस्यक्षयम। तथाहि-- मनोउलक्षगतमश्रान्त वस्तु प्रत्यक्षमुच्यते। इन्द्रियाणामसं ज्ञान बस्तुतत्वे श्रम: स्मृत:” प्रयक्षाविरुद्ध यथा-- सूर्यावल्कनात , नासान्‍्त: सूत्रवतिप्रवशनाब ब्लुतः प्रादुभाव: आगमो वेद: आपानां शास्त्र वा, तथाहि--' सिद्ध सिद्ध: प्रमाणस्तु हितं-चात्र परत्र च। आगम:ः शाम्माप्तानामाप्रासस्ाथवेदिन: |”. आगमा विरुद्ध यधथा-पुराणादिष्वपिश्नयत, मरद्रेंण यशक्षस्थ शिरशिछन्नमश्विभ्यां

द$ वबदान्त परिभाषा---अ०---१ |

'योषयथःप्रमीयते तत्प्रमेयम्‌ ( बात्सायनः ) * तत्र अस्येप्सा जिज्ञासा प्रानस्प प्रवुल्िः से प्रमाता” ( वात्सायनः )

+ येनाथ प्रमिणोति तः्प्रमाणम्‌” ( बात्मायनः )

पदाथं-विज्ञान

सहितमिति। आगमस्य प्रत्यक्षफछ्त्वात्‌ वरीयस्त्वम ; तेस अनुमानात्‌ पूव निदिष्णान। अनु-पश्चादव्यभिचारि लिड्नलिल्ली मीयते ज्ञायते येन तदनुमानम , तेनानुमानेना विरुद्ध यथा--प्रनष्टे शस्ये चन्दन घृतोपदि- खाभ्यां त्वचि विशोषणाज्य विलेयनाभ्यामनुमीयतेडत्र शल्यमिति, प्रसिद्धसाधरम्यात्‌ सूक्ष्यग्यवहितविप्रकृष्टाथस्यसा धनमुपम्नानम्‌ तेना- विरुद्ध यथा--माषवन्माष:, तिलमात्रस्तिलकालक:, विदारीकन्दवत्‌ विदारीरोग:, शाह्कबत पनसिकेट्यादिकम ।” चरकानुमत चतुविध प्रमाण--

“द्विविधभव खलु सव सच्चासच्च। तस्य चतुविधा परीक्षा। आप्रोपदेश:, प्रत्यक्ष, अनुमान, युक्तिश्वेति” | ( च० सू० ११ )

उपस्कार टीका--“परपक्ष॑ं दूषयित्वा सखपक्ष॑ं साधयितुं प्रमाणानि अवतारयति ह्विविधमिति-सब यक्किश्वित्‌ प्रमाणगम्यम्‌। सत्‌- भावरूपं, असत-अभावरूपम इति द्विविधं। तस्य चतुर्विधा, परीक्ष्यते व्यवस्थाप्यते वस्तु स्वरूपमनया इति परीक्षा प्रमाणं। आप्रोपदेश:, प्रगक्षं, अनुमाभं, युक्तिश्चेति

गगाघरः-- 2८,८५३ तस्य भावाभावरूपेण सिद्धस्य स्वस्य द्रव्य- गुणकम समवायाख्यस्थ सामान्यविशेषभूतस्य परीक्षा परीक्षणहेतुश्चतुर्धा भवति | का केति, तां विव्ृणोति आप्रोपदेश इत्यादि, आप्तेरुपदिश्यते यदिदमेबमिद॑ नंवमित्युपदेश आप्रोपदेश:। शब्द: परीक्षा प्रमाण- शब्यतेपननति शब्द:। प्रयक्षमिति--अक्षस्येन्द्रियस्य प्रति विषय वृत्तिः प्रत्यक्षम वृत्तिस्तु सन्निकर्षों ज्ञानं वा, यदा हि. सन्निकपस्तदा ज्ञान प्रमिति:। यदा ज्ञानं तदा हानोपादानोपेक्षा बुद्धाय: फलमिति। अनु- मानमिति-मितेन लिंगेनानु पश्चादथस्यमान मनुमानमिति | युक्तिश्वेति- युज्यते यया चुद्धवा तक्‍यते सा तर्कात्मिका बुद्धियुक्तिरिति। उपलब्धि: साधन ज्ञानं परीक्षा प्रमाणमिल्नर्थान्तरं समाख्यानि बचनसामर्थ्यात्‌ परीक्ष्यतें यया बुद्धा सा परीक्षा। प्रमीयतेडननेति करणार्थाभिधानः प्रमाण शब्द: एपां चतुर्णा परीक्षात्व॑ प्रमाणस्वमेमियदुप्लभ्यते तदु- पलव्धिव्यापार:। चाप्तोपदेशोक्तिराप्रोपदेशत्वम्‌ | इन्द्रियाथसन्निकष

-,

प्रमाण-विज्ञान "५

जन्युस्त प्रयक्षत्वम्‌ लिल्ललिज्ञी सम्बन्वजन्यत्वमनुमानम्‌। बहुकारणा- पपत्तिकरणं युक्तित्वमिति

चक्रपाणि:--सम्प्रति परपश्षंदूषयित्वा स्वपश्च परलोकसाधनानि प्रमाणानि अवतारयति-द्विविधमिद्यादि। सबभिति यत्किबख़ित्‌प्रमाण- प्रतीयमानं तद हद्विविधम तद हेविध्यमाह सच्चासच्च सदिति--विधि- विषयप्रमाणगम्यं भावरूपम। असदिति--निपेधविषयप्रमाणगम्यमभाव- रूपम्‌। परीश्ष्यते व्यवस्थाप्यत बस्तुखरूपमनयेति परीक्षा; प्रमाणा- न्याप्तोपदेशादय उत्तरग्न्थ स्फुटा भवन्ति ।? चरकानमत ।्रिविधग्रमाण---

“त्रिविधं खल रोगविशेषविज्ञानंभवति, तद्यथा-उपरदेश: प्रदक्षमनु- मानज्चेति ॥” ( च० वि० )

उपस्कार टीका-- त्िविवमिति-उपदेशस्य प्रागभिधानं प्रलक्षानु- मानयो: प्रवृत्तिनिमित्ततया ज्यायस्ववात | ह्नुपदिष्टं किख्ित्‌ प्रयक्षा- नुमानाभ्यां अवबुध्यते अनुमानान प्राक्‌ प्रयक्षम | प्रदक्षपूवत्वादनु- मानस्य ॥”

गंगाघर:--त्रिविधमिति रागेति विषमधातवो रोगास्तज्ञाश्चज्वरा- दयो देहादिकायद्रव्यवत्‌। रोगाणां ज्वरादीनां विशेषवातादिजत्वादीनां जातानां रूपाणि, तपां विज्ञानं विशेषण ज्ञायन्तें प्रतीयन्तेडननतद्विज्ञानं प्रमाणम तद्‌ ह्विविधमप्राप्याथग्रहणललश्षणं, प्राप्यग्रहणरक्षणनचंति। तत्पुनश्चिविध तदाह-तद-यथेति

चक्रपाणि:--रोगाणां विशषो यथा वक्ष्यमाणों ज्ञायते येन तदू रोगविशेषविज्ञानमुपदेश प्रत्यक्षानुमानरूपं प्रमाणत्रयम। अतन्र यक्तेरनु- मानान्तर्गत्वादेव प्रथककरणम एतच्च प्रमाणत्रयं कचित्‌ रोगे मिलितं कचिद्‌ दृयम कचिदेकम परीक्षाभ्यां बतेते। येन नान्‍्तरे वहिमान्यादों प्रत्यक्षमबश्यं व्याप्रियते ।”

मूलसूत्रके भावाथ--शल्यशाखका आद्यत्व ओर श्रेष्टल्व प्रतिपादन करते

हुए भगवान 'न्वन्तरिने सश्रुत प्रभ्वति शिष्योसे कहा--““उस आयुर्वेदके स्व-

श्रेष्ठ और आय अंगका. में प्रयक्ष, अनुमान, आरम और उपमान इन चार हैं. कलाई ; 34 «व रा

पदाथ- विज्ञान

प्रमाणोंसे विरोध करत हुएणु (या दिखाते हुए ) जो उपदेश कर रहा हूँ उसको तुम लोग धारण करो ।” ( रत सू+ )

भगवान पुनर्वबंख आजन्रय ( चरक संहिता ११ अध्यायमें ) प्रत्यक्षयादी नास्तिकोंका खण्डन करते हुए ओर अपने पक्षका मण्डन करते हुए उपदेश करते हैं क---“इस जगतमं जो कुछ भी सत्‌ या असत्‌ रूपमें विद्यमान है, उसके वस्तु स्वरूपका निर्णय चार परीक्षाओं ( प्रमाणों ) द्वारा होता है, थे चार परीक्षाएं आप्तोपदेदा, प्रत्यक्ष, अनुमान ओर युक्ति हैं।” पुनः रोगोंके विशेष ज्ञानके उपायोंका उपरेश करते हुए ( विमानस्थान थे अध्यायमें ) आज्रेय भगवानने उपदेश प्रत्यक्ष ओर अनुमान इन तीन प्रमाणों द्वारा रोगनिर्णयके लिए उपदेश किया है

वक्तव्य--आयुर्वेद शाघ्त॒म॑ प्रधानत: तीन प्रमाणोंको ही ग्रहण किया गया प्रतीत होता है। यद्यपि सश्रत तथा चरकसंहितामें चार प्रमाणोका यत्र-तत्र वर्णन उपलब्ध होता है तथापि उनका वर्णन प्रसदड्भरत्रश आया हुआ प्रतीत होता है। सुश्रतका प्रमाण चतुष्टय महर्षि गोतमके £ अनुसार है। चरकमें सांख्य, योग ओर रामानुजके समान तीन प्रमाणोंको ही प्रधानतः अपनाया गया प्रतीत होता है उपंमसानका समावश अनुमानमें ही किया गया है यह उपमानकों स्तन्त्र प्रमाण नहों मानत चरक सूत्रस्थानमं आप्ापदश, प्रत्यक्ष ओर अनुमान- के साथ युक्ति नामक चोथ प्रमाणका वर्णन मिलता है, परन्तु आगे चलकर अनुमानकी व्याख्या करत समय युक्तिको अनुमान प्रमाणकी अनुग्राहिकाम्ात्र |: मान लिया है। अतः चरकमें तीन प्रमाणोंकों ही मुख्य माना गया है चरक- ; संहिता विमान स्थान (८ अध्याय ) में उपसानका खतन्‍्त्र वणन सिलता: है। परन्तु यह वर्णन प्रमाण वर्णनान्‍्तगंत आकर वाद-विवादक मार्गज्ञान वर्णनके अन्तर्गत आया हुआ है |!

प्रमाणके सम्बन्धमें भारतीय दार्शनिकोने भिन्न-भिन्न कल्पनाएँ की हैं जेसे---चारवाक केवल प्रत्यक्ष प्रमाणकों ही यथार्थ ज्ञानका साधन मानता है। बौदू, आहत ( जन ) ओर वेशेषिक प्रत्यक्ष ओर अनुमान ये दो प्रमाण मानते ह। खांख्य, योग और रामानुज उक्त दो प्रमाणोंके अतिरिक्त तीसरा शब्द

का जलन हि नली, >> +-- ज् &- 5; 2०३

* “्रत्यक्षानुमानोपमान शब्दाः प्रमाणानि ।” ( न्याय सूत्र ) | “अनुमान तर्का युक्तापक्षेप: ।” ( च० वि० ) + “इम्रानि खल पदानि कादमार्गज्ञानाथमधिगम्यानि भवन्ति, तग्रथा--वादो द्वन्यंगुणाः 20204): प्रत्मक्षानुसानोपमानमेतिद्यम्‌ ।” १०0९ ( च० बि० ):

प्रमाण-विज्ञान

प्रमाण भी मानते हैं। एक नेयायिक ( जरन्नेयायिक ) भी इन तीन प्रमाणोंका ही समर्थन करते हैं

अर्वाचीन तथा प्राचीन नंयायिक प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान ओर शब्द इन चार प्रमाणोंकों प्रमाका साधन मानते हैं। माहेश्वर सम्प्रदाय घाले इनका समर्थन करते हैं। मीमांसकोंका एक समुदाय प्रभाकर मतानुयायी उक्त चार प्रमाणोंके अतिरिक्त पांचवां प्रमाण “अर्थापत्ति! या “अर्थप्राप्त' नामक स्वीकार करते हैं। मीमांसकोंका दूसरा सम्प्रदाय कुमारिलभटद्का अनुयायी तथा वेदान्ती उपरोक्त पांच प्रमाणोंके साथ छठा प्रमाण “अनुपलब्धि! या 'अभाव' नामक मानते है पौराणिक संभव' तथा ऐतिहा' नामक दो ओर प्रमाण अथांत आठ प्रमाणों द्वारा वस्तुस्थितिका निर्णय करते हैं। तान्त्रिक लोग नवां प्रमाण न्रेष्टा' नामक मानते हैं। इसमें कुछ ऐसे भी हैं जो 'परिशेष' नामक दसवां प्रमाण भी मानत हैं. जो दार्शनिक कमसे कम प्रमाणों द्वारा यथार्थज्ञानकी उपलब्धि करते हैं अन्य प्रमाणोंकों अपने कहे हुए प्रमाणोंमें ही अन्तर्भाव करते हैं। जसे--सांख्य, योग तथा आयुर्वेद वाले अर्थापत्ति तथा संभवका अनुमान के अन्दर तथा अभावका प्रत्यक्ष ओर अनुमान दोनोंके अन्दर एवं ऐतिहाका शब्द प्रमाण या आप्तोपदेशके अन्तर्गत बताते हैं

पाश्चात्य दार्शनकोंमं भी इसी प्रकार प्रमाण सम्बन्धी मतभेद दृश्गोचर होता

है। पाश्रात्य दर्शनमें इस सम्बन्धमें विचार करने वाले शास्त्रकों 'एपीस्टेमोलोजी'

( &0०८६7०0089 ) कहते हैं। यह अंग पाश्चात्य दाशनिकोंके यहां भी

आवश्यक अंग माना गया है। पाश्रात्य दर्शन जब विश्वके उभय पक्ष ( स्वरूप

तथा वस्तुस्थिति ) का अध्ययन करता है तो उसे उसके निर्णयके ओचित्यका ०0... “अ्रत्यक्षमेके चारवकाः कणाद सुगतौ पुनः अनुमानब्च तच्चापि सांख्याः शब्दं तेषपि न्येयायेकिदेशिनोप्येव. मुपमानश्व॒ केचन

अर्थापत्या सहेतानि चल्वार्याहुः प्रभाकराः अभावषष्ठान्येतानि भाट्टा._ वेदान्तिनस्तथा

संभवेतित्य युक्तानि तानि पौराणिका जगुः ॥” ( सर्वदर्शनसंग्रहः )

“मआध्वस्तु प्रत्यक्ष शब्दज्चेति प्रमाणद्यम्‌ रामानुजीयास्तु प्रत्यक्षानुमानं शब्द-

“चेति प्रमाणत्रयमिच्छन्ति चेश5पि प्रमाणान्तरमिति तंौत्रिकाः ।” ( सर्वेदशनसंग्रहः )

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पदाथं-विज्ञान

प्रतिपादन करना आवश्यक हो जाता हैे। वह विश्वके जञानसमात्रसे ही सन्‍्तृष्ट नहीं होता, अपित उसे यह भी प्रमाणित करना पड़ता है कि उसका ज्ञान सत्य एवं यथार्थ है वह शास्त्र जो यथार्थज्ञानके प्रकृति एवं दशाका विवेचन करता है उसे 'एपीस्टेमोलोजी” या 'प्रमाणमीमांसाशास्त्र' कहते हैं “पीस्टेमोलोजी? वह शास्त्र है जिसके द्वारा यथार्थज्ञाकी उपलब्धि होती 6। इसे संक्षेपर्मे यों कह सकते हैं कि 'एपीस्ट्रेमोलोज़ी! ज्ञानकी समालोचना करने वाह्या शास्त्र है&

इस प्रमाणमोमांसाशास्त्र ( [706546770]0 729 ) के अध्ययनस फ्ता चलता है कि पाश्रात्य दार्शनिक प्रधानतः प्रत्यक्ष ( '००८००॥४०४ ) तथा अनुमान ( [7/०८९०॥८९ ) इन दो प्रमाणोंकों हो यथार्थज्ञानका साधक मानते हैं। अन्य प्रमाणों में शब्दप्रमाण (. 0७६00ए लथा ८॥)5! (९४(॥१0779) ओर उपमानका प्रयोग यत्रतत्र प्रयुक्त हुआ मिलता